24 फ़र॰ 2026

चार-युग और उनकी विशेषताएं



'युग' शब्द का अर्थ होता है एक निर्धारित संख्या के वर्षों की काल-अवधि। जैसे सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलियुग आदि। 

यहाँ हम चारों युगों का वर्णन करेंगें। युग वर्णन से तात्पर्य है कि उस युग में किस प्रकार से व्यक्ति का जीवन, आयु, ऊँचाई, एवं उनमें होने वाले अवतारों के बारे में विस्तार से परिचय देना। प्रत्येक युग के वर्ष प्रमाण और उनकी विस्तृत जानकारी कुछ इस तरह है -

सत्ययुग

 यह प्रथम युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है -

🛕इस युग की पूर्ण आयु अर्थात् कालावधि – 17,28,000 वर्ष होती है।

🛕इस युग में मनुष्य की आयु – 1,00,000 वर्ष होती है ।

🛕मनुष्य की लम्बाई – 32 फिट (लगभग) [21 हाथ]
सत्ययुग का तीर्थ – पुष्कर है ।

🛕इस युग में पाप की मात्र – 0 विश्वा अर्थात् (0%) होती है ।

🛕इस युग में पुण्य की मात्रा – 20 विश्वा अर्थात् (100%) होती है ।

इस युग के अवतार – मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह (सभी अमानवीय अवतार हुए) है ।

अवतार होने का कारण – शंखासुर का वध एंव वेदों का उद्धार, पृथ्वी का भार हरण, हरिण्याक्ष दैत्य का वध, हिरण्यकश्यपु का वध एवं प्रह्लाद को सुख देने के लिए।

इस युग की मुद्रा – रत्नमय है ।

इस युग के पात्र – स्वर्ण के है ।

त्रेतायुग

यह द्वितीय युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है –

🛕इस युग की पूर्ण आयु अर्थात् कालावधि – 12,96,000 वर्ष होती है । 

🛕इस युग में मनुष्य की आयु – 10,000 वर्ष होती है ।

🛕मनुष्य की लम्बाई – 21 फिट (लगभग) [ 14 हाथ ]
त्रेतायुग का तीर्थ – नैमिषारण्य है ।

🛕इस युग में पाप की मात्रा – 5 विश्वा अर्थात् (25%) होती है ।

🛕इस युग में पुण्य की मात्रा – 15 विश्वा अर्थात् (75%) होती है ।

इस युग के अवतार – वामन, परशुराम, राम (राजा दशरथ के घर)

अवतार होने के कारण – बलि का उद्धार कर पाताल भेजा, मदान्ध क्षत्रियों का संहार, रावण-वध एवं देवों को बन्धनमुक्त करने के लिए ।

इस युग की मुद्रा – स्वर्ण है ।

इस युग के पात्र – चाँदी के है ।

द्वापरयुग

 यह तृतीय युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है –

🛕इस युग की पूर्ण आयु अर्थात् कालावधि – 8.64,000 वर्ष होती है ।

🛕इस युग में मनुष्य की आयु - 1,000 होती है ।

🛕मनुष्य लम्बाई – 11 फिट (लगभग) [ 7 हाथ ]
द्वापरयुग का तीर्थ – कुरुक्षेत्र है ।

🛕इस युग में पाप की मात्रा – 10 विश्वा अर्थात् (50%) होती है ।

🛕इस युग में पुण्य की मात्रा – 10 विश्वा अर्थात् (50%) होती है ।

इस युग के अवतार – कृष्ण, (देवकी के गर्भ से एंव नंद के घर पालन-पोषण), बुद्ध (राजा के घर)।

अवतार होने के कारण – कंसादि दुष्टो का संहार एंव गोपों की भलाई, दैत्यो को मोहित करने के लिए ।

इस युग की मुद्रा – चाँदी है ।

इस युग के पात्र – ताम्र के हैं ।

कलियुग

 यह चतुर्थ युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है –

🛕इस युग की पूर्ण आयु अर्थात् कालावधि – 4,32,000 वर्ष होती है ।

🛕इस युग में मनुष्य की आयु – 100 वर्ष होती है ।

🛕मनुष्य की लम्बाई – 5.5 फिट (लगभग) [3.5 हाथ]
कलियुग का तीर्थ – गंगा है ।

🛕इस युग में पाप की मात्रा – 15 विश्वा अर्थात् (75%) होती है ।

🛕इस युग में पुण्य की मात्रा – 5 विश्वा अर्थात् (25%) होती है ।

🛕इस युग के अवतार – कल्कि (ब्राह्मण विष्णु यश के घर) ।

अवतार होने के कारण – मनुष्य जाति के उद्धार अधर्मियों का विनाश एंव धर्म कि रक्षा के लिए।

इस युग की मुद्रा – लोहा है।

इस युग के पात्र – मिट्टी के है।


22 फ़र॰ 2026

ॐत्र्यंबकम् मंत्र के 33 अक्षर

जो महर्षि वशिष्ठ के अनुसार 33 देवताओ के घोतक हैं। 
उन तैंतीस देवताओं में 8 वसु 11 रुद्र और 12 आदित्यठ 1 प्रजापति तथा 1 षटकार हैं। 

👀 इन तैंतीस देवताओं की सम्पूर्ण शक्तियाँ महामृत्युंजय मंत्र से निहीत होती है । जिससे महा महामृत्युंजय का पाठ करने वाला प्राणी दीर्घायु तो प्राप्त करता ही हैं । साथ ही वह नीरोग, ऐश्व‍र्य युक्ता धनवान भी होता है ।

👀 महामृत्युंरजय का पाठ करने वाला प्राणी हर दृष्टि से सुखी एवम समृध्दिशाली होता है । भगवान शिव की अमृतमययी कृपा उस निरन्तंर बरसती रहती है।

•🛕 त्रि - ध्रववसु प्राण का घोतक है जो सिर में स्थित है।

•🛕यम - अध्ववरसु प्राण का घोतक है, जो मुख में स्थित है।

•🛕 ब - सोम वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण कर्ण में स्थित है।

•🛕 कम - जल वसु देवता का घोतक है, जो वाम कर्ण में स्थित है।

•🛕 य - वायु वसु का घोतक है, जो दक्षिण बाहु में स्थित है।

•🛕 जा- अग्नि वसु का घोतक है, जो बाम बाहु में स्थित है।

•🛕 म - प्रत्युवष वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण बाहु के मध्य में स्थित है।

•🛕 हे - प्रयास वसु मणिबन्धत में स्थित है।

•🛕 सु -वीरभद्र रुद्र प्राण का बोधक है। दक्षिण हस्त के अंगुलि के मुल में स्थित है।

•🛕 ग -शुम्भ् रुद्र का घोतक है दक्षिणहस्त् अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।

•🛕 न्धिम् -गिरीश रुद्र शक्ति का मुल घोतक है। बायें हाथ के मूल में स्थित है।

•🛕 पु- अजैक पात रुद्र शक्ति का घोतक है। बाम हस्तह के मध्य भाग में स्थित है।

•🛕 ष्टि - अहर्बुध्य्त् रुद्र का घोतक है, बाम हस्त के मणिबन्धा में स्थित है।

•🛕 व - पिनाकी रुद्र प्राण का घोतक है। बायें हाथ की अंगुलि के मुल में स्थित है।

•🛕 र्ध - भवानीश्वपर रुद्र का घोतक है, बाम हस्त अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।

•🛕 नम् - कपाली रुद्र का घोतक है । उरु मूल में स्थित है।

•🛕 उ- दिक्पति रुद्र का घोतक है । यक्ष जानु में स्थित है।

•🛕 र्वा - स्था णु रुद्र का घोतक है जो यक्ष गुल्फ् में स्थित है।

•🛕 रु - भर्ग रुद्र का घोतक है, जो चक्ष पादांगुलि मूल में स्थित है।

•🛕 क - धाता आदित्यद का घोतक है जो यक्ष पादांगुलियों के अग्र भाग में स्थित है।

•🛕 मि - अर्यमा आदित्यद का घोतक है जो वाम उरु मूल में स्थित है।

•🛕 व - मित्र आदित्यद का घोतक है जो वाम जानु में स्थित है।

•🛕 ब - वरुणादित्या का बोधक है जो वाम गुल्फा में स्थित है।

•🛕 न्धा - अंशु आदित्यद का घोतक है । वाम पादंगुलि के मुल में स्थित है।

•🛕 नात् - भगादित्यअ का बोधक है । वाम पैर की अंगुलियों के अग्रभाग में स्थित है।

•🛕 मृ - विवस्व्न (सुर्य) का घोतक है जो दक्ष पार्श्वि में स्थित है।

•🛕 र्त्यो् - दन्दाददित्य् का बोधक है । वाम पार्श्वि भाग में स्थित है।

•🛕 मु - पूषादित्यं का बोधक है । पृष्ठै भगा में स्थित है ।

•🛕 क्षी - पर्जन्य् आदित्यय का घोतक है । नाभि स्थिल में स्थित है।

•🛕 य - त्वणष्टान आदित्यध का बोधक है । गुहय भाग में स्थित है।

•🛕 मां - विष्णुय आदित्यय का घोतक है यह शक्ति स्व्रुप दोनों भुजाओं में स्थित है।

•🛕 मृ - प्रजापति का घोतक है जो कंठ भाग में स्थित है।

•🛕 तात् - अमित वषट्कार का घोतक है जो हदय प्रदेश में स्थित है।

उपर वर्णन किये स्थानों पर उपरोक्त देवता, वसु आदित्य आदि अपनी सम्पुर्ण शक्तियों सहित विराजत हैं । जो प्राणी श्रध्दा सहित महामृत्युजय मंत्र का पाठ करता है उसके शरीर के अंग - अंग ( जहां के जो देवता या वसु अथवा आदित्यप हैं ) उनकी रक्षा होती है..!!

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सनातन धर्म से संबंधित तीन पशु पक्षी से जुड़े शकुन-अपशकुन ( अच्छा और बुरा)

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प्राचीन समय के ऋषियों मुनियों ने अपने शोध में बताया था की प्रत्येक जानवर के विचित्र व्यवहार एवं हरकतों का कुछ न कुछ प्रभाव अवश्य होता है. जानवरों के संबंध में अनेको बाते  हमारे पुराणों एवं ग्रंथो में भी विस्तार से बतलाई गई है।

हमारे सनातन धर्म में माता के रूप में पूजनीय गाय के संबंध में तो बहुत सी बाते आप लोग जानते होंगे परन्तु आज हम जानवरों के संबंध में पुराणों से ली गई कुछ ऐसी बातो के बारे में बतायेंगे जो आपने पहले कभी भी किसी से नहीं सुनी होगी. जानवरों से जुड़े रहस्यों के संबंध में पुराणों में बहुत ही विचित्र बाते बतलाई गई जो किसी को आश्चर्य में डाल देंगी।
 
कौए का रहस्य :-

कौए के संबंध में पुराणों बहुत ही विचित्र बाते बतलाई गई है मान्यता है की कौआ अतिथि आगमन का सूचक एवं पितरो का आश्रम स्थल माना जाता है।

हमारे धर्म ग्रन्थ की एक कथा के अनुसार इस पक्षी ने  देवताओ और राक्षसों के द्वारा समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत का रस चख लिया था. यही कारण है की कौआ की कभी भी स्वाभाविक मृत्यु नहीं होती. यह पक्षी कभी किसी बिमारी अथवा अपने वृद्धा अवस्था के कारण मृत्यु को प्राप्त नहीं होता. इसकी मृत्यु आकस्मिक रूप से होती है।

यह बहुत ही रोचक है की जिस दिन कौए की मृत्यु होती है उस दिन उसका साथी भोजन ग्रहण नहीं करता. ये आपने कभी ख्याल किया हो तो यह बात गौर देने वाली है की कौआ कभी भी अकेले में भोजन ग्रहण नहीं करता यह पक्षी किसी साथी के साथ मिलकर ही भोजन करता है।

कौआ की लम्बाई करीब 20  इंच होता है, तथा यह गहरे काले रंग का पक्षी है. जिनमे नर और मादा दोनों एक समान ही दिखाई देते है. यह बगैर थके मिलो उड़ सकता है. कौए के बारे में पुराण में बतलाया गया है की किसी भविष्य में होने वाली घटनाओं का आभास पूर्व ही हो जाता है।

पितरो का आश्रय स्थल :- श्राद्ध पक्ष में कौए का महत्व बहुत ही अधिक माना गया है . इस पक्ष में यदि कोई भी व्यक्ति कौआ को भोजन कराता है तो यह भोजन कौआ के माध्यम से उसके पीतर ग्रहण करते है. शास्त्रों में यह बात स्पष्ट बतलाई गई है की कोई भी क्षमतावान आत्मा कौए के शरीर में विचरण कर सकती है।

भादौ महीने के 16 दिन कौआ हर घर की छत का मेहमान बनता है. ये 16 दिन श्राद्ध पक्ष के दिन माने जाते हैं. कौए एवं पीपल को पितृ प्रतीक माना जाता है. इन दिनों कौए को खाना खिलाकर एवं पीपल को पानी पिलाकर पितरों को तृप्त किया जाता है।

कौवे से जुड़े शकुन और अपशकुन ( अच्छा और बुरा) :-

👉 यदि आप शनिदेव को प्रसन्न करना चाहते हो कौआ को भोजन करना चाहिए।

👉 यदि आपके मुंडेर पर कोई कौआ बोले तो मेहमान अवश्य आते है।

👉 यदि कौआ घर की उत्तर दिशा से बोले तो समझे जल्द ही आप पर लक्ष्मी की कृपा होने वाली है।

👉 पश्चिम दिशा से बोले तो घर में मेहमान आते है।

👉  पूर्व में बोले तो शुभ समाचार आता है।

👉  दक्षिण दिशा से बोले तो बुरा समाचार आता है।

👉  कौवे को भोजन कराने से अनिष्ट व शत्रु का नाश होता है।

चीटियों का रहस्य :-

चीटियों को हम एक बहुत तुच्छ एवं छोटा जानवर समझते है, परन्तु चीटियां बहुत ही मेहनती और एकता से रहने वाला जीव है. सामूहिक प्राणी होने के कारण चींटी सभी कार्यों को बांटकर करती है।

विश्वभर में लगभग 14000 से अधिक प्रजाति की चीटियां है. 

चींटी के बारे में वैज्ञानिकों ने कई रहस्य उजागर किए हैं. चींटियां आपस में बातचीत करती हैं, वे नगर बनाती हैं और भंडारण की समुचित व्यवस्था करना जानती हैं. हमारे इंजीनियरों से कहीं ज्यादा बेहतर होती हैं ‍चींटियां. चींटियों का नेटवर्क दुनिया के अन्य नेटवर्क्स से कहीं बेहतर होता है. ये मिलकर एक पहाड़ को काटने की क्षमता रखती है।

चींटियां शहर को स्वच्छ रखने में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं. चींटियां खुद के वजन से 100 गुना ज्यादा वजन उठा सकती हैं. मानव को चींटियों से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है।

चीटियों दो प्रकार की होती है लाल चीटियां एवं काली चीटियां. शास्त्रों के अनुसार लाल चीटियां को शुभ तथा काली चीटियों को अशुभ माना गाय है. दोनों ही तरह की चींटियों को आटा डालने की परंपरा प्राचीनकाल से ही विद्यमान है. चींटियों को शकर ( चीनी या गुड ) मिला आटा डालते रहने से व्यक्ति हर तरह के बंधन से मुक्त हो जाता है।

हजारों चींटियों को प्रतिदिन भोजन देने से वे चींटियां उक्त व्यक्ति को पहचानकर उसके प्रति अच्छे भाव रखने लगती हैं और उसको वे दुआ देने लगती हैं. चींटियों की दुआ का असर आपको हर संकट से बचा सकता है।

👉  यदि आप कर्ज से परेशान है तो चीटियों को शक़्कर और आता डाले. ऐसा करने पर कर्ज की समाप्ति जल्द हो जाती है।

👉 जो प्रत्येक दिन चीटियों को आटा देता है वह वैकुंठ धाम को प्रस्थान करता है।

👉 यदि आप लाल चीटियों को मुंह में अंडे दबाए देखते हो यह भी शुभ माना जाता है तथा परिवार में सुख समृद्धि बढ़ती है।

कुत्ते का रहस्य :-

हमारे पुराणों में यह बतलाया गया है की कुत्ता यमराज दूत है।कुत्ते को भैरव देवता का सेवक भी कहा जाता है। भैरव देवता को प्रसन्न करने के लिए कुत्ते को भोजन करना चाहिए।यदि भैरव देवता अपने भक्त से प्रसन्न रहते है तो किसी भी प्रकार की समस्या एवं रोग उसे छू नहीं सकता।

मान्यता है की यदि आप कुत्ते को प्रसन्न रखते है तो वह आपके सामने किसी भी तरह की आत्माओं को फटकने नहीं देता. आत्माएं कुत्ते से दूर भागती है।

कुत्ते की क्षमता के बारे में पुराण में बतलाया गया है की दरअसल कुत्ता एक ऐसा प्राणी है जिसे भविष्य में होने वाली घटनाओं का पूर्व आभास होता है तथा वह सूक्ष्म जगत को यानि की आत्माओं को देख सकता है।

हिन्दू धर्म में कुत्ते को एक रहस्मयी प्राणी माना गया है, परन्तु इसे भोजन कराने से हर प्रकार के संकट से बचा जा सकता है।

कुत्ते से जुड़े शकुन एवं अपशकुन  (अच्छा और बुरा) :-

👉 कुत्ते की रोने की आवाज को अपशकुन माना जाता है. जब भी कुत्ता कराहता है तो समझ लीजिए की नकरात्मक शक्तियां आस पास है।

👉 शस्त्रों में कुत्ते के संबंध में यह बात कहि गई की यदि किसी परिवार में रोगी हो तो कुत्ता पालने से वह रोगी की बिमारी को अपने उपर ले लेता है।

👉 यदि किसी शुभ कार्य के दौरान कुत्ता आपका मार्ग रोके तो इसे विषमता या अनिश्चय प्रकट होती है।

👉 यदि संतान की प्राप्ति न हो रही हो तो काले कुत्ते को पालना चाहिए।

👉 अन्य शास्त्रीय मतांतर के अनुसार कुत्ते को पालने की जगह बाहर ही किसी काले कुत्ते को प्रतिदिन तेल से चुपड़ी रोटी खिलाने से परिवार की कई समस्याओं का स्वतः ही निदान हो जाता है।

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मनुष्य के बार-बार जन्म-मरण का क्या कारण है ?


एक बार द्वारकानाथ श्रीकृष्ण अपने महल में दातुन कर रहे थे । रुक्मिणी जी स्वयं अपने हाथों में जल लिए उनकी सेवा में खड़ी थीं । अचानक द्वारकानाथ हंसने लगे । रुक्मिणी जी ने सोचा कि शायद मेरी सेवा में कोई गलती हो गई है; इसलिए द्वारकानाथ हंस रहे हैं ।

रुक्मिणी जी ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा—‘प्रभु ! आप दातुन करते हुए अचानक इस तरह हंस क्यों पड़े, क्या मुझसे कोई गलती हो गई ? कृपया, आप मुझे अपने हंसने का कारण बताएं ।’

श्रीकृष्ण बोले—‘नहीं, प्रिये ! आपसे सेवा में त्रुटि होना कैसे संभव है ? आप ऐसा न सोचें, बात कुछ और है ।’

रुक्मिणी जी ने कहा—‘आप अपने हंसने का रहस्य मुझे बता दें तो मेरे मन को शान्ति मिल जाएगी; अन्यथा मेरे मन में बेचैनी बनी रहेगी ।’

तब श्रीकृष्ण ने मुसकराते हुए रुक्मिणी जी से कहा—‘देखो, वह सामने एक चींटा चींटी के पीछे कितनी तेजी से दौड़ा चला जा रहा है । वह अपनी पूरी ताकत लगा कर चींटी का पींछा कर उसे पा लेना चाहता है । उसे देख कर मुझे अपनी मायाशक्ति की प्रबलता का विचार करके हंसी आ रही है ।’

रुक्मिणी जी ने आश्चर्यचकित होते हुए कहा—‘वह कैसे प्रभु ? इस चींटी के पीछे चींटे के दौड़ने पर आपको अपनी मायाशक्ति की प्रबलता कैसे दीख गई ?’

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—‘मैं इस चींटे को चौदह बार इंद्र बना चुका हूँ । चौदह बार देवराज के पद का भोग करने पर भी इसकी भोगलिप्सा समाप्त नहीं हुई है । यह देख कर मुझे हंसी आ गई ।’

इंद्र की पदवी भी भोग योनि है । मनुष्य अपने उत्कृष्ट कर्मों से इंद्रत्व को प्राप्त कर सकता है । सौ अश्वमेध यज्ञ करने वाला व्यक्ति इंद्र-पद प्राप्त कर लेता है । लेकिन जब उनके भोग पूरे हो जाते हैं तो उसे पुन: पृथ्वी पर आकर जन्म ग्रहण करना पड़ता है ।

प्रत्येक जीव इंद्रियों का स्वामी है; परंतु जब जीव इंद्रियों का दास बन जाता है तो जीवन कलुषित हो जाता है और बार-बार जन्म-मरण के बंधन में पड़ता है । वासना ही पुनर्जन्म का कारण है । जिस मनुष्य की जहां वासना होती है, उसी के अनुरूप ही अंतसमय में चिंतन होता है और उस चिंतन के अनुसार ही मनुष्य की गति—ऊंच-नीच योनियों में जन्म होता है । अत: वासना को ही नष्ट करना चाहिए । वासना पर विजय पाना ही सुखी होने का उपाय है ।

बुझै न काम अगिनि तुलसी कहुँ,
विषय भोग बहु घी ते ।

अग्नि में घी डालते जाइये, वह और भी धधकेगी, यही दशा काम की है । उसे बुझाना हो तो संयम रूपी शीतल जल डालना होगा ।

संसार का मोह छोड़ना बहुत कठिन है । वासनाएं बढ़ती हैं तो भोग बढ़ते हैं, इससे संसार कटु हो जाता है । वासनाएं जब तक क्षीण न हों तब तक मुक्ति नहीं मिलती है । पूर्वजन्म का शरीर तो चला गया परन्तु पूर्वजन्म का मन नहीं गया ।

नास्ति तृष्णासमं दु:खं नास्ति त्यागसमं सुखम्।
सर्वांन् कामान् परित्यज्य ब्रह्मभूयाय कल्पते ।।

तृष्णा के समान कोई दु:ख नहीं है और त्याग के समान कोई सुख नहीं है । समस्त कामनाओं—मान, बड़ाई, स्वाद, शौकीनी, सुख-भोग, आलस्य आदि का परित्याग करके केवल भगवान की शरण लेने से ही मनुष्य ब्रह्मभाव को प्राप्त हो जाता है ।

नहीं है भोग की वांछा न दिल में लालसा धन की ।
प्यास दरसन की भारी है सफल कर आस को मेरी ll


23 नव॰ 2025

गोपाष्टमी


🌿✨ शुभ गोपाष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ! ✨🌿

📜 पद्म पुराण — कार्तिक माहात्म्य
शुक्लाष्टमी कार्तिके तु स्मृता गोपाष्टमी बुधैः।
तद्दिनाद् वासुदेवोऽभूद् गोपः पूर्वं तु वत्सपः॥

अर्थ:
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को विद्वानजन गोपाष्टमी कहते हैं।
इसी दिन से श्रीकृष्ण ने बछड़ों की सेवा छोड़कर गौमाता की सेवा प्रारंभ की —
अर्थात् वे उस दिन से गोप (ग्वाला) बने। 🐄💫
 

🌺 इस दिन भगवान श्रीकृष्ण एक योग्य गोपाल बने।

इस दिन से पहले वे केवल बछड़ों के रक्षक थे।  

“इस प्रकार श्रीकृष्ण अपने बड़े भाई बलराम के साथ कौमार अवस्था पार कर *पौगण्ड* अवस्था में प्रवेश करते हैं — यह अवस्था लगभग छठे वर्ष से दसवें वर्ष तक की होती है।  

उस समय व्रज के ग्वाल-बालकों के पिता आपस में विचार-विमर्श करके यह निर्णय लेते हैं कि जो बालक पाँच वर्ष की आयु पार कर चुके हैं, उन्हें गौओं की चरवाही का कार्य सौंपा जाए।  
इस प्रकार श्रीकृष्ण और बलराम को गौओं की सेवा का दायित्व दिया गया, और वे वृन्दावन की भूमि को अपने चरणकमलों से पवित्र करते हुए विचरण करने लगे।”


🙏 हरे कृष्ण! 🙏  
🪔 शुभ गोपाष्टमी! 🪔