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Navratri fast and its scientificity: Scientific and spiritual reason behind fasting

नवरात्रि व्रत और उसकी वैज्ञानिकता: उपवास के पीछे का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक कारण



Navratri fast and its scientificity: Scientific and spiritual reason behind fasting


नवरात्रि केवल धार्मिक अनुष्ठान का समय नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि और स्वास्थ्य के लिए भी एक महत्वपूर्ण अवसर है। नवरात्रि व्रत रखने की परंपरा के पीछे गहरी आध्यात्मिक और वैज्ञानिक सोच छिपी हुई है। यह न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि स्वास्थ्य और मानसिक शांति प्राप्त करने का भी एक माध्यम है।


Spiritual significance of Navratri

नवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व: माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा का महत्व और ऊर्जा






Spiritual significance of Navratri: Importance and energy of worshipping nine forms of Maa Durga


नवरात्रि हिन्दू धर्म में एक अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक पर्व है, जो वर्ष में दो बार मनाया जाता है – चैत्र और शारदीय नवरात्रि के रूप में। यह नौ दिनों का उत्सव माँ दुर्गा के विभिन्न रूपों की आराधना का प्रतीक है और साधना, शक्ति, और आत्मशुद्धि का समय माना जाता है।


हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाने की परंपरा और साक्ष्य

हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाने की परंपरा और साक्ष्य

हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाने की परंपरा का उल्लेख विभिन्न पुराणों और ग्रंथों में मिलता है। यह परंपरा उनकी असीम भक्ति, बल, और संकटमोचक स्वरूप से जुड़ी हुई है।


1. हनुमान जी और सिंदूर से जुड़ी कथा


वाल्मीकि रामायण और अन्य पुराणों में हनुमान जी की भक्ति के अनेक प्रसंग मिलते हैं, लेकिन सिंदूर चढ़ाने की प्रथा से जुड़ी मुख्य कथा इस प्रकार है—


एक बार माता सीता ने हनुमान जी को यह बताया कि भगवान श्रीराम उनके सिंदूर लगाने से प्रसन्न होते हैं और उनकी लंबी आयु होती है। यह सुनकर हनुमान जी ने सोचा कि यदि थोड़ा सा सिंदूर लगाने से श्रीराम इतने प्रसन्न होते हैं, तो यदि वे पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लें तो प्रभु और अधिक प्रसन्न होंगे और उनकी आयु अनंत हो जाएगी। इसी विचार से हनुमान जी ने अपने पूरे शरीर को सिंदूर से रंग लिया।


जब श्रीराम ने हनुमान जी को इस रूप में देखा, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने आशीर्वाद दिया कि जो भी भक्त हनुमान जी को सिंदूर अर्पित करेगा, उसे उनका आशीर्वाद प्राप्त होगा और उसके सभी कष्ट दूर होंगे।


2. पुराणों और ग्रंथों में साक्ष्य


(i) ब्रह्मवैवर्त पुराण


ब्रह्मवैवर्त पुराण में हनुमान जी की भक्ति और श्रीराम के प्रति उनकी श्रद्धा का विस्तार से उल्लेख है, जिसमें कहा गया है कि हनुमान जी अपने आराध्य को प्रसन्न करने के लिए विभिन्न उपाय अपनाते थे।


(ii) स्कंद पुराण


स्कंद पुराण में उल्लेख मिलता है कि हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाने से भक्त की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और उसे बल, बुद्धि और विद्या की प्राप्ति होती है।


(iii) तुलसीदास रचित रामचरितमानस


रामचरितमानस में हनुमान जी के बल, भक्ति और श्रीराम के प्रति उनकी निष्ठा का वर्णन किया गया है। सिंदूर से जुड़ी कथा का सीधा उल्लेख तो नहीं है, लेकिन उनकी भक्ति को सर्वोपरि बताया गया है।


3. धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व


1. सिंदूर को शक्ति और विजय का प्रतीक माना जाता है, इसलिए हनुमान जी को इसे अर्पित किया जाता है।

2. सिंदूर चढ़ाने से भक्तों को संकटों से मुक्ति मिलती है, क्योंकि हनुमान जी को "संकटमोचक" कहा जाता है।

3. शक्तिपीठों में भी सिंदूर का विशेष महत्व होता है, और हनुमान जी शक्ति के प्रतीक माने जाते हैं।


4. आज की परंपरा में प्रचलन


हर मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी के भक्त सिंदूर और चमेली का तेल चढ़ाते हैं।

यह विशेष रूप से उत्तर भारत में प्रचलित परंपरा है, जहाँ भक्त उनके चरणों में सिंदूर चढ़ाकर संकटों से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं।


निष्कर्ष


हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाने की परंपरा एक पौराणिक कथा से जुड़ी हुई है और इसका उल्लेख विभिन्न ग्रंथों में मिलता है। यह परंपरा शक्ति, भक्ति और श्रीराम के प्रति उनकी असीम निष्ठा को दर्शाती है। धार्मिक दृष्टि से भी इसे शुभ माना जाता है और इससे भक्तों को मानसिक और आध्यात्मिक बल प्राप्त होता है।


Types Of Chanting

 जप के प्रकार और कौन से जप से क्या होता है जानिए...!!!


जप के अनेक प्रकार हैं। उन सबको समझ लें तो एक जपयोग में ही सब साधन आ जाते हैं। परमार्थ साधन के कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग और राजयोग ये चार बड़े विभाग हैं। जपयोग में इन चारों का अंतर्भाव हो जाता है। 


जप के कुछ मुख्य प्रकार ये हैं- 

1. नित्य जप, 

2. नैमित्तिक जप, 

3. काम्य जप, 

4. निषिद्ध जप, 

5. प्रायश्चित जप, 

6. अचल जप, 

7. चल जप, 

8. वाचिक जप, 

9. उपांशु जप, 

10. भ्रमर जप, 

11. मानस जप, 

12. अखंड जप, 

13. अजपा जप और 

14. प्रदक्षिणा जप इत्यादि।


1. नित्य जप


प्रात:-सायं गुरु मंत्र का जो नित्य-नियमित जप किया जाता है, वह नित्य जप है। यह जप जपयोगी को नित्य ही करना चाहिए। आपातकाल में, यात्रा में अथवा बीमारी की अवस्‍था में, जब स्नान भी नहीं कर सकते, तब भी हाथ, पैर और मुंह धोकर कम से कम कुछ जप तो अवश्य कर ही लेना चाहिए, जैसे झाड़ना, बुहारना, बर्तन मलना और कपड़े धोना रोज का ही काम है, वैसे ही नित्य कर्म भी नित्य ही होना चाहिए। उससे नित्य दोष दूर होते हैं, जप का अभ्यास बढ़ता है, आनंद बढ़ता जाता है और चित्त शुद्ध होता जाता है और धर्म विचार स्फुरने लगते हैं। और जप संख्या ज्यों-ज्यों बढ़ती है, त्यों-त्यों ईश्वरी कृपा अनुभूत होने लगती और अपनी निष्ठा दृढ़ होती जाती है।


2. नैमित्तिक जप


किसी निमित्त से जो जप होता है, वह नैमित्तिक जप है। देव-पितरों के संबंध में कोई हो, तब यह जप किया जाता है। सप्ताह में अपने इष्ट का एक न एक बार होता ही है। उस दिन तथा एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या आदि पर्व दिनों में और महाएकादशी, महाशिवरात्रि, श्री रामनवमी, श्री कृष्णाष्टमी, श्री दुर्गानवरात्र, श्री गणेश चतुर्थी, श्री रथ सप्तमी आदि शुभ दिनों में तथा ग्रहणादि पर्वों पर एकांत स्थान में बैठकर अधिक अतिरिक्त जप करना चाहिए। इससे पुण्य-संग्रह बढ़ता है और पाप का नाश होकर सत्यगुण की वृद्धि होती है और ज्ञान सुलभ होता है। यह जप रात में एकांत में करने से दृष्टांत भी होते हैं। 'न देवतोषणं व्यर्थम'- देव को प्रसन्न करना कभी व्यर्थ नहीं होता, यही मंत्रशास्त्र का कहना है। 


इष्टकाल में इसकी सफलता आप ही होती है। पितरों के लिए किया हुआ जप उनके सुख और सद्गति का कारण होता है और उनसे आशीर्वाद मिलते हैं। हमारा उनकी कोख से जन्म लेना भी इस प्रकार चरितार्थ हो जाता है। जिसको उद्देश्य करके संकल्पपूर्वक जो जप किया जाता है, वह उसी को प्राप्त होता है, यह मंत्रशास्त्र का सिद्धांत है। इस प्रकार पुण्य जोड़कर वह पितरों को पहुंचाया जा सकता है। इससे उनके ऋण से मुक्ति मिल सकती है। इसलिए कव्य कर्म के प्रसंग में और पितृपक्ष में भी यह जप अवश्य करना चाहिए। गुरु मंत्र से हव्यकर्म भी होता है।


3. काम्य जप


किसी कामना की सिद्धि के लिए जो जप किया जाता है, उसे काम्य जप कहते हैं। यह काम्य कर्म जैसा है, मोक्ष चाहने वाले के काम का नहीं है। आर्त, अर्थार्थी, कामकामी लोगों के लिए उपयोगी है। इसके साधन में पवित्रता, नियमों का पूर्ण पालन, सावधानता, जागरूकता, धैर्य, निरलसता, मनोनिग्रह, इन्द्रिय निग्रह, वाक् संयम, मिताहार, मितशयन, ब्रह्मचर्य इन सबका होना अत्यंत ही आवश्यक है। योग्य गुरु से योग्य समय में लिया हुआ योग्य मंत्र हो, विधिपूर्वक जप हो, मन की एकाग्रता हो, दक्षिणा दे, भोजन कराएं, हवन करें, इस सांगता के साथ अनुष्ठान हो तो साधक की कामना अवश्य पूर्ण होती है।

इसमें कोई गड़बड़ हो तो मंत्र सिद्ध नहीं हो सकता। काम्य जप करने के अनेक मंत्र हैं। जप से पुण्य संग्रह तो होता है, पर भोग से उसका क्षय भी होता है। इसलिए प्राज्ञ पुरुष इसे अच्‍छा नहीं समझते। परंतु सभी साधक समान नहीं होते। कुछ ऐसे भी कनिष्ठ साधक होते ही हैं, जो शुद्ध मोक्ष के अतिरिक्त अन्य धर्माविरुद्ध कामनाएं भी पूरी करना चाहते हैं। क्षुद्र देवताओं और क्षुद्र साधनों के पीछे पड़कर अपनी भयंकर हानि कर लेने की अपेक्षा वे अपने इष्ट मंत्र का काम्य जप करके चित्त को शांत करें और परमार्थ प्रवण हों, यह अधिक अच्छा है।


4. निषिद्ध जप


मनमाने ढंग से अविधिपूर्वक अनियम जप जपने को निषिद्ध जप कहते हैं। निषिद्ध कर्म की तरह यह बहुत बुरा है। मंत्र का शुद्ध न होना, अपवित्र मनुष्य से मंत्र लेना, देवता कोई और मंत्र कोई और ही, अनेक मंत्रों को एकसाथ अविधिपूर्वक जपना, मंत्र का अर्थ और विधि न जानना, श्रद्धा का न होना, देवताराधन के बिना ही जप करना, किसी प्रकार का भी संयम न रखना- ये सब निषिद्ध जप के लक्षण हैं। ऐसा निषिद्ध जप कोई न करे, उससे लाभ होने के बदले प्राय: हानि ही हुआ करती है।


5. प्रायश्चित जप

 

 अपने हाथ से अनजान से कोई दोष या प्रमाद हो जाए तो उस दुरित-नाश के लिए जो जप किया जाता है, वह प्रायश्चित जप है। प्रायश्चित कर्म के सदृश है और आवश्यक है। मनुष्य के मन की सहज गति अधोगति की ओर है और इससे उसके हाथों अनेक प्रमाद हो सकते हैं। यदि इन दोषों का परिमार्जन न हो तो अशुभ कर्मों का संचित निर्माण होकर मनुष्य को अनेक दु:ख भोगने पड़ते हैं और उर्वरित संचित प्रारब्ध बनकर भावी दु:खों की सृष्टि करता है। पापों के नाश के लिए शास्त्र में जो उपाय बताए गए हैं, उनको करना इस समय इतना कठिन हो गया है कि प्राय: असंभव ही कह सकते हैं। इसलिए ऐसे जो कोई हों, वे यदि संकल्पपूर्वक यह जप करें तो विमलात्मा बन सकते हैं।

 

मनुष्य से नित्य ही अनेक प्रकार के दोष हो जाते हैं। यह मानव स्वभाव है। इसलिए नित्य ही उन दोषों को नष्ट करना मनुष्य का कर्तव्य ही है। नित्य जप के साथ यह जप भी हुआ करे। अल्पदोष के लिए अल्प और अधिक दोष के लिए अधिक जप करना चाहिए। नित्य का नियम करके चलाना कठिन मालूम हो तो सप्ताह में एक ही दिन सही, यह काम करना चाहिए। प्रात:काल में पहले गो‍मूत्र प्राशन करें, तब गंगाजी में या जो तीर्थ प्राप्त हो उसमें स्नान करें। यह भी न हो तो 'गंगा गंगेति' मंत्र कहते हुए स्नान करें और भस्म-चंदनादि लगाकर देव, गुरु, द्विज आदि के दर्शन करें। अश्वत्थ, गौ आदि की परिक्रमा करें। केवल तुलसी दल-तीर्थ पान करके उपवास करें और मन को एकाग्र करके संकल्पपूर्वक अपने मंत्र का जप करें। इससे पवित्रता बढ़ेगी और मन आनंद से झूमने लगेगा। जब ऐसा हो, तब समझें कि अब सब पाप भस्म हो गए। दोष के हिसाब से जप संख्या निश्चित करें और वह संख्‍या पूरी करें।

 

6. अचल जप


यह जप करने के लिए आसन, गोमुखी आदि साहित्य और व्यावहारिक और मानसिक स्वास्थ्य होना चाहिए। इस जप से अपने अंदर जो गुप्त शक्तियां हैं, वे जागकर विकसित होती हैं और परोपकार में उनका उपयोग करते बनता है। इसमें इच्छाशक्ति के साथ-साथ पुण्य संग्रह बढ़ता जाता है। इस जप के लिए व्याघ्राम्बर अथवा मृगाजिन, माला और गोमुखी होनी चाहिए। स्नानादि करके आसन पर बैठे, देश-काल का स्मरण करके दिग्बंध करें और तब जप आरंभ करें।

 

अमुक मंत्र का अमुक संख्या जप होना चाहिए और नित्य इतना होना चाहिए, इस प्रकार का नियम इस विषय में रहता है, सो समझ लेना चाहिए और नित्य उतना जप एकाग्रतापूर्वक करना चाहिए। जप निश्चित संख्‍या से कभी कम न हो। जप करते हुए बीच में ही आसन पर से उठना या किसी से बात करना ठीक नहीं, उतने समय तक चित्त की और शरीर की स्थिरता और मौन साधे रहना चाहिए। इस प्रकार नित्य करके जप की पूर्ण संख्या पूरी करनी चाहिए। यह चर्या बीच में कहीं खंडित न हो इसके लिए स्वास्थ्य होना चाहिए इसलिए आहार-विहार संयमित हों। एक स्‍थान पर बैठ निश्चित समय में निश्चित जप संख्‍या एकाग्र होकर पूरी करके देवता को वश करना ही इस जप का मुख्य लक्षण है। इस काम में विघ्न तो होते ही हैं, पर धैर्य से उन्हें पार कर जाना चाहिए। इस जप से अपार आध्यात्मिक शक्ति संचित होती है। भस्म, जल अभिमंत्रित कर देने से वह उपकारी होता है, यह बात अनुभवसिद्ध है।

 

7. चल जप


यह जप नाम स्मरण जैसा है। प्रसिद्ध वामन प‍डित के कथनानुसार 'आते-जाते, उठते-बैठते, करते-धरते, देते-लेते, मुख से अन्न खाते, सोते-जागते, रतिसुख भोगते, सदा सर्वदा लोकलाज छोड़कर भगच्चिंतन करने' की जो विधि है, वही इस जप की है। अंतर यही कि भगवन्नाम के स्थान में अपने मंत्र का जप करना है। यह जप कोई भी कर सकता है। इसमें कोई बंधन, नियम या प्रतिबंध नहीं है। अन्य जप करने वाले भी इसे कर सकते हैं। इससे वाचा शुद्ध होती है और वाक्-शक्ति प्राप्त होती है। पर इस जप को करने वाला कभी मिथ्या भाषण न करे; निंदा, कठोर भाषण, जली-कटी सुनाना, अधिक बोलना, इन दोषों से बराबर बचता रहे। इससे बड़ी शक्ति संचित होती है। इस जप से समय सार्थक होता है, मन प्रसन्न रहता है, संकट, कष्ट, दु:ख, आघात, उत्पात, अपघात आदि का मन पर कोई असर नहीं होता।

 

जप करने वाला सदा सुरक्षित रहता है। सुखपूर्वक संसार-यात्रा पूरी करके अनायास परमार्थ को प्राप्त होता है। उसकी उत्तम गति होती है, उसके सब कर्म यज्ञमय होते हैं और इस कारण वह कर्मबंध से छूट जाता है। मन निर्विषय हो जाता है। ईश-सान्निध्य बढ़ता है और साधक निर्भय होता है। उसका योग-क्षेम भगवान वहन करते हैं। वह मन से ईश्वर के समीप और तन से संसार में रहता है। इस जप के लिए यों तो माला की कोई आवश्यकता नहीं है, पर कुछ लोग छोटी-सी 'सुमरिनी' रखते हैं इसलिए कि कहीं विस्मरण होने का-सा मौका आ जाए तो वहां यह सु‍मरिनी विस्मरण न होने देगी। सुमरिनी छोटी होनी चाहिए, वस्त्र में छिपी रहनी चाहिए, किसी को दिखाई न दे। सुमिरन करते हुए होंठ भी न हिेलें। सब काम चुपचाप होना चाहिए, किसी को कुछ मालूम न हो।


8. वा‍चिक जप

 

 जिस जप का इतने जोर से उच्चारण होता है कि दूसरे भी सुन सकें, उसे वाचिक जप कहते हैं। बहुतों के विचार में यह जप निम्न कोटि का है और इससे कुछ लाभ नहीं है। परंतु विचार और अनुभव से यह कहा जा सकता है कि यह जप भी अच्‍छा है। विधि यज्ञ की अपेक्षा वाचिक जप दस गुना श्रेष्ठ है, यह स्वयं मनु महाराज ने ही कहा है। जपयोगी के लिए पहले यह जप सुगम होता है। आगे के जप क्रमसाध्य और अभ्याससाध्य हैं। इस जप से कुछ यौगिक लाभ होते हैं।
 
सूक्ष्म शरीर में जो षट्चक्र हैं उनमें कुछ वर्णबीज होते हैं। महत्वपूर्ण मंत्रों में उनका विनियोग रहता है। इस विषय को विद्वान और अनुभवी जपयोगियों से जानकर भावनापूर्वक जप करने से वर्णबीज शक्तियां जाग उठती हैं। इस जप से वाक्-सिद्धि तो होती ही है, उसके शब्दों का बड़ा महत्व होता है। वे शब्द कभी व्यर्थ नहीं होते। अन्य लोग उसकी आज्ञा का पालन करते हैं। जितना जप हुआ रहता है, उसी हिसाब से यह अनुभव भी प्राप्त होता है। एक वाक्-शक्ति भी सिद्ध हो जाए तो उससे संसार के बड़े-बड़े काम हो सकते हैं। कारण, संसार के बहुत से काम वाणी से ही होते हैं। वाक्-शक्ति संसार की समूची शक्ति का तीसरा हिस्सा है। यह जप प्रपंच और परमार्थ दोनों के लिए उपयोगी है।

 

9. उपांशु उपाय


वाचिक जप के बाद का यह जप है। इस जप में होंठ हिलते हैं और मुंह में ही उच्चारण होता है, स्वयं ही सुन सकते हैं, बाहर और किसी को सुनाई नहीं देता। विधियज्ञ की अपेक्षा मनु महाराज कहते हैं कि यह जप सौ गुना श्रेष्ठ है। इससे मन को मूर्च्छना होने लगती है, एकाग्रता आरंभ होती है, वृत्तियां अंतर्मुख होने लगती हैं और वाचिक जप के जो-जो लाभ होते हैं, वे सब इसमें होते हैं। इससे अपने अंग-प्रत्यंग में उष्णता बढ़ती हुई प्रतीत होती है। यही तप का तेज है। इस जप में दृष्टि अर्धोन्मीलित रहती है। एक नशा-सा आता है और मनोवृत्तियां कुंठित-सी होती हैं, यही मूर्च्छना है। इसके द्वारा साधक क्रमश: स्थूल से सूक्ष्म में प्रवेश करता है। वाणी के सहज गुण प्रकट होते हैं। मंत्र का प्रत्येक उच्चार मस्तक पर कुछ असर करता-सा मालूम होता है- भालप्रदेश और ललाट में वेदनाएं अनुभूत होती हैं। अभ्यास से पीछे स्थिरता आ जाती है।

 

10. भ्रमर जप


भ्रमर के गुंजार की तरह गुनगुनाते हुए जो जप होता है, वह भ्रमर जप कहाता है। किसी को यह जप करते, देखते-सुनने से इसका अभ्यास जल्दी हो जाता है। इसमें होंठ नहीं हिलते, जीभ हिलाने का भी कोई विशेष कारण नहीं। आंखें झपी रखनी पड़ती हैं। भ्रूमध्य की ओर यह गुंजार होता हुआ अनुभूत होता है। यह जप बड़े ही महत्व का है। इसमें प्राण सूक्ष्म होता जाता है और स्वाभाविक कुम्भक होने लगता है। प्राणगति धीर-धीमी होती है, पूरक जल्दी होता है और रेचक धीरे-धीरे होने लगता है। पूरक करने पर गुंजार व आरंभ होता है और अभ्यास से एक ही पूरक में अनेक बार मंत्रावृत्ति हो जाती है।
 
इसमें मंत्रोच्चार नहीं करना पड़ता। वंशी के बजने के समान प्राणवायु की सहायता से ध्यानपूर्वक मंत्रावृत्ति करनी होती है। इस जप को करते हुए प्राणवायु से ह्रस्व-दीर्घ कंपन हुआ करते हैं और आधार चक्र से लेकर आज्ञा चक्र तक उनका कार्य अल्पाधिक रूप से क्रमश: होने लगता है। ये सब चक्र इससे जाग उठते हैं। शरीर पुलकित होता है। नाभि, हृदय, कंठ, तालु और भ्रूमध्य में उत्तरोत्तर अधिकाधिक कार्य होने लगता है। सबसे अधिक परिणाम भ्रूमध्यभाग में होता है। वहां के चक्र के भेदन में इससे बड़ी सहायता मिलती है। मस्तिष्क में भारीपन नहीं रहता। उसकी सब शक्तियां जाग उठती हैं। स्मरण शक्ति बढ़ती है। प्राक्तन स्मृति जागती है। मस्तक, भालप्रदेश और ललाट में उष्णता बहुत बढ़ती है। तेजस परमाणु अधिक तेजस्वी होते हैं और साधक को आंतरिक प्रकाश मिलता है। बुद्धि का बल बढ़ता है। मनोवृत्तियां मूर्च्छित हो जाती हैं। नागस्वर बजाने से सांप की जो हालत होती है, वही इस गुंजार से मनोवृत्तियों की होती है। उस नाद में मन स्वभाव से ही लीन हो जाता है और तब नादानुसंधान का जो बड़ा काम है, वह सुलभ हो जाता है।

 

11. मानस जप


यह तो जप का प्राण ही है। इससे साधक का मन आनंदमय हो जाता है। इसमें मंत्र का उच्चार नहीं करना होता है। मन से ही मंत्रावृत्ति करनी होती है। नेत्र बंद रहते हैं। मंत्रार्थ का चिंतन ही इसमें मुख्‍य है। श्री मनु महाराज ने कहा है कि विधियज्ञ की अपेक्षा यह जप हजार गुना श्रेष्ठ है। भिन्न मंत्रों के भिन्न-भिन्न अक्षरार्थ और कूटार्थ होते हैं। उन्हें जानने से इष्टदेव के स्वरूप का बोध होता है। पहले इष्टदेव का सगुण ध्यान करके यह जप किया जाता है, पीछे निर्गुण स्वरूप का ज्ञान होता है। और तब उसका ध्यान करके जप किया जाता है। नादानुसंधान के साथ-साथ यह जप करने से बहुत अधिक उपायकारी होता है। केवल नादानुसंधान या केवल जप की अपेक्षा दोनों का योग अधिक अच्‍छा है। श्रीमदाद्य शंकराचार्य नादानुसंधान की महिमा कथन करते हुए कहते हैं- 'एकाग्र मन से स्वरूप चिंतन करते हुए दाहिने कान से अनाहत ध्वनि सुनाई देती है। भेरी, मृदंग, शंख आदि आहत नाद में ही जब मन रमता है तब अनाहत मधुर नाद की महिमा क्या बखानी जाए? चित्त जैसे-जैसे विषयों से उपराम होगा, वैसे-वैसे यह अनाहत नाद अधिकाधिक सुनाई देगा। नादाभ्यंतर ज्योति में जहां मन लीन हुआ, तहां फिर इस संसार में नहीं आना होता है अर्थात मोक्ष होता है।'

 

सतत नादानुसंधान करने से मनोलय बन पड़ता है। आसन पर बैठकर, श्वासोच्छवास की क्रिया सावकाश करते हुए, अपने कान बंद करके अंतरदृष्टि करने से नाद सुनाई देता है। अभ्यास से बड़े नाद सुनाई देते हैं और उनमें मन रमता है। मंत्रार्थ का चिंतन, नाद का श्रवण और प्रकाश का अनुसंधान- ये तीन बातें साधनी पड़ती हैं। इस साधन के सिद्ध होने पर मन स्वरूप में लीन होता है, तब प्राण, नाद और प्रकाश भी लीन हो जाते हैं और अपार आनंद प्राप्त होता है।

 
12. अखंड जप

यह जप खासकर त्यागी पुरुषों के लिए है। शरीर यात्रा के लिए आवश्यक आहारादि का समय छोड़कर बाकी समय जपमय करना पड़ता है। कितना भी हो तो क्या, सतत जप से मन उचट ही जाता है, इसलिए इसमें यह विधि है कि जप से जब चित्त उचटे, तब थोड़ा समय ध्यान में लगाएं, फिर तत्वचिंतन करें और फिर जप करें। कहा है-
 
जपाच्छ्रान्त: पुनर्ध्यायेद् ध्यानाच्छ्रान्त: पुनर्जपेत्।
जपध्यानपरिश्रान्त: आत्मानं च विचारयेत्।।

 
'जप करते-करते जब थक जाएं, तब ध्यान करें। ध्यान करते-करते थकें, तब फिर जप करें और जप तथा ध्यान से थकें, तब आत्मतत्व का विचार करें।'

 

13. अजपा जप


यह सहज जप है और सावधान रहने वाले से ही बनता है। किसी भी तरह से यह जप किया जा सकता है। अनुभवी महात्माओं में यह जप देखने में आता है। इसके लिए माला का कुछ काम नहीं। श्वाछोच्छवास की क्रिया बराबर हो ही रही है, उसी के साथ मंत्रावृत्ति की जा सकती है। अभ्यास से मंत्रार्थ भावना दृढ़ हुई रहती है, सो उसका स्मरण होता है। इसी रीति से सहस्रों संख्‍या में जप होता रहता है। इस विषय में एक महात्मा कहते हैं-
 
राम हमारा जप करे, हम बैठे आराम।

 
14. प्रदक्षिणा जप

इस जप में हाथ में रुद्राक्ष या तुलसी की माला लेकर वट, औदुम्बर या पीपल-वृक्ष की अथवा ज्योतिर्लिंगादि के मंदिर की या किसी सिद्धपुरुष की, मन में ब्रह्म भावना करके, मंत्र कहते हुए परिक्रमा करनी होती है। इससे भी सिद्धि प्राप्त होती है- मनोरथ पूर्ण होता है।

 


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Glory of Mahamrityunjaya Mantra


महामृत्युंजय मंत्र की महिमा 

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

देवाधिदेव महादेव ही एक मात्र ऐसे भगवान हैं, जिनकी भक्ति हर कोई करता है, चाहे वह इंसान हो, राक्षस हो, भूत-प्रेत हो अथवा देवता हो, यहां तक कि पशु-पक्षी, जलचर, नभचर, पाताललोक वासी हो अथवा बैकुण्ठवासी हो, शिव की भक्ति हर जगह हुई और जब तक दुनिया कायम है, शिव की महिमा गाई जाती रहेगी। 


शिव पुराण कथा के अनुसार शिव ही ऐसे भगवान हैं, जो शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्तों को मनचाहा वर दे देते हैं, वे सिर्फ अपने भक्तों का कल्याण करना चाहते हैं, वे यह नहीं देखते कि उनकी भक्ति करने वाला इंसान है, राक्षस है, भूत-प्रेत है या फिर किसी और योनि का जीव है, शिव को प्रसन्न करना सबसे आसान है। 


शिवलिंग की महिमा अपरम्पार है, शिवलिंग में मात्र जल चढ़ाकर या बेलपत्र अर्पित करके भी शिव को प्रसन्न किया जा सकता है, इसके लिए किसी विशेष पूजन विधि की आवश्यकता नहीं है, एक कथा के अनुसार वृत्तासुर के आतंक से देवता भयभीत थे, वृत्तासुर को श्राप था कि वह शिव पुत्र के हाथों ही मारा जायेगा। 


इसलिए पार्वती के साथ शिवजी का विवाह कराने के लिए सभी देवता चिंतित थे, क्योंकि भगवान शिव समाधिस्थ थे और जब तक समाधि से उठ नहीं जाते, विवाह कैसे होता? देवताओं ने विचार करके रति व कामदेव से शिव की समाधि भंग करने का निवेदन किया, कामदेव ने शिवजी को जगाया तो क्रोध में शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया, रति विलाप करने लगी तो शिव ने वरदान दिया कि द्वापर में कामदेव भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में जन्म लेंगे। 


इस बात में तो सभी यकीन करते होंगे, कि वक़्त से पहले और किस्मत से ज्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता, पर यह सभी जानते है कि वक़्त और किस्मत पर भी विजयी हो सकते हैं, अगर आप भगवान् भोलेनाथ की असीम शक्ति में विश्वास रखते है, इसके उदाहरण स्वरुप मैं एक कथा बताना चाहूंगा।


भगवान शिव यानि देवाधिदेव महादेव को तो सब जानते हैं जो परमपिता परमेश्वर, जगत के स्वामी और सब देवो के देव है, कथा से पहले आपको यह बता दूँ की यह वह समय हैं, जब महादेव की अर्धांगिनी देवी पार्वती, बाल्यवस्था में अपनी माता मैना देवी के साथ मार्कंडय ऋषि के आश्रम में रहती थी, और पार्वती देवी एक दिन असुरो के कारण संकट में पड़ गयी और महादेव ने उनके प्राणों की रक्षा की।


मैना ने जब अपनी पुत्रि की जान पर आई आपदा के बारे में सुना तो वह अत्यंत दुखी और भयभीत हो गयी, पर ऋषि मार्कंडय ने उन्हें जब बताया कि कैसे महादेव ने देवी पार्वती की रक्षा की, पर वह तब भी संतोष न कर सकी, मैना देवी विष्णु भगवान की उपासक थी, जिस वजह से शिव की महिमा में ज़रा भी विश्वास नहीं रखती थी, शिवजी ठहरे वैरागी और श्मशान में रहने वाले तो भला वह कैसे उनकी पूजा करे। 


तत्पश्चात ऋषि मार्कंडय ने मैना को शिव भगवान की महिमा के बारे में बताने का विचार किया, और उनको यह कथा विस्तार से बताई- जब मार्कंडय ऋषि केवल ग्यारह वर्ष के थे, तब उनके पिता ऋषि मृकण्डु को गुरुकूल आश्रम के गुरु से यह ज्ञात हुआ की मार्कंडय की सारी शिक्षा-दीक्षा पूर्ण हो चुकी है और अब वह उन्हें अपने साथ ले जा सकते है।


क्योंकि उन्होंने सारा ज्ञान इतने कम समय में ही अर्जित कर लिया और अब उनको और ज्ञान देने के लिए कुछ शेष नहीं था, यह जानने के बाद भी की उनका पुत्र मार्कंडय इतना बुद्धिमान और ज्ञानवान है, उनके माता पिता खुश नहीं हुयें, मार्कंडय ने जब पूछा की उनके दुःख का कारण क्या है? तब उनके पिता ने उनके जन्म की कहानी बताई कि पुत्र की प्राप्ति हेतु उन्होंने और उनकी माता ने कई वर्षो तक कठिन और घोर तप किया है।


तब भगवान् महादेव प्रसन्न होकर प्रकट हुयें, और उनको इस बात से अवगत कराया की उनके भाग में संतान सुख नहीं है, परन्तु उनके तप से प्रसन्न होकर उनको पुत्र का वरदान दिया, और उनसे पूछा की वह कैसा पुत्र चाहते है, जो बुद्धिवान ना हो पर उसकी आयु बहुत ज्यादा हो या ऐसा पुत्र जो बहुत बुद्धिमान हो परन्तु जिसकी आयु बहुत कम हो।


मृकण्डु और उनकी पत्नी ने कम आयु वाला पर बुद्धिमान पुत्र का वरदान माँगा, महादेवजी ने उनको बताया की यह पुत्र केवल बारह वर्ष तक ही जीवित रहेगा, वह फिर विचार कर ले, पर उन्होंने वही माँगा और महादेव उनको वरदान देकर भोलेनाथ अंतर्ध्यान हो गये, ऋषि मृकंदु ने यह सब अपने पुत्र को बताया, जिसको सुनने के बाद वह बहुत दुःखी हुआ, यह सोचकर की वह अपने माता -पिता की सेवा नहीं कर सकेगा।


परन्तु बालक मार्कंडय ने उसी समय यह निर्णय किया की वह अपनी मृत्यू पर विजय प्राप्त करेंगे और भगवान शिव की पूजा से यह हासिल करेंगे, बालक मार्कंडय ग्यारह वर्ष की आयु में वन को चले गयें, लगभग एक वर्ष के कठिन तप के दौरान उन्होंने एक नए मंत्र की रचना की जो मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सके, वह है:- 


"ॐ त्रियम्बकं यजामहे, सुगन्धिं पुष्टिवर्धनं, 

उर्वारुकमिव बन्धनात मृत्योर्मोक्षिय मामृतात्


जब वह 12 वर्ष के हुए तब यमराज उनके सामने, प्राण हरण के लिये प्रकट हो गये, बालक मार्कंडय ने यमराज को बहुत समझया और याचना की, कि वह उनके प्राण बक्श दे, परन्तु यमराज ने एक ना सुनी और और वह यमपाश के साथ उनके पीछे भागे बालक मार्कंडय भागते-भागते वन में एक शिवलिंग तक पहुचे जिसे देख कर वह उनसे लिपट गये, और भगवान् शिव का मंत्र बोलने लगे जिसकी रचना उन्होंने स्वयं की थी। 


यमराज ने बालक मार्कंडय की तरफ फिर से अपना यमपाश फेका परन्तु शिवजी तभी प्रकट हुए और उनका यमपाश अपने त्रिशूल से काट दिया, बालक मार्कंडय शिवजी के चरणों में याचना करने लगे की वह उनको प्राणों का वरदान दे, परन्तु महादेव ने उनको कहा की उन्होंने ही यह वरदान उनके माता-पिता को दिया था, इस पर बालक मार्कंडय कहते है कि यह वरदान तो उनके माता पिता के लिये था ना कि उनके लिये? 


यह सुनकर महादेव बालक मार्कंडय से अत्यंत प्रसन्न होते है और उनको जीवन का वरदान देते है, भगवान् भोलेनाथ ने यमराज को आदेश देते है की वह इस बालक के प्राण ना ले, कथा से क्या इस बात पर पुन: विचार करने का मन होता है की भक्ति में बहुत शक्ति है, ऐसा क्या नहीं है जो इस संसार में ईश्वर की भक्ति करने से प्राप्त ना किया जा सके, भगवान् भोलेनाथ की भक्ति और शक्ति की महिमा का बहुत बड़ा महात्म्य है।


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हिंदू धर्म में पर्यावरण संरक्षण का महत्व


Way of Life Karma: Importance of  environmental protection in Hinduism


 

 हिंदू धर्म में पर्यावरण संरक्षण का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों, जैसे वेद, उपनिषद, महाभारत, रामायण, मनुस्मृति और पुराणों में प्रकृति के संरक्षण और पर्यावरण संतुलन के प्रति गहरी आस्था और आदर का भाव दिखाई देता है। इन ग्रंथों में प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व को धर्म का हिस्सा माना गया है, जहाँ मनुष्य को प्रकृति के प्रति ज़िम्मेदारी और आदर भाव रखने की प्रेरणा दी जाती है।

 

 1. वेदों में पर्यावरण संरक्षण

   - ऋग्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, और यजुर्वेद में विभिन्न प्राकृतिक तत्वों जैसे कि पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, और आकाश को देवता स्वरूप मानकर उनकी पूजा की गई है। यह प्रकृति के तत्वों का सम्मान करने का प्रतीक है।  


   - ऋग्वेद में पर्यावरण के संरक्षण की प्रार्थना और प्रकृति के संरक्षण के महत्व को समझाने वाली ऋचाएं हैं, जैसे पृथ्वी सूक्त, जिसमें धरती को माता मानकर उसके संरक्षण की बात की गई है: 

"माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:" (पृथ्वी हमारी माँ है, और हम उसके पुत्र हैं)



 2. उपनिषदों में एकात्मता का सिद्धांत

   - उपनिषदों में यह मान्यता है कि ब्रह्मांड में सभी जीव एक ही चेतना से जुड़े हुए हैं, और सभी के बीच एक गहरा संबंध है। इस दृष्टिकोण से, मनुष्य का हर क्रियाकलाप पूरे प्रकृति चक्र को प्रभावित करता है।


   - "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" का सिद्धांत कहता है कि समस्त विश्व में ब्रह्म का वास है, यानी हर वस्तु में ईश्वर का निवास है, और इसलिए इसका आदर आवश्यक है।


 3. महाभारत और रामायण में प्राकृतिक संसाधनों का आदर

   - महाभारत में भी वन, नदियाँ, पहाड़ों को संरक्षण देने की बातें की गई हैं। श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच हुए संवाद में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को प्रकृति के हर अंग का आदर करने और उसकी रक्षा करने का संदेश दिया।
   - रामायण में भगवान राम का वनवास और जंगल में उनके द्वारा पेड़ों, जानवरों, नदियों आदि के साथ संवाद यह दर्शाता है कि वन और प्रकृति के प्रति उनकी गहरी आस्था थी।


 4. मनुस्मृति में प्रकृति-संरक्षण के सिद्धांत

   - मनुस्मृति में विभिन्न वृक्षों, पौधों और जानवरों को संरक्षित करने के नियम बताए गए हैं। यह ग्रंथ बताता है कि मनुष्य को अपने कार्यों से पर्यावरण को हानि नहीं पहुँचानी चाहिए।

 

 5. पुराणों में प्रकृति की देवी स्वरूप में पूजा

   - पुराणों में प्रकृति को देवी के रूप में मान्यता दी गई है, जैसे देवी गंगा, देवी तुलसी, देवी वृक्ष (पीपल, वटवृक्ष) इत्यादि। यह दर्शाता है कि प्रकृति को देवतुल्य समझा गया और इसका आदर किया गया। 


   

 6. यज्ञ और पर्यावरण संतुलन

   - यज्ञ की प्रक्रिया को भी पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। प्राचीन काल में यज्ञ को जलवायु शुद्धि, रोगों का नाश, और कृषि उत्पादन में वृद्धि के साधन के रूप में देखा गया था।


हिंदू धर्म में यह स्पष्ट रूप से प्रतिपादित है कि प्रकृति का संरक्षण ही मानवता का संरक्षण है। यदि मनुष्य प्रकृति का सम्मान करता है और उसके संतुलन को बनाए रखता है, तो उसे दीर्घकालिक सुख-शांति प्राप्त होगी।

 

 

कर्म पर महत्वपूर्ण बाते



 कर्म पर प्रभावशाली  कुछ महत्वपूर्ण बातें हो सकती हैं:

1. कर्म का मतलब: सबसे पहले, हम कर्म के सामान्य अर्थ को समझ सकते हैं, जो 'कार्य' या 'क्रिया' का प्रतीक है। हिंदू धर्म में इसे अच्छे और बुरे कर्मों के सिद्धांत से जोड़ा जाता है, जिनका परिणाम व्यक्ति की जीवन यात्रा में दिखाई देता है।


2. कर्म का सिद्धांत: इसके अंतर्गत यह विचार आता है कि जो हम आज करते हैं, वह हमारे भविष्य को आकार देता है। अच्छे कर्मों से सुख और बुरे कर्मों से दुःख आता है।


3. कर्म और पुनर्जन्म: हिंदू धर्म में कर्म को पुनर्जन्म से जोड़ा जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार, हमारा वर्तमान जीवन हमारे पिछले कर्मों का परिणाम होता है, और हम जो कर्म इस जीवन में करते हैं, उनका असर अगले जन्म पर भी पड़ेगा।


4. कर्म का वास्तविक महत्व: यह ब्लॉग पोस्ट यह भी बता सकता है कि कर्म केवल धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि हमारी दैनिक जिंदगी में भी प्रभावी है। जब हम दूसरों के साथ अच्छे कर्म करते हैं, तो यह न केवल हमें संतोष देता है, बल्कि समाज में भी सकारात्मक बदलाव लाता है।


5. आध्यात्मिक दृष्टिकोण: यह भी चर्चा की जा सकती है कि किस तरह लोग अपने जीवन में आत्मविकास के लिए कर्म के सिद्धांत को अपनाते हैं और अपने विचारों, शब्दों और कार्यों से जीवन को बेहतर बनाते हैं।




जीवन में कर्म का महत्व



Way of Life Karma: जीवन में कर्म का महत्व

हमारे जीवन में कर्म एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कर्म का अर्थ केवल हमारे द्वारा किए गए कार्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे विचारों, शब्दों और क्रियाओं के माध्यम से हमारे भाग्य को भी प्रभावित करता है।

कर्म और धर्म का संबंध

हमारे कर्म हमारे जीवन के रास्ते को दिशा देते हैं। जब हम अच्छे कर्म करते हैं, तो यह न केवल हमारे जीवन में सुख और शांति लाता है, बल्कि यह हमारे आसपास के लोगों पर भी सकारात्मक प्रभाव डालता है। धार्मिक ग्रंथों में कर्म को एक सशक्त शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो हमारे पूर्वजन्मों के कर्मों के परिणामस्वरूप हमें वर्तमान जीवन में मिलते हैं।

कर्मयोग का महत्व

भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कर्मयोग की महिमा का वर्णन किया है, जिसमें वह कहते हैं, "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन"। इसका मतलब है कि हमें केवल अपने कर्मों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और उनके परिणामों को भगवान के ऊपर छोड़ देना चाहिए। यही असली शांति और संतुष्टि का रास्ता है।

कर्म का प्रभाव और जीवन का उद्देश्य

हमारे जीवन में सफलता और खुशहाली का रास्ता भी हमारे कर्मों से जुड़ा हुआ है। जब हम जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हैं और अच्छे कर्म करते हैं, तो हम न केवल अपने जीवन को सुखमय बनाते हैं, बल्कि दूसरों के जीवन को भी प्रभावित करते हैं। इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि हम हमेशा अपने कर्मों में ईमानदारी और नैतिकता का पालन करें।

Way of Life Karma में आपका स्वागत है

हमारा उद्देश्य है कि हम अपने पाठकों को सही मार्गदर्शन प्रदान करें ताकि वे अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकें। हम विश्वास करते हैं कि हर व्यक्ति के भीतर आत्म-निर्भरता, शांति, और संतोष का मार्ग छुपा होता है, जिसे कर्म के सही मार्गदर्शन से प्राप्त किया जा सकता है।

आप भी अपने जीवन में सही कर्मों के द्वारा शांति और संतोष प्राप्त कर सकते हैं। हम आपकी मदद करने के लिए यहां हैं, ताकि आप जीवन को समझ सकें और इसे पूरी तरह से जी सकें।



धर्म बड़ा या ज्ञान

धर्म बड़ा या ज्ञान धर्म और ज्ञान दोनों ही जीवन के लिए अनिवार्य हैं, लेकिन धर्म (नैतिकता/कर्तव्य) को ज्ञान से बड़ा माना जाता है। क...