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तीन अनमोल सूत्र (मेंहनत, धर्म, मौन )

 तीन अनमोल सूत्र 

Three precious sutras (hard work, religion, silence)

मेंहनत करने से दरिद्रता, धर्म करने से पाप और मौन धारण करने से कभी भी कलह नहीं रहता है।"

मेहनत - केवल मेहनत करना ही पर्याप्त नहीं अपितु उचित दिशा में अथवा तो एक ही दिशा में मेहनत करना भी अनिवार्य हो जाता है। उचित समय एवं उचित दिशा में की गई मेहनत सदैव जीवन उन्नति का मूल होती है। 

 

धर्म - सत्य, प्रेम और करुणा ये धर्म का मूल है। धर्म को समग्रता की दृष्टि से देखा जाए तो परोपकार, परमार्थ, प्राणीमात्र की सेवा, सद्कर्म, श्रेष्ठ कर्म, सद ग्रंथ अथवा तो सत्संग का आश्रय, ये सभी धर्म के ही रूप हैं। जब व्यक्ति द्वारा इन दैवीय गुणों को जीवन में उतारा जाता है तो उसकी पाप की वृत्तियां स्वतः नष्ट होने लगती हैं।

 

मौन - मौन का टूटना ही परिवार में अथवा तो समाज में कलह को जन्म देता है। विवाद रूपी विष की बेल काटने के लिए मौन एक प्रबल हथियार है।आवेश के क्षणों में यदि मौन रुपी औषधि का पान किया जाए तो विवाद रुपी रोग का जन्म संभव ही नहीं। 

 

आवेश के क्षणों में मौन धारण करते हुए धर्म मार्ग का आश्रय लेकर पूरे मनोयोग से मेहनत करो, यही सफलतम जीवन का सूत्र है।



How to follow religion in Kaliyuga?

कलियुग में धर्म का पालन कैसे करें?




हिंदू धर्म के अनुसार, वर्तमान समय को "कलियुग" कहा जाता है, जो चार युगों में अंतिम और सबसे जटिल युग है। इस युग में अधर्म और असत्य का प्रभाव अधिक होता है, लेकिन फिर भी व्यक्ति अपने सद्कर्मों और सच्चे आचरण के माध्यम से धर्म का पालन कर सकता है।

Hindu New Year: A New Beginning

हिंदू नववर्ष : एक नई शुरुआत 



"यथा शिखा मयूराणां, नागानां मणयो यथा। तद्वद् वेदाङ्गशास्त्राणां, गणितं मूर्ध्नि स्थितम्।।"


हिंदू नववर्ष भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा का एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों और तिथियों में मनाया जाता है, लेकिन सभी का उद्देश्य एक ही है—नए वर्ष का स्वागत, नई ऊर्जा का संचार और भगवान से आशीर्वाद की प्रार्थना।


Hanuman ji was an enlightened scholar of the Vedas.



 न अन् ऋग्वेद विनीतस्य न अ यजुर्वेद धारिणः ।
न अ-साम वेद विदुषः शक्यम् एवम् विभाषितुम् ।। 
वाल्मीकि रामायण 4/3/28

राम कहते हैं कि जिस व्यक्ति से मैंने अभी-अभी बात की थी, वह ऋग्वेद में अच्छी तरह से प्रशिक्षित था, उसके पास यजुर्वेद, सामवेद के विद्वतापूर्ण ज्ञान को याद करने की अपार शक्ति है। वैदिक व्याकरण और संबंधित ग्रंथों के विद्वतापूर्ण आदेश के बिना इस प्रकार की प्रभावशाली और हृदयस्पर्शी बात असंभव है। इस प्रकार, श्री राम ने स्वीकार किया कि हनुमान जी वेदों के प्रबुद्ध विद्वान थे।

 

Rama says that the person with whom I just talked was well trained in the Rigveda, has enormous power to remember Yajurveda, scholarly knowledge of Samaveda. This type of impressive and heart-touching talk is impossible without a scholarly command of Vedic grammar and related texts. Thus, Shri Rama acknowledged that Hanuman Ji was an enlightened scholar of the Vedas.


Who Harmed Religion and Devotion

 



श्रीमद्भागवत में स्पष्ट रूप से आया है की जब कलियुग ने गौ और गौवंश पर अत्याचार करना शुरू किया और राजा परीक्षित ने उनसे प्रश्न किया कि किसने धर्म और भक्ति को हानि पहुँचायी है तो धर्म बोल पड़ा  ........


राजन, हमारे उपर होने वाले अत्याचार से हम तो नष्ट हो जाएँगे और जो अत्याचार करेंगे उन्हें पाप भी लगेगा पर उससे अधिक पाप उन्हें लगेगा जो चुपचाप धर्म की हानि होता हुआ देखेंगे या उन गौ वध करने वाले आततायियों से कोई संबंध रखेंगे ।


अतः वे सभी लोग जो आज चुप बैठे हैं या विधर्मियों से किसी भी प्रकार का व्यापारिक व्यवहारिक मानसिक संबंध रखे हैं वे सब भी उन सब कुकर्म ( जैसे रामनवमी पर पत्थर बाज़ी ) में सम्मिलित हैं ।और यदि आज भी न जगे तो दुर्दिन के लिए तैयार हो जाएँ ।


कायर बनकर या फिर " मुझे क्या " की मानसिकता वाले  हिंदुनामधारी उन मलेच्छों से भी अधिक पापी हैं।


@wayoflifekarma

हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाने की परंपरा और साक्ष्य

हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाने की परंपरा और साक्ष्य

हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाने की परंपरा का उल्लेख विभिन्न पुराणों और ग्रंथों में मिलता है। यह परंपरा उनकी असीम भक्ति, बल, और संकटमोचक स्वरूप से जुड़ी हुई है।


1. हनुमान जी और सिंदूर से जुड़ी कथा


वाल्मीकि रामायण और अन्य पुराणों में हनुमान जी की भक्ति के अनेक प्रसंग मिलते हैं, लेकिन सिंदूर चढ़ाने की प्रथा से जुड़ी मुख्य कथा इस प्रकार है—


एक बार माता सीता ने हनुमान जी को यह बताया कि भगवान श्रीराम उनके सिंदूर लगाने से प्रसन्न होते हैं और उनकी लंबी आयु होती है। यह सुनकर हनुमान जी ने सोचा कि यदि थोड़ा सा सिंदूर लगाने से श्रीराम इतने प्रसन्न होते हैं, तो यदि वे पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लें तो प्रभु और अधिक प्रसन्न होंगे और उनकी आयु अनंत हो जाएगी। इसी विचार से हनुमान जी ने अपने पूरे शरीर को सिंदूर से रंग लिया।


जब श्रीराम ने हनुमान जी को इस रूप में देखा, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने आशीर्वाद दिया कि जो भी भक्त हनुमान जी को सिंदूर अर्पित करेगा, उसे उनका आशीर्वाद प्राप्त होगा और उसके सभी कष्ट दूर होंगे।


2. पुराणों और ग्रंथों में साक्ष्य


(i) ब्रह्मवैवर्त पुराण


ब्रह्मवैवर्त पुराण में हनुमान जी की भक्ति और श्रीराम के प्रति उनकी श्रद्धा का विस्तार से उल्लेख है, जिसमें कहा गया है कि हनुमान जी अपने आराध्य को प्रसन्न करने के लिए विभिन्न उपाय अपनाते थे।


(ii) स्कंद पुराण


स्कंद पुराण में उल्लेख मिलता है कि हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाने से भक्त की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और उसे बल, बुद्धि और विद्या की प्राप्ति होती है।


(iii) तुलसीदास रचित रामचरितमानस


रामचरितमानस में हनुमान जी के बल, भक्ति और श्रीराम के प्रति उनकी निष्ठा का वर्णन किया गया है। सिंदूर से जुड़ी कथा का सीधा उल्लेख तो नहीं है, लेकिन उनकी भक्ति को सर्वोपरि बताया गया है।


3. धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व


1. सिंदूर को शक्ति और विजय का प्रतीक माना जाता है, इसलिए हनुमान जी को इसे अर्पित किया जाता है।

2. सिंदूर चढ़ाने से भक्तों को संकटों से मुक्ति मिलती है, क्योंकि हनुमान जी को "संकटमोचक" कहा जाता है।

3. शक्तिपीठों में भी सिंदूर का विशेष महत्व होता है, और हनुमान जी शक्ति के प्रतीक माने जाते हैं।


4. आज की परंपरा में प्रचलन


हर मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी के भक्त सिंदूर और चमेली का तेल चढ़ाते हैं।

यह विशेष रूप से उत्तर भारत में प्रचलित परंपरा है, जहाँ भक्त उनके चरणों में सिंदूर चढ़ाकर संकटों से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं।


निष्कर्ष


हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाने की परंपरा एक पौराणिक कथा से जुड़ी हुई है और इसका उल्लेख विभिन्न ग्रंथों में मिलता है। यह परंपरा शक्ति, भक्ति और श्रीराम के प्रति उनकी असीम निष्ठा को दर्शाती है। धार्मिक दृष्टि से भी इसे शुभ माना जाता है और इससे भक्तों को मानसिक और आध्यात्मिक बल प्राप्त होता है।


Hindu Calendar Months

हिंदू कैलेंडर में 12 महीनों के नाम होते हैं, जो चंद्र महीनों पर आधारित होते हैं। ये नाम निम्नलिखित हैं:-





1. चैत्र (Chaitra): मार्च-अप्रैल


2. वैशाख (Vaishakha): अप्रैल-मई


3. ज्येष्ठ (Jyeshtha): मई-जून


4. आषाढ़ (Ashadha): जून-जुलाई


5. श्रावण (Shravana): जुलाई-अगस्त


6. भाद्रपद (Bhadrapada): अगस्त-सितंबर


7. आश्विन (Ashwin): सितंबर-अक्टूबर


8. कार्तिक (Kartika): अक्टूबर-नवंबर


9. मार्गशीर्ष (Margashirsha): नवंबर-दिसंबर


10. पौष (Pausha): दिसंबर-जनवरी


11. माघ (Magha): जनवरी-फरवरी


12. फाल्गुन (Phalguna): फरवरी-मार्च


विशेषताएँ:


ये नाम चंद्रमा के चरणों और ऋतुओं के आधार पर तय किए जाते हैं।


हर महीने में दो पक्ष (अमावस्या से पूर्णिमा तक का शुक्ल पक्ष और पूर्णिमा से अमावस्या तक का कृष्ण पक्ष) होते हैं।


इन महीनों का उपयोग धार्मिक त्योहारों और संस्कारों की तिथियों के निर्धारण में किया जाता है।



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Swami Vivekananda Jayanti: Celebration of a visionary


स्वामी विवेकानंद जयंती: एक युगदृष्टा का उत्सव


WOLK: Swami Vivekananda Jayanti: Celebration of a visionary


स्वामी विवेकानंद जयंती, जिसे राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में भी मनाया जाता है, हर साल 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद की जन्म तिथि के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। यह दिन न केवल उनके अद्वितीय जीवन और योगदान का सम्मान करता है, बल्कि युवा पीढ़ी को उनके विचारों और आदर्शों से प्रेरित होने का भी संदेश देता है। स्वामी विवेकानंद भारत के महानतम संतों में से एक थे, जिनकी शिक्षाओं ने न केवल भारत को, बल्कि पूरे विश्व को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मार्गदर्शन प्रदान किया।

In which month Khichdi is celebrated?

 



  • सूर्य संक्रांति में मकर सक्रांति का महत्व ही अधिक माना गया है।

  •  माघ माह में कृष्ण पंचमी को मकर सक्रांति देश के लगभग सभी राज्यों में अलग-अलग सांस्कृतिक रूपों में मनाई जाती है। 

  • इस बार 14 जनवरी 2025 को मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाएगा । 

  • खिचड़ी जनवरी महीने में मनाया जाता है |

  • 2025 की खिचड़ी 14 जनवरी को है | 

 

 

108 names of Lord Vishnu

 

Way Of Life Karma: भगवान विष्णु के 108 नाम

 





1) ऊँ श्री विष्णवे नम:


2) ऊँ श्री परमात्मने नम:


3) ऊँ श्री विराट पुरुषाय नम:


4) ऊँ श्री क्षेत्र क्षेत्राज्ञाय नम:


5) ऊँ श्री केशवाय नम:


6) ऊँ श्री पुरुषोत्तमाय नम:


7) ऊँ श्री ईश्वराय नम:


8) ऊँ श्री हृषीकेशाय नम:


9) ऊँ श्री पद्मनाभाय नम:


10) ऊँ श्री विश्वकर्मणे नम:


11) ऊँ श्री कृष्णाय नम:


12) ऊँ श्री प्रजापतये नम:


13) ऊँ श्री हिरण्यगर्भाय नम:


14) ऊँ श्री सुरेशाय नम:


15) ऊँ श्री सर्वदर्शनाय नम:


16) ऊँ श्री सर्वेश्वराय नम:


17) ऊँ श्री अच्युताय नम:


18) ऊँ श्री वासुदेवाय नम:


19) ऊँ श्री पुण्डरीक्षाय नम:


20) ऊँ श्री नर-नारायणा नम:


21) ऊँ श्री जनार्दनाय नम:


22) ऊँ श्री लोकाध्यक्षाय नम:


23) ऊँ श्री चतुर्भुजाय नम:


24) ऊँ श्री धर्माध्यक्षाय नम:


25) ऊँ श्री उपेन्द्राय नम:


26) ऊँ श्री माधवाय नम:


27) ऊँ श्री महाबलाय नम:


28) ऊँ श्री गोविन्दाय नम:


29) ऊँ श्री प्रजापतये नम:


30) ऊँ श्री विश्वातमने नम:


31) ऊँ श्री सहस्त्राक्षाय नम:


32) ऊँ श्री नारायणाय नम:


33) ऊँ श्री सिद्ध संकल्पयाय नम:


34) ऊँ श्री महेन्द्राय नम:


35) ऊँ श्री वामनाय नम:


36) ऊँ श्री अनन्तजिते नम:


37) ऊँ श्री महीधराय नम:


38) ऊँ श्री गरुडध्वजाय नम:


39) ऊँ श्री लक्ष्मीपतये नम:


40) ऊँ श्री दामोदराय नम:


41) ऊँ श्री कमलापतये नम:


42) ऊँ श्री परमेश्वराय नम:


43) ऊँ श्री धनेश्वराय नम:


44) ऊँ श्री मुकुन्दाय नम:


45) ऊँ श्री आनन्दाय नम:


46) ऊँ श्री सत्यधर्माय नम:


47) ऊँ श्री उपेन्द्राय नम:


48) ऊँ श्री चक्रगदाधराय नम:


49) ऊँ श्री भगवते नम:


50) ऊँ श्री शान्तिदाय नम:


51) ऊँ श्री गोपतये नम:


52) ऊँ श्री श्रीपतये नम:


53) ऊँ श्री श्रीहरये नम:


54) ऊँ श्री श्रीरघुनाथाय नम:


55) ऊँ श्री कपिलेश्वराय नम:


56) ऊँ श्री वाराहय नम:


57) ऊँ श्री नरसिंहाय नम:


58) ऊँ श्री रामाय नम:


59) ऊँ श्री हयग्रीवाय नम:


60) ऊँ श्री शोकनाशनाय नम:


61) ऊँ श्री विशुद्धात्मने नम:


62) ऊँ श्री केश्वाय नम:


63) ऊँ श्री धनंजाय नम:


64) ऊँ श्री ब्राह्मणप्रियाय नम:


65) ऊँ श्री श्री यदुश्रेष्ठाय नम:


66) ऊँ श्री लोकनाथाय नम:


67) ऊँ श्री भक्तवत्सलाय नम:


68) ऊँ श्री चतुर्मूर्तये नम:


69) ऊँ श्री एकपदे नम:


70) ऊँ श्री सुलोचनाय नम:


71) ऊँ श्री सर्वतोमुखाय नम:


72) ऊँ श्री सप्तवाहनाय नम:


73) ऊँ श्री वंशवर्धनाय नम:


74) ऊँ श्री योगिनेय नम:


75) ऊँ श्री धनुर्धराय नम:


76) ऊँ श्री प्रीतिवर्धनाय नम:


77) ऊँ श्री प्रीतिवर्धनाय नम:


78) ऊँ श्री अक्रूराय नम:


79) ऊँ श्री दु:स्वपननाशनाय नम:


80) ऊँ श्री भूभवे नम:


81) ऊँ श्री प्राणदाय नम:


82) ऊँ श्री देवकी नन्दनाय नम:


83) ऊँ श्री शंख भृते नम:


84) ऊँ श्री सुरेशाय नम:


85) ऊँ श्री कमलनयनाय नम:


86) ऊँ श्री जगतगुरूवे नम:


87) ऊँ श्री सनातन नम:


88) ऊँ श्री सच्चिदानन्दाय नम:


89) ऊँ श्री द्वारकानाथाय नम:


90) ऊँ श्री दानवेन्द्र विनाशकाय नम:


91) ऊँ श्री दयानिधि नम:


92) ऊँ श्री एकातम्ने नम:


93) ऊँ श्री शत्रुजिते नम:


94) ऊँ श्री घनश्यामाय नम:


95) ऊँ श्री लोकाध्यक्षाय नम:


96) ऊँ श्री जरा-मरण-वर्जिताय नम:


97) ऊँ श्री सर्वयज्ञफलप्रदाय नम:


98) ऊँ श्री विराटपुरुषाय नम:


99) ऊँ श्री यशोदानन्दनयाय नम:


100) ऊँ श्री परमधार्मिकाय नम:


101) ऊँ श्री गरुडध्वजाय नम:


102) ऊँ श्री प्रभवे नम:


103) ऊँ श्री लक्ष्मीकान्ताजाय नम:


104) ऊँ श्री गगनसदृश्यमाय नम:


105) ऊँ श्री वामनाय नम:


106) ऊँ श्री हंसाय नम:


107) ऊँ श्री वयासाय नम:


108) ऊँ श्री प्रकटाय नम:


🙏ॐ नमो नारायण 🙏



Who gets the vision of God?


Way Of Life Karma: ईश्वर के दर्शन किसे प्राप्त होते हैं ?
एक राजा था। वह बहुत न्याय प्रिय तथा प्रजा वत्सल एवं धार्मिक स्वभाव का था। वह नित्य अपने ठाकुर जी की बडी श्रद्धा से पूजा-पाठ और याद करता था।एक दिन ठाकुर जी ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिये तथा कहा- राजन् मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं। बोलो तुम्हारी कोई इच्छा हॆ ?

प्रजा को चाहने वाला राजा बोला - भगवन् मेरे पास आपका दिया सब कुछ हैं आपकी कृपा से राज्य मे सब प्रकार सुख-शान्ति है।फिर भी मेरी एक ही इच्छा हैं कि जैसे आपने मुझे दर्शन देकर धन्य किया,वैसे ही मेरी सारी प्रजा को भी कृपा कर दर्शन दीजिये।

यह तो सम्भव नहीं है !! -- ऐसा कहते हुए भगवान ने राजा को समझाया। परन्तु प्रजा को चाहने वाला राजा भगवान् से जिद्द् करने लगा।आखिर भगवान को अपने भक्ति के सामने झुकना पडा ओर वे बोले - ठीक है !! कल अपनी सारी प्रजा को उस पहाड़ी के पास ले आना और मैं पहाडी के ऊपर से सभी को दर्शन दूँगा।ये सुन कर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुआ और भगवान को धन्यवाद दिया।

राजा ने सारे नगर मे ढिंढोरा पिटवा दिया कि - कल सभी पहाड़ के नीचे मेरे साथ पहुँचे,वहाँ भगवान आप सबको दर्शन देगें। दूसरे दिन राजा अपने समस्त प्रजा और स्वजनों को साथ लेकर पहाडी की ओर चलने लगा।

चलते-चलते रास्ते मे एक स्थान पर तांबे कि सिक्कों का पहाड देखा।प्रजा में से कुछ एक लोग उस ओर भागने लगे।तभी ज्ञानी राजा ने सबको सर्तक किया कि कोई उस ओर ध्यान न दे, क्योकि तुम सब भगवान से मिलने जा रहे हो, इन तांबे के सिक्कों के पीछे अपने भाग्य को लात मत मारो।परन्तु लोभ-लालच मे वशीभूत प्रजा के कुछ एक लोग तो तांबे की सिक्कों वाली पहाड़ी की ओर भाग ही गये और सिक्कों कि गठरी बनाकर अपने घर कि ओर चलने लगे।वे मन ही मन सोच रहे थे,पहले ये सिक्कों को समेट ले,भगवान से तो फिर कभी मिल ही लेगे।

राजा खिन्न मन से आगे बढे।कुछ दूर चलने पर चांदी कि सिक्कों का चमचमाता पहाड़ दिखाई दिया। इस वार भी बचे हुये प्रजा में से कुछ लोग,उस ओर भागने लगे ओर चांदी के सिक्कों की गठरी बनाकर अपनी घर की ओर चलने लगे। उनके मन मे विचार चल रहा था कि ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता है।

चांदी के इतने सारे सिक्के फिर मिले न मिले,भगवान तो फिर कभी मिल ही जायेगें।

इसी प्रकार कुछ दूर और चलने पर सोने के सिक्कों का पहाड़ नजर आया। अब तो प्रजाजनो में बचे हुये सारे लोग तथा राजा के स्वजन भी उस ओर भागने लगे।
वे भी दूसरों की तरह सिक्कों कि गठरीयां लाद-लाद कर अपने-अपने घरों की ओर चल दिये।अब केवल राजा ओर रानी ही शेष रह गये थे। राजा रानी से कहने लगे --
देखो कितने लोभी ये लोग। भगवान से मिलने का महत्व ही नहीं जानते हैं। भगवान के सामने सारी दुनियां की दौलत क्या चीज हैं? 

सही बात है -- रानी ने राजा कि बात का समर्थन किया और वह आगे बढने लगे कुछ दूर चलने पर राजा ओर रानी ने देखा कि सप्तरंगि आभा बिखरता हीरों का पहाड़ है।

अब तो रानी से भी रहा नहीं गया,हीरों के आर्कषण से वह भी दौड पड़ी और हीरों कि गठरी बनाने लगी। फिर भी उसका मन नहीं भरा तो साड़ी के पल्लू मेँ भी बांधने लगी। वजन के कारण रानी के वस्त्र देह से अलग हो गये,परंतु हीरों का तृष्णा अभी भी नहीं मिटी। यह देख राजा को अत्यन्त ही ग्लानि ओर विरक्ति हुई।

 बड़े दुःखद मन से राजा अकेले ही आगे बढते गये।वहाँ सचमुच भगवान खड़े उसका इन्तजार कर रहे थे। 

राजा को देखते ही भगवान मुसकुराये ओर पुछा -
कहाँ है तुम्हारी प्रजा और तुम्हारे प्रियजन। मैं तो कब से उनसे मिलने के लिये बेकरारी से उनका इन्तजार कर रहा हूॅ। राजा ने शर्म और आत्म-ग्लानि से अपना सिर झुका दिया।

तब भगवान ने राजा को समझाया --
राजन !! जो लोग अपने जीवन में भौतिक सांसारिक प्राप्ति को मुझसे अधिक मानते हैं,उन्हें कदाचित मेरी प्राप्ति नहीं होती और वह मेरे स्नेह तथा कृपा से भी वंचित रह जाते हैं !!

कथा सार- जो जीव अपनी मन,बुद्धि और आत्मा से भगवान की शरण में जाते हैं और जो सर्व लौकिक मोह को छोड के प्रभु को ही अपना मानते हैं वो ही भगवान के दर्शन प्राप्त करते है..!!
   🙏🏻जय श्री कृष्ण🙏


16 mantras which every Sanatani should learn and teach to children

ये 16 मंत्र है जो हर सनातनी को सीखना और 

बच्चों को सिखाना चाहिए ।




1. Gayatri Mantra

            ॐ भूर्भुवः स्वः,

            तत्सवितुर्वरेण्यम् 

            भर्गो देवस्य धीमहि 

            धियो यो नः प्रचोदयात् ॥


2. Mahadev

          ॐ त्रम्बकं यजामहे, 

           सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ,

           उर्वारुकमिव बन्धनान्,

           मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् !!


3. Shri Ganesha

              वक्रतुंड महाकाय, 

              सूर्य कोटि समप्रभ 

              निर्विघ्नम कुरू मे देव,

              सर्वकार्येषु सर्वदा !!


4. Shri hari Vishnu

           मङ्गलम् भगवान विष्णुः,

           मङ्गलम् गरुणध्वजः।

           मङ्गलम् पुण्डरी काक्षः,

           मङ्गलाय तनो हरिः॥


5. Shri Brahma ji

             ॐ नमस्ते परमं ब्रह्मा,

              नमस्ते परमात्ने ।

              निर्गुणाय नमस्तुभ्यं,

              सदुयाय नमो नम:।।


6. Shri Krishna

               वसुदेवसुतं देवं,

               कंसचाणूरमर्दनम्।

               देवकी परमानन्दं,

               कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम।


7. Shri Ram

              श्री रामाय रामभद्राय,

               रामचन्द्राय वेधसे ।

               रघुनाथाय नाथाय,

               सीताया पतये नमः !


8. Maa Durga

            ॐ जयंती मंगला काली,

            भद्रकाली कपालिनी ।

            दुर्गा क्षमा शिवा धात्री,

            स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु‍ते।।


9. Maa Mahalakshmi

            ॐ सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो,

            धन धान्यः सुतान्वितः ।

            मनुष्यो मत्प्रसादेन,

            भविष्यति न संशयःॐ ।


10. Maa Saraswathi

            ॐ सरस्वति नमस्तुभ्यं,

             वरदे कामरूपिणि।

             विद्यारम्भं करिष्यामि,

             सिद्धिर्भवतु मे सदा ।।


11. Maa Mahakali

             ॐ क्रीं क्रीं क्रीं,

             हलीं ह्रीं खं स्फोटय,

             क्रीं क्रीं क्रीं फट !!


12. Hanuman ji

          मनोजवं मारुततुल्यवेगं,

          जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं।

          वातात्मजं वानरयूथमुख्यं,

          श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥


13. Shri Shanidev

             ॐ नीलांजनसमाभासं,

              रविपुत्रं यमाग्रजम ।

              छायामार्तण्डसम्भूतं, 

              तं नमामि शनैश्चरम्।।


14. Shri Kartikeya

        ॐ शारवाना-भावाया नम:,

         ज्ञानशक्तिधरा स्कंदा ,

         वल्लीईकल्याणा सुंदरा।

          देवसेना मन: कांता,

          कार्तिकेया नामोस्तुते।


15. Kaal Bhairav ji

          ॐ ह्रीं वां बटुकाये,

          क्षौं क्षौं आपदुद्धाराणाये,

          कुरु कुरु बटुकाये,

          ह्रीं बटुकाये स्वाहा।


16. Bharat Mata

     नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे

     त्वया हिन्दुभूमे सुखद् वर्धितोऽहम्

     महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे

     पतत्वेष काथो नमस्ते-नमस्ते।।


सनातनी परिवार के सभी सदस्य सीखें और बच्चों को भी सिखायें...!!🙏🙏


the 16 mantras which every Sanatani should learn and teach to children.

निघंटु


यह रहा निघंटु से जुड़ा एक प्राचीन संस्कृत पांडुलिपि का चित्र, जो निघंटु के ऐतिहासिक और आयुर्वेदिक संदर्भों को दर्शाता है।

Way of Life Karma : Nighaṇṭu

"निघंटु" एक प्राचीन संस्कृत शब्दकोश या ग्रंथ है, जिसमें शब्दों के अर्थ, उनकी उत्पत्ति, विशेषताएँ और विभिन्न संदर्भों में उनके प्रयोग का वर्णन होता है। निघंटु में विशेष रूप से वैदिक शब्दों, वनस्पतियों, औषधियों और अन्य प्राकृतिक तत्वों के नामों का विवरण दिया गया है। इसे आयुर्वेद, भाषा विज्ञान और वैदिक अध्ययन में एक महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।

 

निघंटु का परिचय

"निघंटु" का सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध ग्रंथ है "ऋग्वेद निघंटु"। इसे आयुर्वेदाचार्य पाणिनि से पहले संकलित किया गया माना जाता है। निघंटु का मुख्य उद्देश्य वैदिक शब्दों और उनके उपयोग का संकलन करना था ताकि विद्वान और छात्र वैदिक साहित्य का सही अर्थ और संदर्भ में अध्ययन कर सकें।

 

यास्क और निरुक्त

निघंटु की व्याख्या और इसका विश्लेषण करने का कार्य महर्षि यास्क ने अपने ग्रंथ "निरुक्त" में किया था। यास्क ने निघंटु को समझाने के लिए निरुक्त लिखा, जिसमें उन्होंने शब्दों के अर्थ, उनके भाषाई संदर्भ, और व्युत्पत्ति पर विस्तार से चर्चा की। यास्क के अनुसार, निघंटु में संकलित शब्दों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया है:

  1. नैमित्तिक: जो शब्द प्राकृतिक घटनाओं या कारणों से जुड़े हैं।
  2. अर्थवाचक: जिन शब्दों का स्पष्ट और सीधे अर्थ होता है।
  3. व्युत्पन्न: जिन शब्दों का अर्थ उनके आधार या व्युत्पत्ति से समझा जा सकता है।

 

निघंटु का महत्व

  • आयुर्वेद और वनस्पति विज्ञान में योगदान: निघंटु में कई औषधियों, वनस्पतियों और खनिजों के नाम और उनके गुणों का उल्लेख मिलता है। यह आयुर्वेद में जड़ी-बूटियों की पहचान के लिए सहायक होता है।
  • भाषा विज्ञान में आधार: निघंटु में प्राचीन वैदिक शब्दों का अर्थ और व्युत्पत्ति बताई गई है, जो संस्कृत भाषा और वैदिक अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण है।
  • धर्म और दर्शन में उपयोग: निघंटु में शब्दों के अर्थ का विवेचन धार्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से किया गया है, जो वेदों के गूढ़ अर्थ को समझने में सहायक होता है।

 

निष्कर्ष

निघंटु केवल एक शब्दकोश नहीं है, बल्कि यह प्राचीन भारतीय ज्ञान और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह वेदों के अध्ययन के लिए एक आधारभूत ग्रंथ है, जो विद्वानों को वैदिक शब्दों के सही अर्थ और उनके उपयोग को समझने में मदद करता है।

 

 

हिंदू धर्म और विज्ञान: एक गहरा संबंध

 

 


 Hinduism and Science: A Deep Connection


हिंदू धर्म और विज्ञान, दोनों ही सत्य की खोज में लगे हैं, बस अलग-अलग तरीकों से। हिंदू धर्म आध्यात्मिक, भौतिक, तार्किक और दर्शनीय दृष्टिकोण से सत्य को खोजता है, जब कि विज्ञान भौतिक और तार्किक दृष्टिकोण से। दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही क्षेत्रों में कई समानताएं और संभावित संबंध देखने को मिलते हैं।

 

कुछ प्रमुख बिंदु जिन पर हम विस्तार से चर्चा कर सकते हैं:-


 ब्रह्मांड की उत्पत्ति और संरचना

हिंदू धर्म:- हिंदू धर्म में ब्रह्मांड की उत्पत्ति के कई सिद्धांत हैं। ब्रह्मांड को चक्रीय रूप से विस्तार और संकुचन करने वाला माना जाता है। पुराणों में ब्रह्मांड की उत्पत्ति का वर्णन ब्रह्मा से होता है, जो सृष्टिकर्ता हैं।

विज्ञान:- बिग बैंग थ्योरी ब्रह्मांड की उत्पत्ति के बारे में  सिद्धांत है। यह सिद्धांत कहता है कि ब्रह्मांड एक अत्यंत घने और गर्म बिंदु से विस्तारित हुआ।


समानता:- दोनों ही दृष्टिकोण ब्रह्मांड की उत्पत्ति को एक बिंदु से मानते हैं, हालांकि उनकी व्याख्याएं अलग हैं।

 

 चेतना और मन

हिंदू धर्म:- हिंदू दर्शन में चेतना को ब्रह्मांड का आधार माना जाता है। योग और ध्यान जैसी प्राचीन भारतीय प्रथाएं चेतना को समझने और नियंत्रित करने के तरीके बताती हैं।

 

विज्ञान:- क्वांटम भौतिकी में चेतना की भूमिका पर काफी चर्चा होती है। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि चेतना और अवलोकन ब्रह्मांड की प्रकृति को प्रभावित करते हैं। हिंदू धर्म में भी क्वांटम भौतिकी को आप पाएंगे |


समानता:- दोनों ही क्षेत्र चेतना को ब्रह्मांड के एक महत्वपूर्ण पहलू के रूप में मानते हैं।

 

 पंचतत्व और पदार्थ

हिंदू धर्म:- हिंदू धर्म में पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) का उल्लेख है। इन तत्वों को पदार्थ के मूल घटक माना जाता है।

 

विज्ञान:- आधुनिक विज्ञान भी पदार्थ को इन पांच तत्वों के संयोजन के रूप में देखता है, हालांकि विस्तृत वर्गीकरण अलग हो सकता है।

 

समानता:-  दोनों ही दृष्टिकोण पदार्थ के मूल घटकों के बारे में समान अवधारणा रखते हैं।


कर्म और कारण-कार्य संबंध

हिंदू धर्म:- कर्म का सिद्धांत कहता है कि हमारे कर्मों का फल हमें मिलता है। यह एक कारण-कार्य संबंध स्थापित करता है।

 

विज्ञान:- कारण-कार्य का सिद्धांत विज्ञान का एक मूल सिद्धांत है। यह कहता है कि प्रत्येक घटना का एक कारण होता है।

 

समानता:- दोनों ही दृष्टिकोण कारण-कार्य के संबंध को मानते हैं, हालांकि उनके कारणों की व्याख्याएं अलग हो सकती हैं।

 

 योग और ध्यान का विज्ञान

हिंदू धर्म:- योग और ध्यान को शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है।

 

विज्ञान:- अब कई वैज्ञानिक अध्ययन योग और ध्यान के लाभों को सिद्ध कर रहे हैं। ये मस्तिष्क की संरचना और कार्यप्रणाली को प्रभावित करते हैं, तनाव कम करते हैं और प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाते हैं।

 

समानता:- विज्ञान योग और ध्यान के लाभों को वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है।

 

 कुछ अन्य समानताएं

 

अंतरिक्ष यात्रा:- पुराणों में वायुयान और अन्य उड़ने वाले यंत्रों का वर्णन मिलता है, जो आधुनिक अंतरिक्ष यात्रा के विचारों से मिलता-जुलता है।

 

परमाणु सिद्धांत:- कुछ हिंदू ग्रंथों में परमाणु के बारे में वर्णन मिलता है, जो आधुनिक परमाणु सिद्धांत से मिलता-जुलता है।

निष्कर्ष:-


हिंदू धर्म और विज्ञान, दोनों ही सत्य की खोज में लगे हैं, बस अलग-अलग तरीकों से। दोनों के बीच कई समानताएं और संभावित संबंध हैं। यह कहना गलत होगा कि विज्ञान हिंदू धर्म को सिद्ध करता है, लेकिन यह निश्चित रूप से कुछ हिंदू धार्मिक सिद्धांतों के वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है।


तमिलनाडु में विनायक मूर्तियों की शैली में समय के साथ क्या बदलाव आए हैं?

 

 

तमिलनाडु में विनायक मूर्तियों की शैली में समय के साथ कई बदलाव आए हैं, जो क्षेत्र की सांस्कृतिक, धार्मिक और कलात्मक परंपराओं के विकास को दर्शाते हैं।

 

कुछ प्रमुख परिवर्तनों में शामिल हैं:

  • प्रारंभिक काल (5वीं-8वीं शताब्दी): इस अवधि के दौरान, विनायक मूर्तियाँ अधिक सरल और शास्त्रीय थीं। वे आमतौर पर पत्थर से बनी होती थीं और गणेश को एक युवा पुरुष के रूप में दर्शाती थीं।

  • चोल काल (9वीं-13वीं शताब्दी): चोल काल के दौरान, विनायक मूर्तियों की शैली में नाटकीय परिवर्तन हुए। मूर्तियाँ अधिक जटिल और सजावटी हो गईं, अक्सर धातु से बनी होती थीं और गणेश को एक अधिक भव्य और प्रभावशाली रूप में दर्शाती थीं।

  • विजयनगर साम्राज्य (14वीं-17वीं शताब्दी): विजयनगर साम्राज्य के दौरान, विनायक मूर्तियों की शैली में दक्षिण भारतीय शैली का प्रभाव देखा गया। मूर्तियाँ अक्सर अधिक विस्तृत और रंगीन थीं, और गणेश को एक अधिक आध्यात्मिक और गंभीर रूप में दर्शाती थीं।

  • आधुनिक काल: आधुनिक काल में, विनायक मूर्तियों की शैली में और भी अधिक विविधता देखी जा सकती है। कुछ मूर्तियाँ पारंपरिक शैली का पालन करती हैं, जबकि अन्य अधिक आधुनिक और प्रयोगात्मक शैलियों में बनाई जाती हैं।

     

इन परिवर्तनों के बावजूद, विनायक की मूल विशेषताएँ, जैसे हाथी का सिर, चूहे का वाहन और एक दांत, सभी समय अवधियों में बनी रही हैं। ये विशेषताएँ गणेश की पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई हैं।

तमिलनाडु में कोई ऐसा मंदिर है जहां विनायक को मानव रूप में पूजा जाता हो?

 

 

जी हां, तमिलनाडु में एक ऐसा मंदिर है जहां विनायक को मानव रूप में पूजा जाता है।

यह मंदिर है आदि विनायक मंदिर जो तिरुवरूर में स्थित है। इस मंदिर में विराजमान विनायक की मूर्ति में हाथी का सिर नहीं बल्कि मानव का चेहरा है। यह मूर्ति अपनी अनूठी शैली के कारण बहुत प्रसिद्ध है और देश भर से भक्त यहां दर्शन के लिए आते हैं।

 

आदि विनायक मंदिर की कुछ खास बातें:

  • मानवमुख गणेश: इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यहां विराजमान गणेश की मूर्ति में मानव का चेहरा है। यह मूर्ति हिंदू धर्म में गणेश के विभिन्न रूपों को दर्शाने वाली एक दुर्लभ मूर्ति है।

  • प्राचीन इतिहास: इस मंदिर का इतिहास काफी पुराना है और इसे कई शताब्दियों पुराना माना जाता है।

  • धार्मिक महत्व: स्थानीय लोगों के लिए यह मंदिर बहुत ही पवित्र है और वे यहां आकर अपनी मनोकामनाएं पूरी होने की कामना करते हैं।

  • वास्तुशिल्प: मंदिर की वास्तुकला दक्षिण भारतीय शैली की है और यह काफी सुंदर और भव्य है।

     

यदि आप तमिलनाडु घूमने जा रहे हैं तो आदि विनायक मंदिर जरूर जाएँ। यह एक ऐसा मंदिर है जो आपको आध्यात्मिक शांति और अनुभव प्रदान करेगा।

तमिलनाडु में सबसे बड़ी विनायक मूर्ति कहाँ स्थित है?

 

तमिलनाडु में सबसे बड़ी विनायक मूर्ति को लेकर कुछ भ्रांतियां हैं। अक्सर यह माना जाता है कि सबसे बड़ी मूर्ति महाराष्ट्र में है, लेकिन ऐसा नहीं है।

 

तमिलनाडु में एशिया की सबसे बड़ी विनायक मूर्ति अरुल्मिगु मुन्थी विनायगर मंदिर, कोयंबटूर में स्थित है। यह विशाल मूर्ति ग्रेनाइट से बनी है और इसका आकार इतना बड़ा है कि यह दूर से ही दिखाई देती है।

 

अरुल्मिगु मुन्थी विनायगर मंदिर कोयंबटूर में स्थित है और यह तमिलनाडु के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। यहां विराजमान विनायक की मूर्ति न केवल अपनी विशालता बल्कि अपनी भव्यता के लिए भी जानी जाती है। यह मंदिर स्थानीय लोगों के साथ-साथ देश-विदेश से आने वाले भक्तों के लिए आस्था का केंद्र है।

 

अन्य उल्लेखनीय विनायक मंदिर

 

  • करपाका विनायकर मंदिर: मदुरै के पास स्थित यह मंदिर भी अपनी विशाल विनायक मूर्ति के लिए जाना जाता है।
  • आदि विनायक मंदिर, तिरुवरूर: यह मंदिर अपने अनोखे मानवमुख गणेश की मूर्ति के लिए प्रसिद्ध है।

 

तमिलनाडु में सबसे पुरानी विनायक मूर्ति कौन सी है?

जनेऊ

 

 



जनेऊ का एक नाम यज्ञोपवित भी है , यज्ञोपवीत को समझने के लिए पहले यज्ञ को समझना होगा , हम इसको गीता से समझने की कोशिश करते है :- 


गीता के तीसरे अध्याय के ९ वे श्लोक में आया की यज्ञार्थ कर्म  श्री कृष्ण ने कहा की यज्ञ के निम्मित किए जाने वाले कर्मो के अतिरिक्त अन्य सभी कर्म बंधन युक्त है .. इसका अर्थ है की यज्ञ सिर्फ हवन करने को नही कहते क्योंकि वो तो सिर्फ संध्या में किया जाता है यज्ञ कोई ऐसी वस्तु है जिसे २४ घंटे किया जाए तभी बंधन मुक्त होगा अन्यथा बंधन मैं रहेगा ।


चतुर्थ अध्याय मैं यज्ञ के स्वरूप का विस्तार से वर्णन किया जिसमे कहा जिसके संपूर्ण शास्त्र सम्मत् कर्म बिना कमाना और संकल्प के होते है तथा जिसके कर्म ज्ञान रूप अग्नि के द्वारा भस्म हो गए हो वो पंडित होता है ,४/१९


 जो पुरुष समस्त कर्मो और उनके फलों मैं आसक्ति का त्याग करके संसार के आश्रय से रहित हो गया है सिर्फ परमात्मा मैं नित्य तृप्त है वह कर्मो मैं भली भांति बरतता हुआ भी वास्तव मैं कुछ नहीं करता । ४/२०

 

 जिसका अंत:करण और इन्द्रियों के सहित शरीर जीता हुआ है ओर जिसने समस्त भोग सामग्री त्याग कर दिया है ऐसा पुरुष शरीर संबंधी कर्म करता हुआ भी पाप को नहीं प्राप्त होता ४/२१

 

 जो बिना इच्छा के अपने आप प्राप्त हुए पदार्थों में सदा संतुष्ट रहता है जिसमे ईर्ष्या का सर्वथा अभाव है जो हर्ष शोक आदि द्वंदो से सर्वथा रहित है सिद्धि ओर असिद्धि मैं सम है उसको कर्म नही बांधते ४/२२

 

जिस को आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गई हो जो देहाभिमान ओर ममता से रहित हो जिसका चित्त निरंतर परमात्मा के ज्ञान मैं स्थिर हो इस केवल  यज्ञ संपादन  के लिए कर्म करने वाले मनुष्य के कर्म सर्वदा विलीन हो जाते है । ४/२३

 

 जिस यज्ञ मैं अर्पण ब्रह्म है और हवन किए जाने वाले द्रव्य भी ब्रह्म है तथा ब्रह्म रूप कर्ता के द्वारा ब्रह्म रूप अग्नि मैं आहुति देने रूप क्रिया भी ब्रह्म है उस ब्रह्म कर्म मैं स्थिर रहने वाले मनुष्य द्वारा प्राप्त किया जाने वाला फल भी ब्रह्म है ४/२४

 

दूसरे योगी जन देवता के पूजन रूप यज्ञ मैं अनुष्ठान करते है ओर अन्य योगी परब्रह्म परमात्मा रूप अग्नि अग्नि मैं अभेद दर्शन रूप यज्ञ के द्वारा आत्मा रूप यज्ञ का हवन करते है ४/२५

 

अन्य योगी जन श्रोत्र आदि समस्त इन्द्रियों को संयम रूप अग्नि में हवन करते है अन्य शब्द आदि समस्त विषयों को इंद्रिय रूप अग्नियों मैं हवन किया करते है । ४/२६

 

दूसरे योगी जन इन्द्रियों की संपूर्ण क्रियाओं को ओर प्राणों की समस्त क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित आत्म संयम रूप अग्नि मैं हवन किया करते है । ४/२७

 

कई मनुष्य द्रव्य संबंधी यज्ञ करने वाले है कितने तपस्या रूपी यज्ञ करने वाले तथा कितने योग रूपी यज्ञ और अनेकों अहिंसा आदि व्रतों से युक्त स्वाध्याय रूपी ज्ञान यज्ञ करने वाले ४/२८

 

दूसरे कितने ही योगी अपान वायु का प्राण वायु में हवन करने वाले और प्राण मैं अपान का हवन करने वाले कई नियमित आहार करने वाले प्राणायाम पारायण प्राण अपान की गति रोक कर प्राणों का प्राणों में ही हवन करने वाले ये सभी साधक यज्ञ द्वारा पापो का नाश करने वाले है ओर  यज्ञ को जानने वाले  है । ४/२९.३०

 

अंत मैं कहते है यज्ञ न करनेवाले के लिए मनुष्य लोक भी सुख दायक नही है फ़िर परलोक कैसे सुखदायक होगा ।

ओर फिर कहते है द्रव्यमय यज्ञबसे ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ है 

आखिर में १० वे अध्याय मैं कहते है सभी प्राकृत यज्ञों मैं जप यज्ञ हूं ।।

तो यज्ञ का स्पष्ट अर्थ है वो क्रिया जो परमात्मा से जोड़ती प्राप्त कराती है अन्य सभी कर्म दोष युक्त है और बंधन कारक है ।

 

यज्ञ उपवीत यज्ञोपवित का अर्थ हुआ यज्ञ के निकट रहने के लिए पहना गया संकल्प सूत्र इसे रक्षा सूत्र भी कहते है क्योंकि धर्म पे कोई भी रहे विजय उसी की होगी क्योंकि धर्म स्वयं उसकी राक्ष कर रहा है , कोई व्यक्ति जो ईमानदार होगा और सावधान होगा उसे भ्रष्टाचार के इल्जाम मैं फंसाना अत्यंत मुश्किल होता है इसलिए राखी का त्योहार प्राचीन काल मैं यज्ञोपवित बदलने का त्योहार था और जनेऊ को रक्षा सूत्र भी कहते है , काश्मीर मैं वहा की कबीर कही जाने वाली लालदेन का यज्ञोपवित संस्कार हुआ था जो की एक नागा महिला संत थी , राखी अर्थात वर्षा के बाद फिर से साधना का नव संकल्प । 

सांस भी यज्ञोंपवित है यही पवित्र है ।

इसके धारण का मंत्र स्पष्ट करता है की ये स्वांस है हर स्वांस के साथ जप यही यज्ञ है साथ मैं उत्तम गीता अनुसार उपरोक्त आचरण यही पूर्ण यज्ञ है ओर जनेऊ प्रकृति( शरीर) जीव आत्म और परमात्मा इन तीनो का योग यानी हम जिसे श्रद्धा से धारण करके हम संकल्प करे की हम अपने लक्ष्य को प्राप्त करके रहेंगे जब इसे देखेंगे तो परमेश्वर की याद आए और हम हर स्वांस पे पहरा बिठा दे की बिना ॐ के उच्चारण के भीतर न जा पाए हम सभी यज्ञ कर्म मैं लग जाए । 



यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।

आयुष्यमग्रं प्रतिमुंच शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ।।


(पारस्कर गृह्यसूत्र, कांड २/२/११)


छन्दोगानाम्:

ॐ यज्ञो पवीतमसि यज्ञस्य त्वोपवीतेनोपनह्यामि।।

यज्ञोपवित परम पवित्र है प्रजापति ने सहज ही हमे प्रदान किया है ये आयु बल ओर शुभता और तेज को बढ़ाने वाला है यज्ञ के पास ले जाने वाला है हम इसे श्रद्धा से धारण करते है ।

मेरी अल्प बुद्धि से इसका यही अर्थ मैं समझ पाया हु बाकी इसके लौकिक लाभ भी होंगे मुझे ज्ञात नही अन्य विद्वान सहायता करे तो अच्छा रहेगा । 🙏🏽

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