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How to follow religion in Kaliyuga?

कलियुग में धर्म का पालन कैसे करें?




हिंदू धर्म के अनुसार, वर्तमान समय को "कलियुग" कहा जाता है, जो चार युगों में अंतिम और सबसे जटिल युग है। इस युग में अधर्म और असत्य का प्रभाव अधिक होता है, लेकिन फिर भी व्यक्ति अपने सद्कर्मों और सच्चे आचरण के माध्यम से धर्म का पालन कर सकता है।

Navratri fast and its scientificity: Scientific and spiritual reason behind fasting

नवरात्रि व्रत और उसकी वैज्ञानिकता: उपवास के पीछे का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक कारण



Navratri fast and its scientificity: Scientific and spiritual reason behind fasting


नवरात्रि केवल धार्मिक अनुष्ठान का समय नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि और स्वास्थ्य के लिए भी एक महत्वपूर्ण अवसर है। नवरात्रि व्रत रखने की परंपरा के पीछे गहरी आध्यात्मिक और वैज्ञानिक सोच छिपी हुई है। यह न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि स्वास्थ्य और मानसिक शांति प्राप्त करने का भी एक माध्यम है।


Nav Samvatsar: A celebration of new energy

नव संवत्सर: एक नई ऊर्जा का उत्सव



"नववर्ष शुभमस्तु ते, सर्वेषां मंगलम भवेत्।"


नव संवत्सर हिंदू पंचांग के अनुसार नए वर्ष की शुरुआत का पावन पर्व है। यह चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है और इसी दिन से विक्रम संवत का आरंभ भी माना जाता है। यह दिन प्रकृति, धर्म और आध्यात्मिकता से जुड़ा हुआ है, जो हमें एक नई ऊर्जा और सकारात्मकता के साथ जीवन में आगे बढ़ने का संदेश देता है।


Gudi Padwa: Beginning of the New Year

गुड़ी पड़वा: नववर्ष का शुभारंभ


"नवसंवत्सराय शुभमस्तु, जयतु हिंदू संस्कृतिः।"


गुड़ी पड़वा, महाराष्ट्र और गोवा में मनाया जाने वाला एक प्रमुख पर्व है, जो हिंदू नववर्ष के आगमन का प्रतीक है। यह पर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है और इसे विक्रम संवत के प्रारंभ का शुभ अवसर माना जाता है। इस दिन भारत के विभिन्न हिस्सों में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है, जैसे कि कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में युगादि, सिंधी समाज में चेटीचंड, और उत्तर भारत में विक्रम संवत प्रारंभ।


Hindu New Year: A New Beginning

हिंदू नववर्ष : एक नई शुरुआत 



"यथा शिखा मयूराणां, नागानां मणयो यथा। तद्वद् वेदाङ्गशास्त्राणां, गणितं मूर्ध्नि स्थितम्।।"


हिंदू नववर्ष भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा का एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों और तिथियों में मनाया जाता है, लेकिन सभी का उद्देश्य एक ही है—नए वर्ष का स्वागत, नई ऊर्जा का संचार और भगवान से आशीर्वाद की प्रार्थना।


Hanuman ji was an enlightened scholar of the Vedas.



 न अन् ऋग्वेद विनीतस्य न अ यजुर्वेद धारिणः ।
न अ-साम वेद विदुषः शक्यम् एवम् विभाषितुम् ।। 
वाल्मीकि रामायण 4/3/28

राम कहते हैं कि जिस व्यक्ति से मैंने अभी-अभी बात की थी, वह ऋग्वेद में अच्छी तरह से प्रशिक्षित था, उसके पास यजुर्वेद, सामवेद के विद्वतापूर्ण ज्ञान को याद करने की अपार शक्ति है। वैदिक व्याकरण और संबंधित ग्रंथों के विद्वतापूर्ण आदेश के बिना इस प्रकार की प्रभावशाली और हृदयस्पर्शी बात असंभव है। इस प्रकार, श्री राम ने स्वीकार किया कि हनुमान जी वेदों के प्रबुद्ध विद्वान थे।

 

Rama says that the person with whom I just talked was well trained in the Rigveda, has enormous power to remember Yajurveda, scholarly knowledge of Samaveda. This type of impressive and heart-touching talk is impossible without a scholarly command of Vedic grammar and related texts. Thus, Shri Rama acknowledged that Hanuman Ji was an enlightened scholar of the Vedas.


Who Harmed Religion and Devotion

 



श्रीमद्भागवत में स्पष्ट रूप से आया है की जब कलियुग ने गौ और गौवंश पर अत्याचार करना शुरू किया और राजा परीक्षित ने उनसे प्रश्न किया कि किसने धर्म और भक्ति को हानि पहुँचायी है तो धर्म बोल पड़ा  ........


राजन, हमारे उपर होने वाले अत्याचार से हम तो नष्ट हो जाएँगे और जो अत्याचार करेंगे उन्हें पाप भी लगेगा पर उससे अधिक पाप उन्हें लगेगा जो चुपचाप धर्म की हानि होता हुआ देखेंगे या उन गौ वध करने वाले आततायियों से कोई संबंध रखेंगे ।


अतः वे सभी लोग जो आज चुप बैठे हैं या विधर्मियों से किसी भी प्रकार का व्यापारिक व्यवहारिक मानसिक संबंध रखे हैं वे सब भी उन सब कुकर्म ( जैसे रामनवमी पर पत्थर बाज़ी ) में सम्मिलित हैं ।और यदि आज भी न जगे तो दुर्दिन के लिए तैयार हो जाएँ ।


कायर बनकर या फिर " मुझे क्या " की मानसिकता वाले  हिंदुनामधारी उन मलेच्छों से भी अधिक पापी हैं।


@wayoflifekarma

हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाने की परंपरा और साक्ष्य

हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाने की परंपरा और साक्ष्य

हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाने की परंपरा का उल्लेख विभिन्न पुराणों और ग्रंथों में मिलता है। यह परंपरा उनकी असीम भक्ति, बल, और संकटमोचक स्वरूप से जुड़ी हुई है।


1. हनुमान जी और सिंदूर से जुड़ी कथा


वाल्मीकि रामायण और अन्य पुराणों में हनुमान जी की भक्ति के अनेक प्रसंग मिलते हैं, लेकिन सिंदूर चढ़ाने की प्रथा से जुड़ी मुख्य कथा इस प्रकार है—


एक बार माता सीता ने हनुमान जी को यह बताया कि भगवान श्रीराम उनके सिंदूर लगाने से प्रसन्न होते हैं और उनकी लंबी आयु होती है। यह सुनकर हनुमान जी ने सोचा कि यदि थोड़ा सा सिंदूर लगाने से श्रीराम इतने प्रसन्न होते हैं, तो यदि वे पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लें तो प्रभु और अधिक प्रसन्न होंगे और उनकी आयु अनंत हो जाएगी। इसी विचार से हनुमान जी ने अपने पूरे शरीर को सिंदूर से रंग लिया।


जब श्रीराम ने हनुमान जी को इस रूप में देखा, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने आशीर्वाद दिया कि जो भी भक्त हनुमान जी को सिंदूर अर्पित करेगा, उसे उनका आशीर्वाद प्राप्त होगा और उसके सभी कष्ट दूर होंगे।


2. पुराणों और ग्रंथों में साक्ष्य


(i) ब्रह्मवैवर्त पुराण


ब्रह्मवैवर्त पुराण में हनुमान जी की भक्ति और श्रीराम के प्रति उनकी श्रद्धा का विस्तार से उल्लेख है, जिसमें कहा गया है कि हनुमान जी अपने आराध्य को प्रसन्न करने के लिए विभिन्न उपाय अपनाते थे।


(ii) स्कंद पुराण


स्कंद पुराण में उल्लेख मिलता है कि हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाने से भक्त की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और उसे बल, बुद्धि और विद्या की प्राप्ति होती है।


(iii) तुलसीदास रचित रामचरितमानस


रामचरितमानस में हनुमान जी के बल, भक्ति और श्रीराम के प्रति उनकी निष्ठा का वर्णन किया गया है। सिंदूर से जुड़ी कथा का सीधा उल्लेख तो नहीं है, लेकिन उनकी भक्ति को सर्वोपरि बताया गया है।


3. धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व


1. सिंदूर को शक्ति और विजय का प्रतीक माना जाता है, इसलिए हनुमान जी को इसे अर्पित किया जाता है।

2. सिंदूर चढ़ाने से भक्तों को संकटों से मुक्ति मिलती है, क्योंकि हनुमान जी को "संकटमोचक" कहा जाता है।

3. शक्तिपीठों में भी सिंदूर का विशेष महत्व होता है, और हनुमान जी शक्ति के प्रतीक माने जाते हैं।


4. आज की परंपरा में प्रचलन


हर मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी के भक्त सिंदूर और चमेली का तेल चढ़ाते हैं।

यह विशेष रूप से उत्तर भारत में प्रचलित परंपरा है, जहाँ भक्त उनके चरणों में सिंदूर चढ़ाकर संकटों से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं।


निष्कर्ष


हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाने की परंपरा एक पौराणिक कथा से जुड़ी हुई है और इसका उल्लेख विभिन्न ग्रंथों में मिलता है। यह परंपरा शक्ति, भक्ति और श्रीराम के प्रति उनकी असीम निष्ठा को दर्शाती है। धार्मिक दृष्टि से भी इसे शुभ माना जाता है और इससे भक्तों को मानसिक और आध्यात्मिक बल प्राप्त होता है।


108 Names of Hanuman ji

 

 हनुमान जी के 108 नाम



हनुमान जी की उपासना से जीवन के सारे कष्ट, संकट मिट जाते है। माना जाता है कि हनुमान एक ऐसे देवता है जो थोड़ी-सी प्रार्थना और पूजा से ही शीघ्र प्रसन्न हो जाते है। मंगलवार और शनिवार का दिन इनके पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं। उनके 108 पवित्र नाम...

Hindu Calendar Months

हिंदू कैलेंडर में 12 महीनों के नाम होते हैं, जो चंद्र महीनों पर आधारित होते हैं। ये नाम निम्नलिखित हैं:-





1. चैत्र (Chaitra): मार्च-अप्रैल


2. वैशाख (Vaishakha): अप्रैल-मई


3. ज्येष्ठ (Jyeshtha): मई-जून


4. आषाढ़ (Ashadha): जून-जुलाई


5. श्रावण (Shravana): जुलाई-अगस्त


6. भाद्रपद (Bhadrapada): अगस्त-सितंबर


7. आश्विन (Ashwin): सितंबर-अक्टूबर


8. कार्तिक (Kartika): अक्टूबर-नवंबर


9. मार्गशीर्ष (Margashirsha): नवंबर-दिसंबर


10. पौष (Pausha): दिसंबर-जनवरी


11. माघ (Magha): जनवरी-फरवरी


12. फाल्गुन (Phalguna): फरवरी-मार्च


विशेषताएँ:


ये नाम चंद्रमा के चरणों और ऋतुओं के आधार पर तय किए जाते हैं।


हर महीने में दो पक्ष (अमावस्या से पूर्णिमा तक का शुक्ल पक्ष और पूर्णिमा से अमावस्या तक का कृष्ण पक्ष) होते हैं।


इन महीनों का उपयोग धार्मिक त्योहारों और संस्कारों की तिथियों के निर्धारण में किया जाता है।



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In which month Khichdi is celebrated?

 



  • सूर्य संक्रांति में मकर सक्रांति का महत्व ही अधिक माना गया है।

  •  माघ माह में कृष्ण पंचमी को मकर सक्रांति देश के लगभग सभी राज्यों में अलग-अलग सांस्कृतिक रूपों में मनाई जाती है। 

  • इस बार 14 जनवरी 2025 को मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाएगा । 

  • खिचड़ी जनवरी महीने में मनाया जाता है |

  • 2025 की खिचड़ी 14 जनवरी को है | 

 

 

Who gets the vision of God?


Way Of Life Karma: ईश्वर के दर्शन किसे प्राप्त होते हैं ?
एक राजा था। वह बहुत न्याय प्रिय तथा प्रजा वत्सल एवं धार्मिक स्वभाव का था। वह नित्य अपने ठाकुर जी की बडी श्रद्धा से पूजा-पाठ और याद करता था।एक दिन ठाकुर जी ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिये तथा कहा- राजन् मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं। बोलो तुम्हारी कोई इच्छा हॆ ?

प्रजा को चाहने वाला राजा बोला - भगवन् मेरे पास आपका दिया सब कुछ हैं आपकी कृपा से राज्य मे सब प्रकार सुख-शान्ति है।फिर भी मेरी एक ही इच्छा हैं कि जैसे आपने मुझे दर्शन देकर धन्य किया,वैसे ही मेरी सारी प्रजा को भी कृपा कर दर्शन दीजिये।

यह तो सम्भव नहीं है !! -- ऐसा कहते हुए भगवान ने राजा को समझाया। परन्तु प्रजा को चाहने वाला राजा भगवान् से जिद्द् करने लगा।आखिर भगवान को अपने भक्ति के सामने झुकना पडा ओर वे बोले - ठीक है !! कल अपनी सारी प्रजा को उस पहाड़ी के पास ले आना और मैं पहाडी के ऊपर से सभी को दर्शन दूँगा।ये सुन कर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुआ और भगवान को धन्यवाद दिया।

राजा ने सारे नगर मे ढिंढोरा पिटवा दिया कि - कल सभी पहाड़ के नीचे मेरे साथ पहुँचे,वहाँ भगवान आप सबको दर्शन देगें। दूसरे दिन राजा अपने समस्त प्रजा और स्वजनों को साथ लेकर पहाडी की ओर चलने लगा।

चलते-चलते रास्ते मे एक स्थान पर तांबे कि सिक्कों का पहाड देखा।प्रजा में से कुछ एक लोग उस ओर भागने लगे।तभी ज्ञानी राजा ने सबको सर्तक किया कि कोई उस ओर ध्यान न दे, क्योकि तुम सब भगवान से मिलने जा रहे हो, इन तांबे के सिक्कों के पीछे अपने भाग्य को लात मत मारो।परन्तु लोभ-लालच मे वशीभूत प्रजा के कुछ एक लोग तो तांबे की सिक्कों वाली पहाड़ी की ओर भाग ही गये और सिक्कों कि गठरी बनाकर अपने घर कि ओर चलने लगे।वे मन ही मन सोच रहे थे,पहले ये सिक्कों को समेट ले,भगवान से तो फिर कभी मिल ही लेगे।

राजा खिन्न मन से आगे बढे।कुछ दूर चलने पर चांदी कि सिक्कों का चमचमाता पहाड़ दिखाई दिया। इस वार भी बचे हुये प्रजा में से कुछ लोग,उस ओर भागने लगे ओर चांदी के सिक्कों की गठरी बनाकर अपनी घर की ओर चलने लगे। उनके मन मे विचार चल रहा था कि ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता है।

चांदी के इतने सारे सिक्के फिर मिले न मिले,भगवान तो फिर कभी मिल ही जायेगें।

इसी प्रकार कुछ दूर और चलने पर सोने के सिक्कों का पहाड़ नजर आया। अब तो प्रजाजनो में बचे हुये सारे लोग तथा राजा के स्वजन भी उस ओर भागने लगे।
वे भी दूसरों की तरह सिक्कों कि गठरीयां लाद-लाद कर अपने-अपने घरों की ओर चल दिये।अब केवल राजा ओर रानी ही शेष रह गये थे। राजा रानी से कहने लगे --
देखो कितने लोभी ये लोग। भगवान से मिलने का महत्व ही नहीं जानते हैं। भगवान के सामने सारी दुनियां की दौलत क्या चीज हैं? 

सही बात है -- रानी ने राजा कि बात का समर्थन किया और वह आगे बढने लगे कुछ दूर चलने पर राजा ओर रानी ने देखा कि सप्तरंगि आभा बिखरता हीरों का पहाड़ है।

अब तो रानी से भी रहा नहीं गया,हीरों के आर्कषण से वह भी दौड पड़ी और हीरों कि गठरी बनाने लगी। फिर भी उसका मन नहीं भरा तो साड़ी के पल्लू मेँ भी बांधने लगी। वजन के कारण रानी के वस्त्र देह से अलग हो गये,परंतु हीरों का तृष्णा अभी भी नहीं मिटी। यह देख राजा को अत्यन्त ही ग्लानि ओर विरक्ति हुई।

 बड़े दुःखद मन से राजा अकेले ही आगे बढते गये।वहाँ सचमुच भगवान खड़े उसका इन्तजार कर रहे थे। 

राजा को देखते ही भगवान मुसकुराये ओर पुछा -
कहाँ है तुम्हारी प्रजा और तुम्हारे प्रियजन। मैं तो कब से उनसे मिलने के लिये बेकरारी से उनका इन्तजार कर रहा हूॅ। राजा ने शर्म और आत्म-ग्लानि से अपना सिर झुका दिया।

तब भगवान ने राजा को समझाया --
राजन !! जो लोग अपने जीवन में भौतिक सांसारिक प्राप्ति को मुझसे अधिक मानते हैं,उन्हें कदाचित मेरी प्राप्ति नहीं होती और वह मेरे स्नेह तथा कृपा से भी वंचित रह जाते हैं !!

कथा सार- जो जीव अपनी मन,बुद्धि और आत्मा से भगवान की शरण में जाते हैं और जो सर्व लौकिक मोह को छोड के प्रभु को ही अपना मानते हैं वो ही भगवान के दर्शन प्राप्त करते है..!!
   🙏🏻जय श्री कृष्ण🙏


12 things to always remember!

 

 हमेशा याद रखने योग्य 12 बातें !



🌺  अतीत को बदला नहीं जा सकता

🌺  दूसरों की राय आपकी वास्तविकता को परिभाषित नहीं करती।

🌺  हर किसी का सफर अलग होता है।

🌺  दूसरों के निर्णय आपके बारे में नहीं हैं।

🌺  ज्यादा सोचने से दुःख होगा।

🌺  खुशी भीतर पाई जाती है।

🌺  आपके विचार आपके मूड को प्रभावित करते हैं।

🌺  मुस्कान संक्रामक होती है।

🌺  दया निःशुल्क है।

🌺  जाने देना और आगे बढ़ना ठीक है।

🌺  जो देते हो , वही आता है।

🌺  समय के साथ चीजें हमेशा बेहतर होती जाती हैं।

 


हिंदू धर्म और विज्ञान: एक गहरा संबंध

 

 


 Hinduism and Science: A Deep Connection


हिंदू धर्म और विज्ञान, दोनों ही सत्य की खोज में लगे हैं, बस अलग-अलग तरीकों से। हिंदू धर्म आध्यात्मिक, भौतिक, तार्किक और दर्शनीय दृष्टिकोण से सत्य को खोजता है, जब कि विज्ञान भौतिक और तार्किक दृष्टिकोण से। दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही क्षेत्रों में कई समानताएं और संभावित संबंध देखने को मिलते हैं।

 

कुछ प्रमुख बिंदु जिन पर हम विस्तार से चर्चा कर सकते हैं:-


 ब्रह्मांड की उत्पत्ति और संरचना

हिंदू धर्म:- हिंदू धर्म में ब्रह्मांड की उत्पत्ति के कई सिद्धांत हैं। ब्रह्मांड को चक्रीय रूप से विस्तार और संकुचन करने वाला माना जाता है। पुराणों में ब्रह्मांड की उत्पत्ति का वर्णन ब्रह्मा से होता है, जो सृष्टिकर्ता हैं।

विज्ञान:- बिग बैंग थ्योरी ब्रह्मांड की उत्पत्ति के बारे में  सिद्धांत है। यह सिद्धांत कहता है कि ब्रह्मांड एक अत्यंत घने और गर्म बिंदु से विस्तारित हुआ।


समानता:- दोनों ही दृष्टिकोण ब्रह्मांड की उत्पत्ति को एक बिंदु से मानते हैं, हालांकि उनकी व्याख्याएं अलग हैं।

 

 चेतना और मन

हिंदू धर्म:- हिंदू दर्शन में चेतना को ब्रह्मांड का आधार माना जाता है। योग और ध्यान जैसी प्राचीन भारतीय प्रथाएं चेतना को समझने और नियंत्रित करने के तरीके बताती हैं।

 

विज्ञान:- क्वांटम भौतिकी में चेतना की भूमिका पर काफी चर्चा होती है। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि चेतना और अवलोकन ब्रह्मांड की प्रकृति को प्रभावित करते हैं। हिंदू धर्म में भी क्वांटम भौतिकी को आप पाएंगे |


समानता:- दोनों ही क्षेत्र चेतना को ब्रह्मांड के एक महत्वपूर्ण पहलू के रूप में मानते हैं।

 

 पंचतत्व और पदार्थ

हिंदू धर्म:- हिंदू धर्म में पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) का उल्लेख है। इन तत्वों को पदार्थ के मूल घटक माना जाता है।

 

विज्ञान:- आधुनिक विज्ञान भी पदार्थ को इन पांच तत्वों के संयोजन के रूप में देखता है, हालांकि विस्तृत वर्गीकरण अलग हो सकता है।

 

समानता:-  दोनों ही दृष्टिकोण पदार्थ के मूल घटकों के बारे में समान अवधारणा रखते हैं।


कर्म और कारण-कार्य संबंध

हिंदू धर्म:- कर्म का सिद्धांत कहता है कि हमारे कर्मों का फल हमें मिलता है। यह एक कारण-कार्य संबंध स्थापित करता है।

 

विज्ञान:- कारण-कार्य का सिद्धांत विज्ञान का एक मूल सिद्धांत है। यह कहता है कि प्रत्येक घटना का एक कारण होता है।

 

समानता:- दोनों ही दृष्टिकोण कारण-कार्य के संबंध को मानते हैं, हालांकि उनके कारणों की व्याख्याएं अलग हो सकती हैं।

 

 योग और ध्यान का विज्ञान

हिंदू धर्म:- योग और ध्यान को शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है।

 

विज्ञान:- अब कई वैज्ञानिक अध्ययन योग और ध्यान के लाभों को सिद्ध कर रहे हैं। ये मस्तिष्क की संरचना और कार्यप्रणाली को प्रभावित करते हैं, तनाव कम करते हैं और प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाते हैं।

 

समानता:- विज्ञान योग और ध्यान के लाभों को वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है।

 

 कुछ अन्य समानताएं

 

अंतरिक्ष यात्रा:- पुराणों में वायुयान और अन्य उड़ने वाले यंत्रों का वर्णन मिलता है, जो आधुनिक अंतरिक्ष यात्रा के विचारों से मिलता-जुलता है।

 

परमाणु सिद्धांत:- कुछ हिंदू ग्रंथों में परमाणु के बारे में वर्णन मिलता है, जो आधुनिक परमाणु सिद्धांत से मिलता-जुलता है।

निष्कर्ष:-


हिंदू धर्म और विज्ञान, दोनों ही सत्य की खोज में लगे हैं, बस अलग-अलग तरीकों से। दोनों के बीच कई समानताएं और संभावित संबंध हैं। यह कहना गलत होगा कि विज्ञान हिंदू धर्म को सिद्ध करता है, लेकिन यह निश्चित रूप से कुछ हिंदू धार्मिक सिद्धांतों के वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है।


speaking scene

 

 

our Real History books carved in stone..

 Bhishm Pitamah on his deathbed(arrow bed)The Chennakeshava Temple, Belur, is a 12th-century Hindu temple, Hassan district of Karnataka state

 

51 शक्ति पीठ

 

यह 51 शक्ति पीठ हिंदू धर्म में देवी शक्ति (दिव्य स्त्री शक्ति) को समर्पित पवित्र स्थान हैं। 

ऐसा माना जाता है कि ये स्थान वह हैं जहाँ देवी सती के शरीर के अंग या आभूषण भगवान शिव के तांडव के दौरान गिरे थे। 

प्रत्येक शक्ति पीठ देवी के शरीर के एक विशिष्ट भाग और देवी ऊर्जा के एक विशिष्ट पहलू से जुड़ा हुआ है। 

भारत और कुछ अन्य देशों में स्थित 51 शक्ति पीठों की सूची निम्नलिखित है:-



1. कामाख्या देवी – असम (योनि)

2. शंकरी देवी – श्रीलंका (कंधे)

3. सुगंधा देवी – बांग्लादेश (नाक)

4. मिथिला देवी – बिहार (बायाँ कंधा)

5. कल्याणी देवी – महाराष्ट्र (चेहरा)

6. महिषमर्दिनी देवी – झारखंड (दायाँ कंधा)

7. विशालाक्षी देवी – वाराणसी, उत्तर प्रदेश (कर्णफूल)

8. ज्वालामुखी देवी – हिमाचल प्रदेश (जीभ)

9. दक्षायणी देवी – तमिलनाडु (गाल)

10. नैनातिवु देवी – श्रीलंका (पाँव)

11. कांचीपुरम देवी – तमिलनाडु (कंकाल)

12. कीरित देवी – पश्चिम बंगाल (मुकुट)

13. विंध्यवासिनी देवी – उत्तर प्रदेश (कलाई)

14. मंगल चंडी देवी – बांग्लादेश (दायाँ हाथ)

15. अट्टहास देवी – पश्चिम बंगाल (होठ)

16. जयन्ती देवी – पश्चिम बंगाल (बायाँ जांघ)

17. तारातारिणी देवी – ओडिशा (स्तन)

18. विमला देवी – पुरी, ओडिशा (पाँव)

19. कीरित देवी – पश्चिम बंगाल (मुकुट)

20. बिरजा देवी – जाजपुर, ओडिशा (नाभि)

21. कंकालितला देवी – पश्चिम बंगाल (हड्डियाँ)

22. महामाया देवी – मध्य प्रदेश (बायीं आँख)

23. त्रिपुरा सुंदरी देवी – त्रिपुरा (दायाँ पाँव)

24. शिवानी देवी – मध्य प्रदेश (नाक)

25. बहुला देवी – पश्चिम बंगाल (बायाँ हाथ)

26. काश्मीरा देवी – कश्मीर (गला)

27. हिंगलाज देवी – बलूचिस्तान, पाकिस्तान (ब्राह्मरंध्र)

28. कालिका देवी – गुजरात (ह्रदय)

29. कामाक्षी देवी – तमिलनाडु (गर्दन)

30. श्रीशैल देवी – आंध्र प्रदेश (गर्दन)

31. चिंतपूर्णी देवी – हिमाचल प्रदेश (पाँव)

32. मनसा देवी – असम (हाथ)

33. शोंदेश देवी – बांग्लादेश (दायाँ नितंब)

34. भ्रामरी देवी – महाराष्ट्र (बायाँ पाँव)

35. श्री गिरिजा देवी – महाराष्ट्र (नाभि)

36. वैष्णो देवी – जम्मू और कश्मीर (खोपड़ी)

37. चामुंडेश्वरी देवी – कर्नाटक (पीठ)

38. शारदा देवी – कश्मीर (गर्दन)

39. बक्रेश्वर देवी – पश्चिम बंगाल (माथा)

40. उज्जैनी देवी – मध्य प्रदेश (कुहनी)

41. जलपा देवी – गुजरात (पेट)

42. नैना देवी – हिमाचल प्रदेश (आँखें)

43. सर्वमंगला देवी – गुजरात (स्तन)

44. कालीघाट देवी – पश्चिम बंगाल (दाएँ पैर की उँगलियाँ)

45. आनंदमयी देवी – पश्चिम बंगाल (गर्दन)

46. नंदिकेश्वरी देवी – पश्चिम बंगाल (दाँत)

47. सप्तश्रृंगी देवी – महाराष्ट्र (दायाँ हाथ)

48. महालक्ष्मी देवी – महाराष्ट्र (कान)

49. हर्षिद्दी देवी – मध्य प्रदेश (कुहनी)

50. भद्रकाली देवी – उत्तराखंड (बायाँ नितंब)

51. श्री सुंदरी देवी – गुजरात (जांघ)

ये शक्ति पीठ बहुत ही पवित्र माने जाते हैं और भारत तथा कुछ पड़ोसी देशों में फैले हुए हैं। 

प्रत्येक शक्ति पीठ देवी सती के शरीर के एक विशिष्ट अंग या आभूषण से जुड़ा हुआ है, और इन्हें तीर्थयात्रा के महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है। 

श्रद्धालु मानते हैं कि इन पवित्र स्थलों की यात्रा करने से उन्हें देवी का आशीर्वाद और सुरक्षा प्राप्त होती है।

 

तमिलनाडु में विनायक मूर्तियों की शैली में समय के साथ क्या बदलाव आए हैं?

 

 

तमिलनाडु में विनायक मूर्तियों की शैली में समय के साथ कई बदलाव आए हैं, जो क्षेत्र की सांस्कृतिक, धार्मिक और कलात्मक परंपराओं के विकास को दर्शाते हैं।

 

कुछ प्रमुख परिवर्तनों में शामिल हैं:

  • प्रारंभिक काल (5वीं-8वीं शताब्दी): इस अवधि के दौरान, विनायक मूर्तियाँ अधिक सरल और शास्त्रीय थीं। वे आमतौर पर पत्थर से बनी होती थीं और गणेश को एक युवा पुरुष के रूप में दर्शाती थीं।

  • चोल काल (9वीं-13वीं शताब्दी): चोल काल के दौरान, विनायक मूर्तियों की शैली में नाटकीय परिवर्तन हुए। मूर्तियाँ अधिक जटिल और सजावटी हो गईं, अक्सर धातु से बनी होती थीं और गणेश को एक अधिक भव्य और प्रभावशाली रूप में दर्शाती थीं।

  • विजयनगर साम्राज्य (14वीं-17वीं शताब्दी): विजयनगर साम्राज्य के दौरान, विनायक मूर्तियों की शैली में दक्षिण भारतीय शैली का प्रभाव देखा गया। मूर्तियाँ अक्सर अधिक विस्तृत और रंगीन थीं, और गणेश को एक अधिक आध्यात्मिक और गंभीर रूप में दर्शाती थीं।

  • आधुनिक काल: आधुनिक काल में, विनायक मूर्तियों की शैली में और भी अधिक विविधता देखी जा सकती है। कुछ मूर्तियाँ पारंपरिक शैली का पालन करती हैं, जबकि अन्य अधिक आधुनिक और प्रयोगात्मक शैलियों में बनाई जाती हैं।

     

इन परिवर्तनों के बावजूद, विनायक की मूल विशेषताएँ, जैसे हाथी का सिर, चूहे का वाहन और एक दांत, सभी समय अवधियों में बनी रही हैं। ये विशेषताएँ गणेश की पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई हैं।

तमिलनाडु में कोई ऐसा मंदिर है जहां विनायक को मानव रूप में पूजा जाता हो?

 

 

जी हां, तमिलनाडु में एक ऐसा मंदिर है जहां विनायक को मानव रूप में पूजा जाता है।

यह मंदिर है आदि विनायक मंदिर जो तिरुवरूर में स्थित है। इस मंदिर में विराजमान विनायक की मूर्ति में हाथी का सिर नहीं बल्कि मानव का चेहरा है। यह मूर्ति अपनी अनूठी शैली के कारण बहुत प्रसिद्ध है और देश भर से भक्त यहां दर्शन के लिए आते हैं।

 

आदि विनायक मंदिर की कुछ खास बातें:

  • मानवमुख गणेश: इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यहां विराजमान गणेश की मूर्ति में मानव का चेहरा है। यह मूर्ति हिंदू धर्म में गणेश के विभिन्न रूपों को दर्शाने वाली एक दुर्लभ मूर्ति है।

  • प्राचीन इतिहास: इस मंदिर का इतिहास काफी पुराना है और इसे कई शताब्दियों पुराना माना जाता है।

  • धार्मिक महत्व: स्थानीय लोगों के लिए यह मंदिर बहुत ही पवित्र है और वे यहां आकर अपनी मनोकामनाएं पूरी होने की कामना करते हैं।

  • वास्तुशिल्प: मंदिर की वास्तुकला दक्षिण भारतीय शैली की है और यह काफी सुंदर और भव्य है।

     

यदि आप तमिलनाडु घूमने जा रहे हैं तो आदि विनायक मंदिर जरूर जाएँ। यह एक ऐसा मंदिर है जो आपको आध्यात्मिक शांति और अनुभव प्रदान करेगा।

तमिलनाडु में सबसे बड़ी विनायक मूर्ति कहाँ स्थित है?

 

तमिलनाडु में सबसे बड़ी विनायक मूर्ति को लेकर कुछ भ्रांतियां हैं। अक्सर यह माना जाता है कि सबसे बड़ी मूर्ति महाराष्ट्र में है, लेकिन ऐसा नहीं है।

 

तमिलनाडु में एशिया की सबसे बड़ी विनायक मूर्ति अरुल्मिगु मुन्थी विनायगर मंदिर, कोयंबटूर में स्थित है। यह विशाल मूर्ति ग्रेनाइट से बनी है और इसका आकार इतना बड़ा है कि यह दूर से ही दिखाई देती है।

 

अरुल्मिगु मुन्थी विनायगर मंदिर कोयंबटूर में स्थित है और यह तमिलनाडु के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। यहां विराजमान विनायक की मूर्ति न केवल अपनी विशालता बल्कि अपनी भव्यता के लिए भी जानी जाती है। यह मंदिर स्थानीय लोगों के साथ-साथ देश-विदेश से आने वाले भक्तों के लिए आस्था का केंद्र है।

 

अन्य उल्लेखनीय विनायक मंदिर

 

  • करपाका विनायकर मंदिर: मदुरै के पास स्थित यह मंदिर भी अपनी विशाल विनायक मूर्ति के लिए जाना जाता है।
  • आदि विनायक मंदिर, तिरुवरूर: यह मंदिर अपने अनोखे मानवमुख गणेश की मूर्ति के लिए प्रसिद्ध है।

 

तमिलनाडु में सबसे पुरानी विनायक मूर्ति कौन सी है?

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