धर्म बड़ा या ज्ञान


धर्म बड़ा या ज्ञान


धर्म और ज्ञान दोनों ही जीवन के लिए अनिवार्य हैं, लेकिन धर्म (नैतिकता/कर्तव्य) को ज्ञान से बड़ा माना जाता है।

क्योंकि ज्ञान का सही दिशा में प्रयोग धर्म से ही आता है। ज्ञान आपको 'कैसे करें' बताता है, लेकिन धर्म 'क्या करना चाहिए' (सही/गलत) का मार्गदर्शन करता है, जिसके बिना ज्ञान भी विनाशकारी हो सकता है। 


🛕 धर्म और ज्ञान का संतुलन

👉 धर्म की प्रधानता:- ज्ञान के बिना धर्म अंधविश्वास हो सकता है, लेकिन धर्म के बिना ज्ञान (जो सही-गलत न समझाए) कर्म को अधर्म बना सकता है।

👉 ज्ञान का महत्व:- ज्ञान, विशेषकर आत्मज्ञान, इंसान को गलत कार्यों से बचाता है (जैसे नशा, भ्रष्टाचार) और मनुष्य को पशु (अज्ञान) से देवता (ज्ञानवान) की ओर ले जाता है।

👉 दोनों का तालमेल: धर्म, कर्म का मार्गदर्शन करता है और ज्ञान उस मार्ग को स्पष्ट करता है, इसलिए दोनों को एक-दूसरे के पूरक के रूप में देखना ही उत्तम है। 

🛕अर्थात:-धर्म-युक्त ज्ञान ही सर्वोच्च है।🛕

              जय श्री राधे-जय श्री कृष्णा
                आपका दिन मंगलमय हो


चार-युग और उनकी विशेषताएं



'युग' शब्द का अर्थ होता है एक निर्धारित संख्या के वर्षों की काल-अवधि। जैसे सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलियुग आदि। 

यहाँ हम चारों युगों का वर्णन करेंगें। युग वर्णन से तात्पर्य है कि उस युग में किस प्रकार से व्यक्ति का जीवन, आयु, ऊँचाई, एवं उनमें होने वाले अवतारों के बारे में विस्तार से परिचय देना। प्रत्येक युग के वर्ष प्रमाण और उनकी विस्तृत जानकारी कुछ इस तरह है -

सत्ययुग

 यह प्रथम युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है -

🛕इस युग की पूर्ण आयु अर्थात् कालावधि – 17,28,000 वर्ष होती है।

🛕इस युग में मनुष्य की आयु – 1,00,000 वर्ष होती है ।

🛕मनुष्य की लम्बाई – 32 फिट (लगभग) [21 हाथ]
सत्ययुग का तीर्थ – पुष्कर है ।

🛕इस युग में पाप की मात्र – 0 विश्वा अर्थात् (0%) होती है ।

🛕इस युग में पुण्य की मात्रा – 20 विश्वा अर्थात् (100%) होती है ।

इस युग के अवतार – मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह (सभी अमानवीय अवतार हुए) है ।

अवतार होने का कारण – शंखासुर का वध एंव वेदों का उद्धार, पृथ्वी का भार हरण, हरिण्याक्ष दैत्य का वध, हिरण्यकश्यपु का वध एवं प्रह्लाद को सुख देने के लिए।

इस युग की मुद्रा – रत्नमय है ।

इस युग के पात्र – स्वर्ण के है ।

त्रेतायुग

यह द्वितीय युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है –

🛕इस युग की पूर्ण आयु अर्थात् कालावधि – 12,96,000 वर्ष होती है । 

🛕इस युग में मनुष्य की आयु – 10,000 वर्ष होती है ।

🛕मनुष्य की लम्बाई – 21 फिट (लगभग) [ 14 हाथ ]
त्रेतायुग का तीर्थ – नैमिषारण्य है ।

🛕इस युग में पाप की मात्रा – 5 विश्वा अर्थात् (25%) होती है ।

🛕इस युग में पुण्य की मात्रा – 15 विश्वा अर्थात् (75%) होती है ।

इस युग के अवतार – वामन, परशुराम, राम (राजा दशरथ के घर)

अवतार होने के कारण – बलि का उद्धार कर पाताल भेजा, मदान्ध क्षत्रियों का संहार, रावण-वध एवं देवों को बन्धनमुक्त करने के लिए ।

इस युग की मुद्रा – स्वर्ण है ।

इस युग के पात्र – चाँदी के है ।

द्वापरयुग

 यह तृतीय युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है –

🛕इस युग की पूर्ण आयु अर्थात् कालावधि – 8.64,000 वर्ष होती है ।

🛕इस युग में मनुष्य की आयु - 1,000 होती है ।

🛕मनुष्य लम्बाई – 11 फिट (लगभग) [ 7 हाथ ]
द्वापरयुग का तीर्थ – कुरुक्षेत्र है ।

🛕इस युग में पाप की मात्रा – 10 विश्वा अर्थात् (50%) होती है ।

🛕इस युग में पुण्य की मात्रा – 10 विश्वा अर्थात् (50%) होती है ।

इस युग के अवतार – कृष्ण, (देवकी के गर्भ से एंव नंद के घर पालन-पोषण), बुद्ध (राजा के घर)।

अवतार होने के कारण – कंसादि दुष्टो का संहार एंव गोपों की भलाई, दैत्यो को मोहित करने के लिए ।

इस युग की मुद्रा – चाँदी है ।

इस युग के पात्र – ताम्र के हैं ।

कलियुग

 यह चतुर्थ युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है –

🛕इस युग की पूर्ण आयु अर्थात् कालावधि – 4,32,000 वर्ष होती है ।

🛕इस युग में मनुष्य की आयु – 100 वर्ष होती है ।

🛕मनुष्य की लम्बाई – 5.5 फिट (लगभग) [3.5 हाथ]
कलियुग का तीर्थ – गंगा है ।

🛕इस युग में पाप की मात्रा – 15 विश्वा अर्थात् (75%) होती है ।

🛕इस युग में पुण्य की मात्रा – 5 विश्वा अर्थात् (25%) होती है ।

🛕इस युग के अवतार – कल्कि (ब्राह्मण विष्णु यश के घर) ।

अवतार होने के कारण – मनुष्य जाति के उद्धार अधर्मियों का विनाश एंव धर्म कि रक्षा के लिए।

इस युग की मुद्रा – लोहा है।

इस युग के पात्र – मिट्टी के है।


ॐत्र्यंबकम् मंत्र के 33 अक्षर

जो महर्षि वशिष्ठ के अनुसार 33 देवताओ के घोतक हैं। 
उन तैंतीस देवताओं में 8 वसु 11 रुद्र और 12 आदित्यठ 1 प्रजापति तथा 1 षटकार हैं। 

👀 इन तैंतीस देवताओं की सम्पूर्ण शक्तियाँ महामृत्युंजय मंत्र से निहीत होती है । जिससे महा महामृत्युंजय का पाठ करने वाला प्राणी दीर्घायु तो प्राप्त करता ही हैं । साथ ही वह नीरोग, ऐश्व‍र्य युक्ता धनवान भी होता है ।

👀 महामृत्युंरजय का पाठ करने वाला प्राणी हर दृष्टि से सुखी एवम समृध्दिशाली होता है । भगवान शिव की अमृतमययी कृपा उस निरन्तंर बरसती रहती है।

•🛕 त्रि - ध्रववसु प्राण का घोतक है जो सिर में स्थित है।

•🛕यम - अध्ववरसु प्राण का घोतक है, जो मुख में स्थित है।

•🛕 ब - सोम वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण कर्ण में स्थित है।

•🛕 कम - जल वसु देवता का घोतक है, जो वाम कर्ण में स्थित है।

•🛕 य - वायु वसु का घोतक है, जो दक्षिण बाहु में स्थित है।

•🛕 जा- अग्नि वसु का घोतक है, जो बाम बाहु में स्थित है।

•🛕 म - प्रत्युवष वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण बाहु के मध्य में स्थित है।

•🛕 हे - प्रयास वसु मणिबन्धत में स्थित है।

•🛕 सु -वीरभद्र रुद्र प्राण का बोधक है। दक्षिण हस्त के अंगुलि के मुल में स्थित है।

•🛕 ग -शुम्भ् रुद्र का घोतक है दक्षिणहस्त् अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।

•🛕 न्धिम् -गिरीश रुद्र शक्ति का मुल घोतक है। बायें हाथ के मूल में स्थित है।

•🛕 पु- अजैक पात रुद्र शक्ति का घोतक है। बाम हस्तह के मध्य भाग में स्थित है।

•🛕 ष्टि - अहर्बुध्य्त् रुद्र का घोतक है, बाम हस्त के मणिबन्धा में स्थित है।

•🛕 व - पिनाकी रुद्र प्राण का घोतक है। बायें हाथ की अंगुलि के मुल में स्थित है।

•🛕 र्ध - भवानीश्वपर रुद्र का घोतक है, बाम हस्त अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।

•🛕 नम् - कपाली रुद्र का घोतक है । उरु मूल में स्थित है।

•🛕 उ- दिक्पति रुद्र का घोतक है । यक्ष जानु में स्थित है।

•🛕 र्वा - स्था णु रुद्र का घोतक है जो यक्ष गुल्फ् में स्थित है।

•🛕 रु - भर्ग रुद्र का घोतक है, जो चक्ष पादांगुलि मूल में स्थित है।

•🛕 क - धाता आदित्यद का घोतक है जो यक्ष पादांगुलियों के अग्र भाग में स्थित है।

•🛕 मि - अर्यमा आदित्यद का घोतक है जो वाम उरु मूल में स्थित है।

•🛕 व - मित्र आदित्यद का घोतक है जो वाम जानु में स्थित है।

•🛕 ब - वरुणादित्या का बोधक है जो वाम गुल्फा में स्थित है।

•🛕 न्धा - अंशु आदित्यद का घोतक है । वाम पादंगुलि के मुल में स्थित है।

•🛕 नात् - भगादित्यअ का बोधक है । वाम पैर की अंगुलियों के अग्रभाग में स्थित है।

•🛕 मृ - विवस्व्न (सुर्य) का घोतक है जो दक्ष पार्श्वि में स्थित है।

•🛕 र्त्यो् - दन्दाददित्य् का बोधक है । वाम पार्श्वि भाग में स्थित है।

•🛕 मु - पूषादित्यं का बोधक है । पृष्ठै भगा में स्थित है ।

•🛕 क्षी - पर्जन्य् आदित्यय का घोतक है । नाभि स्थिल में स्थित है।

•🛕 य - त्वणष्टान आदित्यध का बोधक है । गुहय भाग में स्थित है।

•🛕 मां - विष्णुय आदित्यय का घोतक है यह शक्ति स्व्रुप दोनों भुजाओं में स्थित है।

•🛕 मृ - प्रजापति का घोतक है जो कंठ भाग में स्थित है।

•🛕 तात् - अमित वषट्कार का घोतक है जो हदय प्रदेश में स्थित है।

उपर वर्णन किये स्थानों पर उपरोक्त देवता, वसु आदित्य आदि अपनी सम्पुर्ण शक्तियों सहित विराजत हैं । जो प्राणी श्रध्दा सहित महामृत्युजय मंत्र का पाठ करता है उसके शरीर के अंग - अंग ( जहां के जो देवता या वसु अथवा आदित्यप हैं ) उनकी रक्षा होती है..!!

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सनातन धर्म से संबंधित तीन पशु पक्षी से जुड़े शकुन-अपशकुन ( अच्छा और बुरा)

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प्राचीन समय के ऋषियों मुनियों ने अपने शोध में बताया था की प्रत्येक जानवर के विचित्र व्यवहार एवं हरकतों का कुछ न कुछ प्रभाव अवश्य होता है. जानवरों के संबंध में अनेको बाते  हमारे पुराणों एवं ग्रंथो में भी विस्तार से बतलाई गई है।

हमारे सनातन धर्म में माता के रूप में पूजनीय गाय के संबंध में तो बहुत सी बाते आप लोग जानते होंगे परन्तु आज हम जानवरों के संबंध में पुराणों से ली गई कुछ ऐसी बातो के बारे में बतायेंगे जो आपने पहले कभी भी किसी से नहीं सुनी होगी. जानवरों से जुड़े रहस्यों के संबंध में पुराणों में बहुत ही विचित्र बाते बतलाई गई जो किसी को आश्चर्य में डाल देंगी।
 
कौए का रहस्य :-

कौए के संबंध में पुराणों बहुत ही विचित्र बाते बतलाई गई है मान्यता है की कौआ अतिथि आगमन का सूचक एवं पितरो का आश्रम स्थल माना जाता है।

हमारे धर्म ग्रन्थ की एक कथा के अनुसार इस पक्षी ने  देवताओ और राक्षसों के द्वारा समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत का रस चख लिया था. यही कारण है की कौआ की कभी भी स्वाभाविक मृत्यु नहीं होती. यह पक्षी कभी किसी बिमारी अथवा अपने वृद्धा अवस्था के कारण मृत्यु को प्राप्त नहीं होता. इसकी मृत्यु आकस्मिक रूप से होती है।

यह बहुत ही रोचक है की जिस दिन कौए की मृत्यु होती है उस दिन उसका साथी भोजन ग्रहण नहीं करता. ये आपने कभी ख्याल किया हो तो यह बात गौर देने वाली है की कौआ कभी भी अकेले में भोजन ग्रहण नहीं करता यह पक्षी किसी साथी के साथ मिलकर ही भोजन करता है।

कौआ की लम्बाई करीब 20  इंच होता है, तथा यह गहरे काले रंग का पक्षी है. जिनमे नर और मादा दोनों एक समान ही दिखाई देते है. यह बगैर थके मिलो उड़ सकता है. कौए के बारे में पुराण में बतलाया गया है की किसी भविष्य में होने वाली घटनाओं का आभास पूर्व ही हो जाता है।

पितरो का आश्रय स्थल :- श्राद्ध पक्ष में कौए का महत्व बहुत ही अधिक माना गया है . इस पक्ष में यदि कोई भी व्यक्ति कौआ को भोजन कराता है तो यह भोजन कौआ के माध्यम से उसके पीतर ग्रहण करते है. शास्त्रों में यह बात स्पष्ट बतलाई गई है की कोई भी क्षमतावान आत्मा कौए के शरीर में विचरण कर सकती है।

भादौ महीने के 16 दिन कौआ हर घर की छत का मेहमान बनता है. ये 16 दिन श्राद्ध पक्ष के दिन माने जाते हैं. कौए एवं पीपल को पितृ प्रतीक माना जाता है. इन दिनों कौए को खाना खिलाकर एवं पीपल को पानी पिलाकर पितरों को तृप्त किया जाता है।

कौवे से जुड़े शकुन और अपशकुन ( अच्छा और बुरा) :-

👉 यदि आप शनिदेव को प्रसन्न करना चाहते हो कौआ को भोजन करना चाहिए।

👉 यदि आपके मुंडेर पर कोई कौआ बोले तो मेहमान अवश्य आते है।

👉 यदि कौआ घर की उत्तर दिशा से बोले तो समझे जल्द ही आप पर लक्ष्मी की कृपा होने वाली है।

👉 पश्चिम दिशा से बोले तो घर में मेहमान आते है।

👉  पूर्व में बोले तो शुभ समाचार आता है।

👉  दक्षिण दिशा से बोले तो बुरा समाचार आता है।

👉  कौवे को भोजन कराने से अनिष्ट व शत्रु का नाश होता है।

चीटियों का रहस्य :-

चीटियों को हम एक बहुत तुच्छ एवं छोटा जानवर समझते है, परन्तु चीटियां बहुत ही मेहनती और एकता से रहने वाला जीव है. सामूहिक प्राणी होने के कारण चींटी सभी कार्यों को बांटकर करती है।

विश्वभर में लगभग 14000 से अधिक प्रजाति की चीटियां है. 

चींटी के बारे में वैज्ञानिकों ने कई रहस्य उजागर किए हैं. चींटियां आपस में बातचीत करती हैं, वे नगर बनाती हैं और भंडारण की समुचित व्यवस्था करना जानती हैं. हमारे इंजीनियरों से कहीं ज्यादा बेहतर होती हैं ‍चींटियां. चींटियों का नेटवर्क दुनिया के अन्य नेटवर्क्स से कहीं बेहतर होता है. ये मिलकर एक पहाड़ को काटने की क्षमता रखती है।

चींटियां शहर को स्वच्छ रखने में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं. चींटियां खुद के वजन से 100 गुना ज्यादा वजन उठा सकती हैं. मानव को चींटियों से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है।

चीटियों दो प्रकार की होती है लाल चीटियां एवं काली चीटियां. शास्त्रों के अनुसार लाल चीटियां को शुभ तथा काली चीटियों को अशुभ माना गाय है. दोनों ही तरह की चींटियों को आटा डालने की परंपरा प्राचीनकाल से ही विद्यमान है. चींटियों को शकर ( चीनी या गुड ) मिला आटा डालते रहने से व्यक्ति हर तरह के बंधन से मुक्त हो जाता है।

हजारों चींटियों को प्रतिदिन भोजन देने से वे चींटियां उक्त व्यक्ति को पहचानकर उसके प्रति अच्छे भाव रखने लगती हैं और उसको वे दुआ देने लगती हैं. चींटियों की दुआ का असर आपको हर संकट से बचा सकता है।

👉  यदि आप कर्ज से परेशान है तो चीटियों को शक़्कर और आता डाले. ऐसा करने पर कर्ज की समाप्ति जल्द हो जाती है।

👉 जो प्रत्येक दिन चीटियों को आटा देता है वह वैकुंठ धाम को प्रस्थान करता है।

👉 यदि आप लाल चीटियों को मुंह में अंडे दबाए देखते हो यह भी शुभ माना जाता है तथा परिवार में सुख समृद्धि बढ़ती है।

कुत्ते का रहस्य :-

हमारे पुराणों में यह बतलाया गया है की कुत्ता यमराज दूत है।कुत्ते को भैरव देवता का सेवक भी कहा जाता है। भैरव देवता को प्रसन्न करने के लिए कुत्ते को भोजन करना चाहिए।यदि भैरव देवता अपने भक्त से प्रसन्न रहते है तो किसी भी प्रकार की समस्या एवं रोग उसे छू नहीं सकता।

मान्यता है की यदि आप कुत्ते को प्रसन्न रखते है तो वह आपके सामने किसी भी तरह की आत्माओं को फटकने नहीं देता. आत्माएं कुत्ते से दूर भागती है।

कुत्ते की क्षमता के बारे में पुराण में बतलाया गया है की दरअसल कुत्ता एक ऐसा प्राणी है जिसे भविष्य में होने वाली घटनाओं का पूर्व आभास होता है तथा वह सूक्ष्म जगत को यानि की आत्माओं को देख सकता है।

हिन्दू धर्म में कुत्ते को एक रहस्मयी प्राणी माना गया है, परन्तु इसे भोजन कराने से हर प्रकार के संकट से बचा जा सकता है।

कुत्ते से जुड़े शकुन एवं अपशकुन  (अच्छा और बुरा) :-

👉 कुत्ते की रोने की आवाज को अपशकुन माना जाता है. जब भी कुत्ता कराहता है तो समझ लीजिए की नकरात्मक शक्तियां आस पास है।

👉 शस्त्रों में कुत्ते के संबंध में यह बात कहि गई की यदि किसी परिवार में रोगी हो तो कुत्ता पालने से वह रोगी की बिमारी को अपने उपर ले लेता है।

👉 यदि किसी शुभ कार्य के दौरान कुत्ता आपका मार्ग रोके तो इसे विषमता या अनिश्चय प्रकट होती है।

👉 यदि संतान की प्राप्ति न हो रही हो तो काले कुत्ते को पालना चाहिए।

👉 अन्य शास्त्रीय मतांतर के अनुसार कुत्ते को पालने की जगह बाहर ही किसी काले कुत्ते को प्रतिदिन तेल से चुपड़ी रोटी खिलाने से परिवार की कई समस्याओं का स्वतः ही निदान हो जाता है।

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मनुष्य के बार-बार जन्म-मरण का क्या कारण है ?


एक बार द्वारकानाथ श्रीकृष्ण अपने महल में दातुन कर रहे थे । रुक्मिणी जी स्वयं अपने हाथों में जल लिए उनकी सेवा में खड़ी थीं । अचानक द्वारकानाथ हंसने लगे । रुक्मिणी जी ने सोचा कि शायद मेरी सेवा में कोई गलती हो गई है; इसलिए द्वारकानाथ हंस रहे हैं ।

रुक्मिणी जी ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा—‘प्रभु ! आप दातुन करते हुए अचानक इस तरह हंस क्यों पड़े, क्या मुझसे कोई गलती हो गई ? कृपया, आप मुझे अपने हंसने का कारण बताएं ।’

श्रीकृष्ण बोले—‘नहीं, प्रिये ! आपसे सेवा में त्रुटि होना कैसे संभव है ? आप ऐसा न सोचें, बात कुछ और है ।’

रुक्मिणी जी ने कहा—‘आप अपने हंसने का रहस्य मुझे बता दें तो मेरे मन को शान्ति मिल जाएगी; अन्यथा मेरे मन में बेचैनी बनी रहेगी ।’

तब श्रीकृष्ण ने मुसकराते हुए रुक्मिणी जी से कहा—‘देखो, वह सामने एक चींटा चींटी के पीछे कितनी तेजी से दौड़ा चला जा रहा है । वह अपनी पूरी ताकत लगा कर चींटी का पींछा कर उसे पा लेना चाहता है । उसे देख कर मुझे अपनी मायाशक्ति की प्रबलता का विचार करके हंसी आ रही है ।’

रुक्मिणी जी ने आश्चर्यचकित होते हुए कहा—‘वह कैसे प्रभु ? इस चींटी के पीछे चींटे के दौड़ने पर आपको अपनी मायाशक्ति की प्रबलता कैसे दीख गई ?’

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—‘मैं इस चींटे को चौदह बार इंद्र बना चुका हूँ । चौदह बार देवराज के पद का भोग करने पर भी इसकी भोगलिप्सा समाप्त नहीं हुई है । यह देख कर मुझे हंसी आ गई ।’

इंद्र की पदवी भी भोग योनि है । मनुष्य अपने उत्कृष्ट कर्मों से इंद्रत्व को प्राप्त कर सकता है । सौ अश्वमेध यज्ञ करने वाला व्यक्ति इंद्र-पद प्राप्त कर लेता है । लेकिन जब उनके भोग पूरे हो जाते हैं तो उसे पुन: पृथ्वी पर आकर जन्म ग्रहण करना पड़ता है ।

प्रत्येक जीव इंद्रियों का स्वामी है; परंतु जब जीव इंद्रियों का दास बन जाता है तो जीवन कलुषित हो जाता है और बार-बार जन्म-मरण के बंधन में पड़ता है । वासना ही पुनर्जन्म का कारण है । जिस मनुष्य की जहां वासना होती है, उसी के अनुरूप ही अंतसमय में चिंतन होता है और उस चिंतन के अनुसार ही मनुष्य की गति—ऊंच-नीच योनियों में जन्म होता है । अत: वासना को ही नष्ट करना चाहिए । वासना पर विजय पाना ही सुखी होने का उपाय है ।

बुझै न काम अगिनि तुलसी कहुँ,
विषय भोग बहु घी ते ।

अग्नि में घी डालते जाइये, वह और भी धधकेगी, यही दशा काम की है । उसे बुझाना हो तो संयम रूपी शीतल जल डालना होगा ।

संसार का मोह छोड़ना बहुत कठिन है । वासनाएं बढ़ती हैं तो भोग बढ़ते हैं, इससे संसार कटु हो जाता है । वासनाएं जब तक क्षीण न हों तब तक मुक्ति नहीं मिलती है । पूर्वजन्म का शरीर तो चला गया परन्तु पूर्वजन्म का मन नहीं गया ।

नास्ति तृष्णासमं दु:खं नास्ति त्यागसमं सुखम्।
सर्वांन् कामान् परित्यज्य ब्रह्मभूयाय कल्पते ।।

तृष्णा के समान कोई दु:ख नहीं है और त्याग के समान कोई सुख नहीं है । समस्त कामनाओं—मान, बड़ाई, स्वाद, शौकीनी, सुख-भोग, आलस्य आदि का परित्याग करके केवल भगवान की शरण लेने से ही मनुष्य ब्रह्मभाव को प्राप्त हो जाता है ।

नहीं है भोग की वांछा न दिल में लालसा धन की ।
प्यास दरसन की भारी है सफल कर आस को मेरी ll


गोपाष्टमी


🌿✨ शुभ गोपाष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ! ✨🌿

📜 पद्म पुराण — कार्तिक माहात्म्य
शुक्लाष्टमी कार्तिके तु स्मृता गोपाष्टमी बुधैः।
तद्दिनाद् वासुदेवोऽभूद् गोपः पूर्वं तु वत्सपः॥

अर्थ:
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को विद्वानजन गोपाष्टमी कहते हैं।
इसी दिन से श्रीकृष्ण ने बछड़ों की सेवा छोड़कर गौमाता की सेवा प्रारंभ की —
अर्थात् वे उस दिन से गोप (ग्वाला) बने। 🐄💫
 

🌺 इस दिन भगवान श्रीकृष्ण एक योग्य गोपाल बने।

इस दिन से पहले वे केवल बछड़ों के रक्षक थे।  

“इस प्रकार श्रीकृष्ण अपने बड़े भाई बलराम के साथ कौमार अवस्था पार कर *पौगण्ड* अवस्था में प्रवेश करते हैं — यह अवस्था लगभग छठे वर्ष से दसवें वर्ष तक की होती है।  

उस समय व्रज के ग्वाल-बालकों के पिता आपस में विचार-विमर्श करके यह निर्णय लेते हैं कि जो बालक पाँच वर्ष की आयु पार कर चुके हैं, उन्हें गौओं की चरवाही का कार्य सौंपा जाए।  
इस प्रकार श्रीकृष्ण और बलराम को गौओं की सेवा का दायित्व दिया गया, और वे वृन्दावन की भूमि को अपने चरणकमलों से पवित्र करते हुए विचरण करने लगे।”


🙏 हरे कृष्ण! 🙏  
🪔 शुभ गोपाष्टमी! 🪔

सावन सोमवार 2025 की तिथियाँ और व्रत का महत्व – जानिए सभी सोमवारी की तिथियाँ



 सावन सोमवार 2025 की तिथियाँ और महत्व


🌿 सावन सोमवार 2025 की तिथियाँ: शिवभक्ति का पावन अवसर


सावन मास भगवान शिव की भक्ति का महीना होता है और इस मास के सोमवार का विशेष महत्व होता है। इसे “सावन सोमवारी व्रत” कहते हैं, जिसमें भक्तगण उपवास रखकर जल, दूध, बेलपत्र आदि से शिवलिंग का अभिषेक करते हैं।


📅 सावन सोमवार 2025 की तिथियाँ 

(Sawan Somwar Dates 2025)


उत्तर भारत (पूर्णिमा से शुरू पंचांग) अनुसार:-


 

  • पहला सोमवार – 14 जुलाई 2025

 

  • दूसरा सोमवार – 21 जुलाई 2025

 

  • तीसरा सोमवार – 28 जुलाई 2025

 

  • चौथा सोमवार – 4 अगस्त 2025

 

  • पाँचवाँ सोमवार – 11 अगस्त 2025



उत्तर भारत में सावन 13 जुलाई 2025 से शुरू होकर 12 अगस्त 2025 तक रहेगा।



🔱 सावन सोमवार का महत्व


  • हर सोमवार को व्रत रखकर भगवान शिव की कृपा प्राप्त की जाती है।

 

  • कुंवारी कन्याएं अच्छा वर प्राप्त करने के लिए यह व्रत करती हैं।

 

  • विवाहित महिलाएं पति की लंबी उम्र और सुखी जीवन की कामना से यह व्रत रखती हैं।

 

  • ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप इस समय विशेष फलदायक माना जाता है।

 


🔱क्या करें सावन सोमवार को


  • प्रातः स्नान कर शिवलिंग पर जल और दूध चढ़ाएं।
  • बेलपत्र, धतूरा, आक, शहद और दही अर्पित करें।
  • "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का 108 बार जाप करें।
  • दिन भर फलाहार करें और संध्या को शिव आरती करें।



सावन सोमवार वह पावन दिन है जब शिव अपने भक्तों के सबसे निकट होते हैं। इन पांच पावन सोमवारों में सच्चे मन से की गई भक्ति निश्चित रूप से मनोकामना पूर्ण करती है।



निष्कर्ष:


सावन के सोमवार भगवान शिव को समर्पित पावन दिन होते हैं। इन तिथियों पर व्रत रखकर शिव का पूजन करने से समस्त कष्ट दूर होते हैं और जीवन में सुख-शांति आती है।






तीन अनमोल सूत्र (मेंहनत, धर्म, मौन )

 तीन अनमोल सूत्र 

Three precious sutras (hard work, religion, silence)

मेंहनत करने से दरिद्रता, धर्म करने से पाप और मौन धारण करने से कभी भी कलह नहीं रहता है।"

मेहनत - केवल मेहनत करना ही पर्याप्त नहीं अपितु उचित दिशा में अथवा तो एक ही दिशा में मेहनत करना भी अनिवार्य हो जाता है। उचित समय एवं उचित दिशा में की गई मेहनत सदैव जीवन उन्नति का मूल होती है। 

 

धर्म - सत्य, प्रेम और करुणा ये धर्म का मूल है। धर्म को समग्रता की दृष्टि से देखा जाए तो परोपकार, परमार्थ, प्राणीमात्र की सेवा, सद्कर्म, श्रेष्ठ कर्म, सद ग्रंथ अथवा तो सत्संग का आश्रय, ये सभी धर्म के ही रूप हैं। जब व्यक्ति द्वारा इन दैवीय गुणों को जीवन में उतारा जाता है तो उसकी पाप की वृत्तियां स्वतः नष्ट होने लगती हैं।

 

मौन - मौन का टूटना ही परिवार में अथवा तो समाज में कलह को जन्म देता है। विवाद रूपी विष की बेल काटने के लिए मौन एक प्रबल हथियार है।आवेश के क्षणों में यदि मौन रुपी औषधि का पान किया जाए तो विवाद रुपी रोग का जन्म संभव ही नहीं। 

 

आवेश के क्षणों में मौन धारण करते हुए धर्म मार्ग का आश्रय लेकर पूरे मनोयोग से मेहनत करो, यही सफलतम जीवन का सूत्र है।



वेद

 वेद



हिंदू धर्म की नींव वेद प्राचीन संस्कृत ग्रंथों का एक संग्रह है जिन्हें हिंदू धर्म का मूलभूत ग्रंथ माना जाता है। उन्हें श्रुति के रूप में सम्मानित किया जाता है, जिसका अर्थ है "जो सुना जाता है," जिसका अर्थ दिव्य रहस्योद्घाटन है।


 चार वेद

 ऋग्वेद:- मुख्य रूप से विभिन्न देवताओं को संबोधित भजनों, प्रार्थनाओं और आह्वानों का संग्रह। यह वैदिक काल के ब्रह्मांड विज्ञान, पौराणिक कथाओं और सामाजिक संरचना में अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।

 

सामवेद:-  इसमें धार्मिक प्रयोजनों के लिए उपयोग की जाने वाली धुनें और मंत्र शामिल हैं। इसकी अधिकांश सामग्री ऋग्वेद से ली गई है। 


यजुर्वेद:- मुख्य रूप से अनुष्ठानों और बलिदानों के संचालन के लिए गद्य सूत्रों का एक संग्रह। इसमें पद्य और गद्य दोनों अनुभाग सम्मिलित हैं। 


अथर्ववेद:- बीमारियों, बुरी ताकतों और अन्य सांसारिक समस्याओं से सुरक्षा के लिए मंत्र, मंत्र और आकर्षण पर केंद्रित है। इसमें घरेलू अनुष्ठानों और जादू से संबंधित भजन भी शामिल हैं।

 

संहिताओं से परे: जबकि वेदों को मुख्य रूप से इन चार संहिताओं (संग्रहों) में विभाजित किया गया है, वैदिक साहित्य में ये भी शामिल हैं: 


ब्राह्मण:- संहिताओं में वर्णित अनुष्ठानों पर टिप्पणियाँ। 


अरण्यक:- वनवासियों के लिए ग्रंथ, जिनमें दार्शनिक और रहस्यमय अटकलें शामिल हैं। 


उपनिषद:- दार्शनिक ग्रंथ वास्तविकता की प्रकृति, आत्मा और मुक्ति (मोक्ष) के मार्ग की खोज करते हैं।


 वेद और उनसे जुड़े ग्रंथ हिंदू दर्शन, अनुष्ठान और विश्वदृष्टि का आधार बनते हैं। विद्वानों और अभ्यासकर्ताओं द्वारा समान रूप से उनका अध्ययन और व्याख्या जारी है।


Bhagavad Gita Updesh in Hindi

श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश 

(Bhagavad Gita Updesh in Hindi)


भगवद्गीता हिंदू धर्म का एक पवित्र ग्रंथ है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म, धर्म, ज्ञान और भक्ति का उपदेश दिया। यह 18 अध्यायों और 700 श्लोकों में समाया हुआ है।


 भगवद्गीता के मुख्य उपदेश 

(Key Teachings in Hindi)



1. कर्म योग (निष्काम कर्म का सिद्धांत)

- "कर्म करो, फल की इच्छा मत करो।" (2.47)  
- भगवान कृष्ण कहते हैं कि हमें अपना कर्तव्य (धर्म) निःस्वार्थ भाव से करना चाहिए, लेकिन फल की चिंता नहीं करनी चाहिए।  

2. आत्मा अमर है (अजर-अमर आत्मा का ज्ञान)

- "आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है।" (2.20)  
- शरीर नश्वर है, लेकिन *आत्मा अनश्वर* है। मृत्यु से डरना व्यर्थ है।

3. मन की शक्ति (मन पर विजय)

- "मन ही मनुष्य का मित्र है और मन ही शत्रु भी।" (6.5)  
- अगर मन को वश में कर लिया जाए, तो यह *सबसे बड़ा सहायक* बन जाता है।  

4. समदर्शी भाव (सुख-दुःख में समान भाव)

- "सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय में समान भाव रखो।" (2.38)  
- जो व्यक्ति हर स्थिति में शांत रहता है, वही योगी है।

5. भक्ति योग (ईश्वर की शरणागति)
  
- "सभी धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ, मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा।" (18.66)  
- भगवान की भक्ति ही मोक्ष का मार्ग है।  

6. त्याग और संन्यास का सही अर्थ
 
- "कर्म करो, लेकिन फल का मोह छोड़ दो।" (5.10)  
- संन्यास का मतलब कर्म छोड़ना नहीं, बल्कि फल की इच्छा छोड़ना है।

 7. ज्ञान योग (सच्चा ज्ञान क्या है?) 

- "जो मुझे सबमें और सबको मुझमें देखता है, वही सच्चा ज्ञानी है।" (6.30)  
- ईश्वर सर्वव्यापी है, इस ज्ञान से अहंकार नष्ट होता है।  

8. ध्यान योग (मन की एकाग्रता)  

- "जैसे दीपक हवा रहित स्थान पर स्थिर रहता है, वैसे ही योगी का मन भगवान में स्थिर होता है।" (6.19)  
- ध्यान से मन शांत होता है और आत्मज्ञान प्राप्त होता है।

 9. प्रकृति के तीन गुण (सत्त्व, रजस, तमस)
  
- "सत्त्वगुण शांति देता है, रजोगुण कर्मप्रेरित करता है, तमोगुण अज्ञान में डालता है।" (14.5-9)  
- इन तीनों गुणों से ऊपर उठकर ही मुक्ति संभव है।  

10. निष्ठा और समर्पण
 
- "जो भक्त जिस भाव से मुझे याद करता है, मैं उसे उसी रूप में प्राप्त होता हूँ।" (4.11)  
- ईश्वर भक्त के प्रेम के अनुसार स्वयं को प्रकट करते हैं।।

 जीवन में समय चाहे जैसा भी हो,
परिवार के साथ रहो, सुख हो तो बढ़ जाता है,
और दुःख हो तो बंट जाता है!

– श्रीकृष्ण ज्ञान
 जीवन में अगर धैर्य को अपना मित्र बना लिया,
तो हम जो चाहें वो पा सकते हैं..!

 "क्रोध से भ्रम उत्पन्न होता है, भ्रम से बुद्धि व्यर्थ हो जाती है।"

(भगवद गीता 2.63)
👉 क्रोध को त्यागना आवश्यक है, क्योंकि यह विवेक को नष्ट करता है।

ll श्रीमद भगवद गीता ll


 "जो मन को नियंत्रित नहीं करता, वह उसका शत्रु बन जाता है।"
(भगवद गीता 6.6)

👉 आत्म-संयम और मन का नियंत्रण ही सफलता की कुंजी है।

|| श्रीमद भगवद गीता ।।
 "जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अवतार लेता हूँ।"
(भगवद गीता 4.7)

👉 श्रीकृष्ण का यह वचन धर्म की पुनःस्थापना का प्रतीक है।

|| श्रीमद भगवद गीता ।।

  गीता किसके लिए उपयोगी है?


- जो जीवन में शांति चाहते हैं।  

- जो कर्म करते हुए भी मोक्ष पाना चाहते हैं।  

- जो मन की चंचलता से परेशान हैं।  

- जो सफलता और असफलता में समभाव रखना चाहते हैं।  

"गीता ज्ञान का अथाह सागर है, जिसमें डुबकी लगाने वाला हर व्यक्ति जीवन का सच्चा मार्ग पा लेता है।"


गीता का सार 

(Essence of Bhagavad Gita in Hindi)


✅ कर्म करो, लेकिन फल की चिंता मत करो।

✅ मन को वश में करो, यही सच्चा योग है।

✅ ईश्वर सर्वत्र हैं, सभी में उन्हें देखो।

✅ सुख-दुःख में समान भाव रखो।

✅ अंततः भगवान की शरण में जाना ही मोक्ष है।




सुविचार


इंसान की परेशानियों की केवल दो ही वजह है

वह भाग्य से अधिक उम्मीद करता है..
और समय से पहले चाहता है.! 

!! राधे राधे !!


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श्री कृष्ण कहते हैं,

हानि हुई हैं तो भविष्य में
लाभ भी होगा..

और यदि छल हुआ हैं
तो आगे चलकर हिसाब भी होगा..!

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सिर्फ दिखावे के लिए अच्छे मत बनो 
ऊपर वाला तुम्हें बाहर से नहीं 
भीतर से भी जानता है..!!

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सही समय की प्रतीक्षा करना मूर्खता है

 किसी चीज़ को शुरू करने के लिए कभी कोई सही समय नहीं होता। 
मनुष्य जब कोई चीज़ शुरू करता है, वही उसके लिए सही समय होता है।
जो मनुष्य सही समय के इंतज़ार में रहता है, उसके लिए सही समय कभी नहीं आता और वह कभी भी अपने काम को शुरू नहीं कर पाता।
ऐसे मनुष्य जीवन भर सही समय का इंतज़ार करते ही रह जाते हैं और कभी सफलता प्राप्त नहीं कर पाते।

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Daily Quotes



बुराई वही करते हैं जो बराबरी नहीं कर सकते..



एक मर्द की कामयाबी के पीछे
उसके बूढ़े बाप की जवानी होती है...!! 



वक़्त, दोस्त, और रिश्ते,
वो चीज़ें हैं
जो मिलती तो मुफ़्त में हैं
मगर इनकी कीमत का
पता तब चलता है
जब ये कहीं खो जाते हैं...


अगर कर्म पर विश्वास
और भगवान पर श्रद्धा रखोगे,
तो समय कितना भी बुरा क्यों न हो,
रास्ता अवश्य मिल जाएगा..!



     सुंदर औरत और
     कमाऊ पुरुष के
 अलावा यहाँ जो भी हैं
      समाज उसे रद्दी
        समझता हैं।



      कल मैं होशियार था,
         इसलिए मैं
    दुनिया को बदलना
         चाहता था।
   आज मैं बुद्धिमान हूँ,
         इसलिए
   मैं अपने आप को
     बदल रहा हूँ।

  🙇‍♂ जय श्री कृष्णा 🙇‍♂

गीता का सार क्या है? – आधुनिक जीवन के लिए भगवद गीता की शिक्षा



🕉️ गीता का सार क्या है? – आधुनिक जीवन के लिए भगवद गीता की शिक्षा






🔶 प्रस्तावना

भगवद गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, यह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र के लिए मार्गदर्शक है। अर्जुन को युद्धभूमि में उपदेश देते हुए श्रीकृष्ण ने जो ज्ञान दिया, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना महाभारत के समय था। चाहे मानसिक तनाव हो, निर्णय की दुविधा, या आत्मिक उलझन — गीता हर स्थिति में स्पष्टता और स्थिरता प्रदान करती है।





🔶 भगवद गीता की मूल संरचना


700 श्लोक, 18 अध्यायों में विभाजित

श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद

युद्धभूमि में दिया गया उपदेश — "धर्म" और "कर्म" का यथार्थ ज्ञान




🔶 गीता के प्रमुख विषय



1. कर्मयोग –

कर्तव्य करो, फल की चिंता मत करो।

श्रीकृष्ण कहते हैं:


 "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन"
(अध्याय 2, श्लोक 47)






2. ज्ञानयोग –

"मैं कौन हूँ?" आत्मा का स्वरूप, माया और ब्रह्मा का भेद



3. भक्तियोग –

श्रद्धा और समर्पण से ईश्वर प्राप्ति

"समर्पण ही मोक्ष का द्वार है"



4. धर्म का पालन –

अपने स्वधर्म को निभाना ही सच्चा जीवन है |




🔶 गीता के कुछ अमूल्य श्लोक



🔸 1. कर्म का अधिकार

 "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन"



🔸 2. अकर्म भी एक कर्म है

 "न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्"

(कोई भी व्यक्ति एक क्षण भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता)





🔸 3. धर्म की रक्षा हेतु अवतार

" यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत..."  (अध्याय 4, श्लोक 7)




🔶 आधुनिक जीवन में गीता की शिक्षा



* तनाव और चिंता में सहारा

जब जीवन अनिश्चित हो, गीता हमें आंतरिक शांति की ओर ले जाती है





* काम में स्थिरता

कर्मयोग सिखाता है — काम को पूजा की तरह करें, बिना फल की चिंता के


* इच्छाओं पर नियंत्रण

इच्छाएँ ही दुःख का मूल कारण हैं — गीता में इसे स्पष्ट किया गया है





* आत्मिक संतुलन

स्वयं को जानना और परिस्थितियों में स्थिर रहना — यही योग है




🔶 गीता का व्यावहारिक उपयोग



समस्या समाधान गीता से



निर्णय में उलझन "कर्तव्य पहचानो, मोह छोड़ो"

तनाव और भय "अहंकार छोड़ो, आत्मा अमर है"

फल की चिंता "कर्म करो, फल भगवान पर छोड़ो"

आत्म-हीनता "तुम आत्मा हो – अजर, अमर, अपराजेय"



🔶 निष्कर्ष

भगवद गीता कोई कल्पनाओं की पुस्तक नहीं, यह जीवन का विज्ञान है।

यह सिखाती है कि :-


कर्म कैसे करना है

जीवन में धर्म क्या है

माया से कैसे मुक्त होना है

और अंततः – मोक्ष कैसे प्राप्त करना है




आज के युग में जहाँ इंसान बाहरी प्रगति कर रहा है, वहाँ आंतरिक स्थिरता के लिए गीता ही प्रकाशस्तंभ है।


 "गीता न केवल पढ़ी जाए, बल्कि जिया जाए"




रामायण के प्रमुख पात्र और उनका संदेश

🕉️ रामायण के प्रमुख पात्र और उनका संदेश 🕉️

Major characters of Ramayana and their message

| पात्र | जीवन शिक्षा |  
|----------------|----------------|  

 

| राम | धर्म, कर्तव्य और मर्यादा के प्रतीक |  

 

| सीता | पतिव्रत धर्म, सहनशीलता और बलिदान |  

 

| लक्ष्मण | भ्रातृ प्रेम और सेवाभाव | 
 
| हनुमान | भक्ति, शक्ति और विनम्रता |  

 

| रावण | अहंकार और पाप का परिणाम |  

 

| भरत | त्याग और अनुज प्रेम |  





🛕🛕रामायण का आध्यात्मिक संदेश 🛕🛕


- "राम" शब्द का अर्थ है "आनंद देने वाला" (रम्यते इति रामः)।  


- रामायण सिखाती है कि मनुष्य को धर्म के मार्ग पर चलते हुए कर्म करना चाहिए, फल की इच्छा नहीं करनी चाहिए।  


- "रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई" → यह वचनबद्धता और सत्य का महत्व बताता है।  

7 Life Lessons from Ramayana

📜 रामायण की 7 प्रमुख शिक्षाएं 📜
(7 Life Lessons from Ramayana)


1. सत्य की जीत होती है। (असत्य का अंत निश्चित है।)  

2. धर्म का मार्ग कठिन हो सकता है, लेकिन अंत में विजय मिलती है।

3. अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।* (रावण का उदाहरण)  

4. भक्ति और समर्पण से हर लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।  (हनुमान जी)  

5. परिवार और समाज में कर्तव्य सर्वोपरि होना चाहिए।

6. स्त्री का सम्मान करो (माता सीता का सम्मान और रावण की सीख)।  

7. अच्छे मित्र और सहयोगी जीवन में सफलता दिलाते हैं। (सुग्रीव, हनुमान, जाम्बवंत)

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जून 2025 में कई महत्वपूर्ण हिंदू त्यौहार और व्रत

जून 2025 में कई महत्वपूर्ण हिंदू त्यौहार और व्रत पड़ रहे हैं। कुछ प्रमुख त्योहारों की सूची दी गई है:
जून 2025 के प्रमुख हिंदू त्यौहार :- 


 5 जून 2025, गुरुवार: गंगा दशहरा

 6 जून 2025, शुक्रवार: निर्जला एकादशी

 8 जून 2025, रविवार: प्रदोष व्रत (शुक्ल)

 10 जून 2025, मंगलवार: वट पूर्णिमा व्रत (दक्षिण भारतीय)

 11 जून 2025, बुधवार: ज्येष्ठ पूर्णिमा व्रत, कबीरदास जयंती

 14 जून 2025, शनिवार: संकष्टी गणेश चतुर्थी (कृष्ण पिंगल संकष्टी चतुर्थी)

 15 जून 2025, रविवार: मिथुन संक्रांति

 21 जून 2025, शनिवार: योगिनी एकादशी

 23 जून 2025, सोमवार: मासिक शिवरात्रि, प्रदोष व्रत (कृष्ण)

 25 जून 2025, बुधवार: आषाढ़ अमावस्या

 26 जून 2025, गुरुवार: आषाढ़ गुप्त नवरात्रि प्रारंभ

 27 जून 2025, शुक्रवार: जगन्नाथ रथ यात्रा

यह सूची जून 2025 में पड़ने वाले मुख्य हिंदू त्योहारों और व्रतों को दर्शाती है।


Some of the major festivals and fasts of Hinduism in May 2025 are as follows 

मई 2025 में हिंदू धर्म के कुछ प्रमुख त्योहार और व्रत इस प्रकार हैं 



 1 मई, गुरुवार: विनायकी चतुर्थी व्रत

2 मई, शुक्रवार: शंकराचार्य जयंती, सूरदास जयंती, रामानुज जयंती, स्कंद षष्ठी

3 मई, शनिवार: गंगा सप्तमी

 4 मई, रविवार: भानु सप्तमी, अग्नि नक्षत्र प्रारंभ

 5 मई, सोमवार: सीता नवमी, बगलामुखी जयंती, मासिक दुर्गाष्टमी

 8 मई, गुरुवार: मोहिनी एकादशी, परशुराम द्वादशी

 9 मई, शुक्रवार: प्रदोष व्रत (शुक्ल)

11 मई, रविवार: नृसिंह जयंती, छिन्नमस्ता जयंती, मातृ दिवस (अंतर्राष्ट्रीय)

 12 मई, सोमवार: वैशाख पूर्णिमा व्रत, बुद्ध पूर्णिमा, कूर्म जयंती, चित्रा पौर्णमी

 13 मई, मंगलवार: नारद जयंती, ज्येष्ठ मास आरंभ

 15 मई, गुरुवार: वृषभ संक्रांति

 16 मई, शुक्रवार: एकदंत संकष्टी चतुर्थी

 20 मई, मंगलवार: कालाष्टमी, मासिक कृष्ण जन्माष्टमी

 22 मई, गुरुवार: हनुमान जयंती (तेलुगु)

 23 मई, शुक्रवार: अपरा एकादशी

 24 मई, शनिवार: शनि त्रयोदशी, प्रदोष व्रत (कृष्ण)

 25 मई, रविवार: मासिक शिवरात्रि

 26 मई, सोमवार: वट सावित्री व्रत, दर्श अमावस्या

 27 मई, मंगलवार: शनि जयंती, ज्येष्ठ अमावस्या

 29 मई, गुरुवार: महाराणा प्रताप जयंती

 30 मई, शुक्रवार: विनायक चतुर्थी


यह सूची मुख्य त्योहारों और व्रतों की है ।

How to follow religion in Kaliyuga?

कलियुग में धर्म का पालन कैसे करें?




हिंदू धर्म के अनुसार, वर्तमान समय को "कलियुग" कहा जाता है, जो चार युगों में अंतिम और सबसे जटिल युग है। इस युग में अधर्म और असत्य का प्रभाव अधिक होता है, लेकिन फिर भी व्यक्ति अपने सद्कर्मों और सच्चे आचरण के माध्यम से धर्म का पालन कर सकता है।

धर्म बड़ा या ज्ञान

धर्म बड़ा या ज्ञान धर्म और ज्ञान दोनों ही जीवन के लिए अनिवार्य हैं, लेकिन धर्म (नैतिकता/कर्तव्य) को ज्ञान से बड़ा माना जाता है। क...