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Maghi Purnima Editorial

WOLK :- माघी पूर्णिमा सनातन परंपरा, आध्यात्मिकता और पुण्य का संगम



हिंदू धर्म में माघी पूर्णिमा का विशेष महत्व है। यह दिन धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र माना जाता है। माघ माह की पूर्णिमा को होने वाला यह पर्व मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है और पवित्र स्नान, दान, पूजा-अर्चना और तपस्या के लिए उत्तम माना जाता है। माघ मास को स्वयं भगवान विष्णु का प्रिय माह कहा गया है और इस मास में गंगा, यमुना तथा अन्य पवित्र नदियों में स्नान करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। विशेष रूप से प्रयागराज में गंगा-यमुना के संगम पर आयोजित माघ मेले और कल्पवासियों के लिए यह तिथि विशेष रूप से महत्वपूर्ण होती है।


माघी पूर्णिमा का महत्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी है। यह पर्व लोगों को आत्मशुद्धि, परोपकार, सहिष्णुता और दान-पुण्य का संदेश देता है। इस दिन भारत में अनेक स्थानों पर भव्य मेलों और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है।

Maghi Purnima

WOLK: Maghi Purnima


माघी पूर्णिमा हिंदू पंचांग के अनुसार माघ माह की पूर्णिमा को कहा जाता है। यह एक महत्वपूर्ण तिथि होती है और विशेष रूप से स्नान, दान और तपस्या के लिए उत्तम मानी जाती है। इस दिन गंगा, यमुना, और अन्य पवित्र नदियों में स्नान करने का विशेष महत्व होता है, जिससे पुण्य की प्राप्ति होती है।

Hindu Calendar Months

हिंदू कैलेंडर में 12 महीनों के नाम होते हैं, जो चंद्र महीनों पर आधारित होते हैं। ये नाम निम्नलिखित हैं:-





1. चैत्र (Chaitra): मार्च-अप्रैल


2. वैशाख (Vaishakha): अप्रैल-मई


3. ज्येष्ठ (Jyeshtha): मई-जून


4. आषाढ़ (Ashadha): जून-जुलाई


5. श्रावण (Shravana): जुलाई-अगस्त


6. भाद्रपद (Bhadrapada): अगस्त-सितंबर


7. आश्विन (Ashwin): सितंबर-अक्टूबर


8. कार्तिक (Kartika): अक्टूबर-नवंबर


9. मार्गशीर्ष (Margashirsha): नवंबर-दिसंबर


10. पौष (Pausha): दिसंबर-जनवरी


11. माघ (Magha): जनवरी-फरवरी


12. फाल्गुन (Phalguna): फरवरी-मार्च


विशेषताएँ:


ये नाम चंद्रमा के चरणों और ऋतुओं के आधार पर तय किए जाते हैं।


हर महीने में दो पक्ष (अमावस्या से पूर्णिमा तक का शुक्ल पक्ष और पूर्णिमा से अमावस्या तक का कृष्ण पक्ष) होते हैं।


इन महीनों का उपयोग धार्मिक त्योहारों और संस्कारों की तिथियों के निर्धारण में किया जाता है।



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Makar Sankranti

 

 

मकर सक्रांति विशेष

 

Makar Sankranti

मकर संक्रांति की 16 बड़ी बातें पर्व मनाने से पहले जरूर जानें

 

 सूर्य संक्रांति में मकर सक्रांति का महत्व ही अधिक माना गया है। माघ माह में कृष्ण पंचमी को मकर सक्रांति देश के लगभग सभी राज्यों में अलग-अलग सांस्कृतिक रूपों में मनाई जाती है। इस बार 14 जनवरी 2025 को मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाएगा । आइए जानते हैं कि मकर संक्रांति के बारे में रोचक 16 तथ्‍य क्या है ।

 

वर्ष में होती है 12 संक्रांतियां :- पृथ्वी साढ़े 23 डिग्री अक्ष पर झुकी हुई सूर्य की परिक्रमा करती है तब वर्ष में 4 स्थितियां ऐसी होती हैं, जब सूर्य की सीधी किरणें 21 मार्च और 23 सितंबर को विषुवत रेखा, 21 जून को कर्क रेखा और 22 दिसंबर को मकर रेखा पर पड़ती है। वास्तव में चन्द्रमा के पथ को 27 नक्षत्रों में बांटा गया है जबकि सूर्य के पथ को 12 राशियों में बांटा गया है। भारतीय ज्योतिष में इन 4 स्थितियों को 12 संक्रांतियों में बांटा गया है जिसमें से 4 संक्रांतियां महत्वपूर्ण होती हैं- मेष, तुला, कर्क और मकर संक्रांति

 

1. मकर संक्रांति का अर्थ :- मकर संक्रांति में 'मकर' शब्द मकर राशि को इंगित करता है जबकि 'संक्रांति' का अर्थ संक्रमण अर्थात प्रवेश करना है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है। एक राशि को छोड़कर दूसरे में प्रवेश करने की इस विस्थापन क्रिया को संक्रांति कहते हैं। चूंकि सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है इसलिए इस समय को 'मकर संक्रांति' कहा जाता है ।

 

2. इस दिन से सूर्य होता है उत्तरायन :- चन्द्र के आधार पर माह के 2 भाग हैं- कृष्ण और शुक्ल पक्ष। इसी तरह सूर्य के आधार पर वर्ष के 2 भाग हैं- उत्तरायन और दक्षिणायन। इस दिन से सूर्य उत्तरायन हो जाता है। उत्तरायन अर्थात इस समय से धरती का उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य की ओर मुड़ जाता है, तो उत्तर ही से सूर्य निकलने लगता है। इसे सोम्यायन भी कहते हैं। 6 माह सूर्य उत्तरायन रहता है और 6 माह दक्षिणायन। मकर संक्रांति से लेकर कर्क संक्रांति के बीच के 6 मास के समयांतराल को उत्तरायन कहते हैं।

 

3. उत्तरायण का महत्व :- भगवान श्रीकृष्ण ने भी उत्तरायन का महत्व बताते हुए गीता में कहा है कि उत्तरायन के 6 मास के शुभ काल में जब सूर्यदेव उत्तरायन होते हैं और पृथ्वी प्रकाशमय रहती है, तो इस प्रकाश में शरीर का परित्याग करने से व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता, ऐसे लोग ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यही कारण था कि भीष्म पितामह ने शरीर तब तक नहीं त्यागा था, जब तक कि सूर्य उत्तरायन नहीं हो गया।

 

4. देवताओं का दिन प्रारंभ :- मान्यता के अनुसार मकर संक्रांति से देवताओं का दिन आरंभ होता है, जो आषाढ़ मास तक रहता है। कर्क संक्रांति से देवताओं की रात प्रारंभ होती है। अर्थात देवताओं के एक दिन और रात को मिलाकर मनुष्‍य का एक वर्ष होता है। मनुष्यों का एक माह पितरों का एक दिन होता है। उनका दिन शुक्ल पक्ष और रात कृष्ण पक्ष होती है।

 

5. सौर वर्ष का दिन प्रारंभ :-  इसी दिन से उत्तरायण सौर वर्ष के दिन की शुरुआत मानी जाती है। हालांकि सौर नववर्ष सूर्य के मेष राशि में जाने से प्रारंभ होता है। सूर्य जब एक राशि ने निकल कर दूसरी राशि में प्रवेश करता है तब दूसरा माह प्रारंभ होता है। 12 राशियां सौर मास के 12 माह है। दरअसल, हिन्दू धर्म में कैलेंडर सूर्य, चंद्र और नक्षत्र पर आधारित है। सूर्य पर आधारित को सौरवर्ष, चंद्र पर आधारित को चंद्रवर्ष और नक्षत्र पर आधारिक को नक्षत्र वर्ष कहते हैं। जिस तरह चंद्रवर्ष के माह के दो भाग होते हैं- शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष, उसी तरह सौर्यवर्ष के दो भाग होते हैं- उत्तरायण और दक्षिणायन। सौरवर्ष का पहला माह मेष होता है जबकि चंद्रवर्ष का महला माह चैत्र होता है। नक्षत्र वर्ष का पहला माह चित्रा होता है।

 

6. वार युक्त संक्रांति :- वर्ष में 12 संक्रांतियां होती हैं। बारह संक्रान्तियां 7 प्रकार की, 7 नामों वाली हैं, जो किसी सप्ताह के दिन या किसी विशिष्ट नक्षत्र के सम्मिलन के आधार पर उल्लिखित हैं; वे ये हैं- मन्दा, मन्दाकिनी, ध्वांक्षी, घोरा, महोदरी, राक्षसी एवं मिश्रिता। घोरा रविवार, मेष या कर्क या मकर संक्रान्ति को, ध्वांक्षी सोमवार को, महोदरी मंगल को, मन्दाकिनी बुध को, मन्दा बृहस्पति को, मिश्रिता शुक्र को एवं राक्षसी शनि को होती है। कोई संक्रान्ति यथा मेष या कर्क आदि क्रम से मन्दा, मन्दाकिनी, ध्वांक्षी, घोरा, महोदरी, राक्षसी, मिश्रित कही जाती है, यदि वह क्रम से ध्रुव, मृदु, क्षिप्र, उग्र, चर, क्रूर या मिश्रित नक्षत्र से युक्त हों।

 

7. नक्षत्र युक्त संक्रांति :-  27 या 28 नक्षत्र को सात भागों में विभाजित हैं- ध्रुव (या स्थिर)- उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपदा, रोहिणी, मृदु- अनुराधा, चित्रा, रेवती, मृगशीर्ष, क्षिप्र (या लघु)- हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजित, उग्र- पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपदा, भरणी, मघा, चर- पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, स्वाति, शतभिषक क्रूर (या तीक्ष्ण)- मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा, मिश्रित (या मृदुतीक्ष्ण या साधारण)- कृत्तिका, विशाखा। उक्त वार या नक्षत्रों से पता चलता है कि इस बार की संक्रांति कैसी रहेगी।

 

8. गंगाजी का सागर में मिलन :-  मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं। महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया था इसलिए मकर संक्रांति पर गंगासागर में मेला लगता है ।

 

9. शनि के घर सूर्यदेव :-  इसी दिन सूर्य अपने पुत्र शनि के घर एक महीने के लिए जाते हैं, क्योंकि मकर राशि का स्वामी शनि है।

 

10. देवासुर संग्राम की समाप्ति :-  इस दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत करके युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी। उन्होंने सभी असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था। इसलिए यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता को खत्म करने का दिन भी माना जाता है।

 

11. फसलें लहलहाने लगती हैं :-  इस दिन से वसंत ऋतु की भी शुरुआत होती है और यह पर्व संपूर्ण अखंड भारत में फसलों के आगमन की खुशी के रूप में मनाया जाता है। खरीफ की फसलें कट चुकी होती हैं और खेतों में रबी की फसलें लहलहा रही होती हैं। खेत में सरसों के फूल मनमोहक लगते हैं।

 

12. दिन के बढ़ने की शुरुआत :- कहते हैं कि इसी दिन से दिन के बढ़े और वातावरण में धीरे धीरे तापमान के बढ़ने की शुरुआत होती है। कहते हैं कि एक तिल तापमान रोज बढ़ता है।

 

13. संपूर्ण भारत का पर्व :- मकर संक्रांति के इस पर्व को भारत के अलग-अलग राज्यों में वहां के स्थानीय तरीकों से मनाया जाता है। दक्षिण भारत में इस त्योहार को पोंगल के रूप में मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे लोहड़ी, खिचड़ी पर्व, पतंगोत्सव आदि कहा जाता है। मध्यभारत में इसे संक्रांति कहा जाता है। पूर्वोत्तर भारत में बिहू नाम से इस पर्व को मनाया जाता है।

 

14. तिल-गुड़ के लड्डू और पकवान :-  सर्दी के मौसम में वातावरण का तापमान बहुत कम होने के कारण शरीर में रोग और बीमारियां जल्दी लगती हैं इसलिए इस दिन गुड़ और तिल से बने मिष्ठान्न या पकवान बनाए, खाए और बांटे जाते हैं। इनमें गर्मी पैदा करने वाले तत्वों के साथ ही शरीर के लिए लाभदायक पोषक पदार्थ भी होते हैं। उत्तर भारत में इस दिन खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। गुड़-तिल, रेवड़ी, गजक का प्रसाद बांटा जाता है ।

 

15. स्नान, दान, पुण्य और पूजा :-  माना जाता है कि इस दिन सूर्य अपने पुत्र शनिदेव से नाराजगी त्यागकर उनके घर गए थे इसलिए इस दिन पवित्र नदी में स्नान, दान, पूजा आदि करने से पुण्य हजार गुना हो जाता है। इस दिन गंगासागर में मेला भी लगता है। इसी दिन मलमास भी समाप्त होने तथा शुभ माह प्रारंभ होने के कारण लोग दान-पुण्य से अच्छी शुरुआत करते हैं। इस दिन को सुख और समृद्धि का माना जाता है।

 

16. पतंग महोत्सव का पर्व :-  यह पर्व 'पतंग महोत्सव' के नाम से भी जाना जाता है। पतंग उड़ाने के पीछे मुख्य कारण है कुछ घंटे सूर्य के प्रकाश में बिताना। यह समय सर्दी का होता है और इस मौसम में सुबह का सूर्य प्रकाश शरीर के लिए स्वास्थवर्द्धक और त्वचा व हड्डियों के लिए अत्यंत लाभदायक होता है। अत: उत्सव के साथ ही सेहत का भी लाभ मिलता है |

 

 

Glory of Mahamrityunjaya Mantra


महामृत्युंजय मंत्र की महिमा 

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

देवाधिदेव महादेव ही एक मात्र ऐसे भगवान हैं, जिनकी भक्ति हर कोई करता है, चाहे वह इंसान हो, राक्षस हो, भूत-प्रेत हो अथवा देवता हो, यहां तक कि पशु-पक्षी, जलचर, नभचर, पाताललोक वासी हो अथवा बैकुण्ठवासी हो, शिव की भक्ति हर जगह हुई और जब तक दुनिया कायम है, शिव की महिमा गाई जाती रहेगी। 


शिव पुराण कथा के अनुसार शिव ही ऐसे भगवान हैं, जो शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्तों को मनचाहा वर दे देते हैं, वे सिर्फ अपने भक्तों का कल्याण करना चाहते हैं, वे यह नहीं देखते कि उनकी भक्ति करने वाला इंसान है, राक्षस है, भूत-प्रेत है या फिर किसी और योनि का जीव है, शिव को प्रसन्न करना सबसे आसान है। 


शिवलिंग की महिमा अपरम्पार है, शिवलिंग में मात्र जल चढ़ाकर या बेलपत्र अर्पित करके भी शिव को प्रसन्न किया जा सकता है, इसके लिए किसी विशेष पूजन विधि की आवश्यकता नहीं है, एक कथा के अनुसार वृत्तासुर के आतंक से देवता भयभीत थे, वृत्तासुर को श्राप था कि वह शिव पुत्र के हाथों ही मारा जायेगा। 


इसलिए पार्वती के साथ शिवजी का विवाह कराने के लिए सभी देवता चिंतित थे, क्योंकि भगवान शिव समाधिस्थ थे और जब तक समाधि से उठ नहीं जाते, विवाह कैसे होता? देवताओं ने विचार करके रति व कामदेव से शिव की समाधि भंग करने का निवेदन किया, कामदेव ने शिवजी को जगाया तो क्रोध में शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया, रति विलाप करने लगी तो शिव ने वरदान दिया कि द्वापर में कामदेव भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में जन्म लेंगे। 


इस बात में तो सभी यकीन करते होंगे, कि वक़्त से पहले और किस्मत से ज्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता, पर यह सभी जानते है कि वक़्त और किस्मत पर भी विजयी हो सकते हैं, अगर आप भगवान् भोलेनाथ की असीम शक्ति में विश्वास रखते है, इसके उदाहरण स्वरुप मैं एक कथा बताना चाहूंगा।


भगवान शिव यानि देवाधिदेव महादेव को तो सब जानते हैं जो परमपिता परमेश्वर, जगत के स्वामी और सब देवो के देव है, कथा से पहले आपको यह बता दूँ की यह वह समय हैं, जब महादेव की अर्धांगिनी देवी पार्वती, बाल्यवस्था में अपनी माता मैना देवी के साथ मार्कंडय ऋषि के आश्रम में रहती थी, और पार्वती देवी एक दिन असुरो के कारण संकट में पड़ गयी और महादेव ने उनके प्राणों की रक्षा की।


मैना ने जब अपनी पुत्रि की जान पर आई आपदा के बारे में सुना तो वह अत्यंत दुखी और भयभीत हो गयी, पर ऋषि मार्कंडय ने उन्हें जब बताया कि कैसे महादेव ने देवी पार्वती की रक्षा की, पर वह तब भी संतोष न कर सकी, मैना देवी विष्णु भगवान की उपासक थी, जिस वजह से शिव की महिमा में ज़रा भी विश्वास नहीं रखती थी, शिवजी ठहरे वैरागी और श्मशान में रहने वाले तो भला वह कैसे उनकी पूजा करे। 


तत्पश्चात ऋषि मार्कंडय ने मैना को शिव भगवान की महिमा के बारे में बताने का विचार किया, और उनको यह कथा विस्तार से बताई- जब मार्कंडय ऋषि केवल ग्यारह वर्ष के थे, तब उनके पिता ऋषि मृकण्डु को गुरुकूल आश्रम के गुरु से यह ज्ञात हुआ की मार्कंडय की सारी शिक्षा-दीक्षा पूर्ण हो चुकी है और अब वह उन्हें अपने साथ ले जा सकते है।


क्योंकि उन्होंने सारा ज्ञान इतने कम समय में ही अर्जित कर लिया और अब उनको और ज्ञान देने के लिए कुछ शेष नहीं था, यह जानने के बाद भी की उनका पुत्र मार्कंडय इतना बुद्धिमान और ज्ञानवान है, उनके माता पिता खुश नहीं हुयें, मार्कंडय ने जब पूछा की उनके दुःख का कारण क्या है? तब उनके पिता ने उनके जन्म की कहानी बताई कि पुत्र की प्राप्ति हेतु उन्होंने और उनकी माता ने कई वर्षो तक कठिन और घोर तप किया है।


तब भगवान् महादेव प्रसन्न होकर प्रकट हुयें, और उनको इस बात से अवगत कराया की उनके भाग में संतान सुख नहीं है, परन्तु उनके तप से प्रसन्न होकर उनको पुत्र का वरदान दिया, और उनसे पूछा की वह कैसा पुत्र चाहते है, जो बुद्धिवान ना हो पर उसकी आयु बहुत ज्यादा हो या ऐसा पुत्र जो बहुत बुद्धिमान हो परन्तु जिसकी आयु बहुत कम हो।


मृकण्डु और उनकी पत्नी ने कम आयु वाला पर बुद्धिमान पुत्र का वरदान माँगा, महादेवजी ने उनको बताया की यह पुत्र केवल बारह वर्ष तक ही जीवित रहेगा, वह फिर विचार कर ले, पर उन्होंने वही माँगा और महादेव उनको वरदान देकर भोलेनाथ अंतर्ध्यान हो गये, ऋषि मृकंदु ने यह सब अपने पुत्र को बताया, जिसको सुनने के बाद वह बहुत दुःखी हुआ, यह सोचकर की वह अपने माता -पिता की सेवा नहीं कर सकेगा।


परन्तु बालक मार्कंडय ने उसी समय यह निर्णय किया की वह अपनी मृत्यू पर विजय प्राप्त करेंगे और भगवान शिव की पूजा से यह हासिल करेंगे, बालक मार्कंडय ग्यारह वर्ष की आयु में वन को चले गयें, लगभग एक वर्ष के कठिन तप के दौरान उन्होंने एक नए मंत्र की रचना की जो मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सके, वह है:- 


"ॐ त्रियम्बकं यजामहे, सुगन्धिं पुष्टिवर्धनं, 

उर्वारुकमिव बन्धनात मृत्योर्मोक्षिय मामृतात्


जब वह 12 वर्ष के हुए तब यमराज उनके सामने, प्राण हरण के लिये प्रकट हो गये, बालक मार्कंडय ने यमराज को बहुत समझया और याचना की, कि वह उनके प्राण बक्श दे, परन्तु यमराज ने एक ना सुनी और और वह यमपाश के साथ उनके पीछे भागे बालक मार्कंडय भागते-भागते वन में एक शिवलिंग तक पहुचे जिसे देख कर वह उनसे लिपट गये, और भगवान् शिव का मंत्र बोलने लगे जिसकी रचना उन्होंने स्वयं की थी। 


यमराज ने बालक मार्कंडय की तरफ फिर से अपना यमपाश फेका परन्तु शिवजी तभी प्रकट हुए और उनका यमपाश अपने त्रिशूल से काट दिया, बालक मार्कंडय शिवजी के चरणों में याचना करने लगे की वह उनको प्राणों का वरदान दे, परन्तु महादेव ने उनको कहा की उन्होंने ही यह वरदान उनके माता-पिता को दिया था, इस पर बालक मार्कंडय कहते है कि यह वरदान तो उनके माता पिता के लिये था ना कि उनके लिये? 


यह सुनकर महादेव बालक मार्कंडय से अत्यंत प्रसन्न होते है और उनको जीवन का वरदान देते है, भगवान् भोलेनाथ ने यमराज को आदेश देते है की वह इस बालक के प्राण ना ले, कथा से क्या इस बात पर पुन: विचार करने का मन होता है की भक्ति में बहुत शक्ति है, ऐसा क्या नहीं है जो इस संसार में ईश्वर की भक्ति करने से प्राप्त ना किया जा सके, भगवान् भोलेनाथ की भक्ति और शक्ति की महिमा का बहुत बड़ा महात्म्य है।


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Prayagraj kumbh 2025

 

 Feeling blessed to be in the sacred city of Prayagraj, a place steeped in spirituality and history. This city holds a unique place in our hearts and minds. Praying at the Sangam was a deeply enriching experience. Sangam continues to inspire devotion and reverence across generations.

 





 
Feeling blessed to be in the sacred city of Prayagraj, a place steeped in spirituality and history. This city holds a unique place in our hearts and minds. Praying at the Sangam was a deeply enriching experience. Sangam continues to inspire devotion and reverence across generations.

 

Praying at the Shri Akshayavat Temple in Prayagraj

 

 





 Praying at the Shri Akshayavat Temple in Prayagraj was a very special experience. This eternal tree stands as a powerful symbol of divinity.

 

Prayed at the Shri Bade Hanuman Ji Mandir near Sangam in Prayagraj

 





 

Prayed at the Shri Bade Hanuman Ji Mandir near Sangam in Prayagraj. May Pawan Putra Hanuman Ji’s blessings always remain upon us!

 

visit to the Saraswati Koop in Prayagraj

 


A memorable visit to the Saraswati Koop in Prayagraj! This ancient place is steeped in history and spirituality, reflecting the deep reverence for our heritage.

 

108 names of Lord Vishnu

 

Way Of Life Karma: भगवान विष्णु के 108 नाम

 





1) ऊँ श्री विष्णवे नम:


2) ऊँ श्री परमात्मने नम:


3) ऊँ श्री विराट पुरुषाय नम:


4) ऊँ श्री क्षेत्र क्षेत्राज्ञाय नम:


5) ऊँ श्री केशवाय नम:


6) ऊँ श्री पुरुषोत्तमाय नम:


7) ऊँ श्री ईश्वराय नम:


8) ऊँ श्री हृषीकेशाय नम:


9) ऊँ श्री पद्मनाभाय नम:


10) ऊँ श्री विश्वकर्मणे नम:


11) ऊँ श्री कृष्णाय नम:


12) ऊँ श्री प्रजापतये नम:


13) ऊँ श्री हिरण्यगर्भाय नम:


14) ऊँ श्री सुरेशाय नम:


15) ऊँ श्री सर्वदर्शनाय नम:


16) ऊँ श्री सर्वेश्वराय नम:


17) ऊँ श्री अच्युताय नम:


18) ऊँ श्री वासुदेवाय नम:


19) ऊँ श्री पुण्डरीक्षाय नम:


20) ऊँ श्री नर-नारायणा नम:


21) ऊँ श्री जनार्दनाय नम:


22) ऊँ श्री लोकाध्यक्षाय नम:


23) ऊँ श्री चतुर्भुजाय नम:


24) ऊँ श्री धर्माध्यक्षाय नम:


25) ऊँ श्री उपेन्द्राय नम:


26) ऊँ श्री माधवाय नम:


27) ऊँ श्री महाबलाय नम:


28) ऊँ श्री गोविन्दाय नम:


29) ऊँ श्री प्रजापतये नम:


30) ऊँ श्री विश्वातमने नम:


31) ऊँ श्री सहस्त्राक्षाय नम:


32) ऊँ श्री नारायणाय नम:


33) ऊँ श्री सिद्ध संकल्पयाय नम:


34) ऊँ श्री महेन्द्राय नम:


35) ऊँ श्री वामनाय नम:


36) ऊँ श्री अनन्तजिते नम:


37) ऊँ श्री महीधराय नम:


38) ऊँ श्री गरुडध्वजाय नम:


39) ऊँ श्री लक्ष्मीपतये नम:


40) ऊँ श्री दामोदराय नम:


41) ऊँ श्री कमलापतये नम:


42) ऊँ श्री परमेश्वराय नम:


43) ऊँ श्री धनेश्वराय नम:


44) ऊँ श्री मुकुन्दाय नम:


45) ऊँ श्री आनन्दाय नम:


46) ऊँ श्री सत्यधर्माय नम:


47) ऊँ श्री उपेन्द्राय नम:


48) ऊँ श्री चक्रगदाधराय नम:


49) ऊँ श्री भगवते नम:


50) ऊँ श्री शान्तिदाय नम:


51) ऊँ श्री गोपतये नम:


52) ऊँ श्री श्रीपतये नम:


53) ऊँ श्री श्रीहरये नम:


54) ऊँ श्री श्रीरघुनाथाय नम:


55) ऊँ श्री कपिलेश्वराय नम:


56) ऊँ श्री वाराहय नम:


57) ऊँ श्री नरसिंहाय नम:


58) ऊँ श्री रामाय नम:


59) ऊँ श्री हयग्रीवाय नम:


60) ऊँ श्री शोकनाशनाय नम:


61) ऊँ श्री विशुद्धात्मने नम:


62) ऊँ श्री केश्वाय नम:


63) ऊँ श्री धनंजाय नम:


64) ऊँ श्री ब्राह्मणप्रियाय नम:


65) ऊँ श्री श्री यदुश्रेष्ठाय नम:


66) ऊँ श्री लोकनाथाय नम:


67) ऊँ श्री भक्तवत्सलाय नम:


68) ऊँ श्री चतुर्मूर्तये नम:


69) ऊँ श्री एकपदे नम:


70) ऊँ श्री सुलोचनाय नम:


71) ऊँ श्री सर्वतोमुखाय नम:


72) ऊँ श्री सप्तवाहनाय नम:


73) ऊँ श्री वंशवर्धनाय नम:


74) ऊँ श्री योगिनेय नम:


75) ऊँ श्री धनुर्धराय नम:


76) ऊँ श्री प्रीतिवर्धनाय नम:


77) ऊँ श्री प्रीतिवर्धनाय नम:


78) ऊँ श्री अक्रूराय नम:


79) ऊँ श्री दु:स्वपननाशनाय नम:


80) ऊँ श्री भूभवे नम:


81) ऊँ श्री प्राणदाय नम:


82) ऊँ श्री देवकी नन्दनाय नम:


83) ऊँ श्री शंख भृते नम:


84) ऊँ श्री सुरेशाय नम:


85) ऊँ श्री कमलनयनाय नम:


86) ऊँ श्री जगतगुरूवे नम:


87) ऊँ श्री सनातन नम:


88) ऊँ श्री सच्चिदानन्दाय नम:


89) ऊँ श्री द्वारकानाथाय नम:


90) ऊँ श्री दानवेन्द्र विनाशकाय नम:


91) ऊँ श्री दयानिधि नम:


92) ऊँ श्री एकातम्ने नम:


93) ऊँ श्री शत्रुजिते नम:


94) ऊँ श्री घनश्यामाय नम:


95) ऊँ श्री लोकाध्यक्षाय नम:


96) ऊँ श्री जरा-मरण-वर्जिताय नम:


97) ऊँ श्री सर्वयज्ञफलप्रदाय नम:


98) ऊँ श्री विराटपुरुषाय नम:


99) ऊँ श्री यशोदानन्दनयाय नम:


100) ऊँ श्री परमधार्मिकाय नम:


101) ऊँ श्री गरुडध्वजाय नम:


102) ऊँ श्री प्रभवे नम:


103) ऊँ श्री लक्ष्मीकान्ताजाय नम:


104) ऊँ श्री गगनसदृश्यमाय नम:


105) ऊँ श्री वामनाय नम:


106) ऊँ श्री हंसाय नम:


107) ऊँ श्री वयासाय नम:


108) ऊँ श्री प्रकटाय नम:


🙏ॐ नमो नारायण 🙏



Hindu Temples in Afganistan

List of Hindu Temples whose ruins still exist in Afganistan.

1. Sanatan Hindu Temple (Ghazni).

2. Ram Temple (Ghazni).

3. Lord Vishnu Temple (Ghazni).

4. Shivalaya Mandir ( Ghazni).

5. Lord Brahma Mandir ( Ghazni).

6. Somnath Temple (Ghazni).

7. Asamayi Temple (Kabul).

8. Gardi Ghos Ziarat (Kabul).

9. Baba Jothi Sorup , Shor bazar (Kabul).

10. Bhairo Mandir , Shor bazar (Kabul).

11. Mangalwar Mandir , Shor bazar (Kabul).

12. Sanatan Dharma Temple (Jalalabad).

13. Hindu Temple Karukh (Herat city).

14. Baba Sahib China (Sharan).

15. Malik Yar Baba (Gardi Ghos).

16. Gardi Ghos Temple (Gardi Ghos).

17.Bilout Ancient Hindu Temple (Gardi Ghos).

18. Suraj Kund Temple (Herat).

19. Gandhari Mandir (Kandhar).

20. Krishna Temple (Kandhar).

21. Ram Temple (Kandhar).

22. Shiv Mahalaya (Kandhar).

23. Ram Darbar (Panjwai).

And many temples whose ruins do not exist today .

Hindu Temples in Afganistan

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Who gets the vision of God?


Way Of Life Karma: ईश्वर के दर्शन किसे प्राप्त होते हैं ?
एक राजा था। वह बहुत न्याय प्रिय तथा प्रजा वत्सल एवं धार्मिक स्वभाव का था। वह नित्य अपने ठाकुर जी की बडी श्रद्धा से पूजा-पाठ और याद करता था।एक दिन ठाकुर जी ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिये तथा कहा- राजन् मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं। बोलो तुम्हारी कोई इच्छा हॆ ?

प्रजा को चाहने वाला राजा बोला - भगवन् मेरे पास आपका दिया सब कुछ हैं आपकी कृपा से राज्य मे सब प्रकार सुख-शान्ति है।फिर भी मेरी एक ही इच्छा हैं कि जैसे आपने मुझे दर्शन देकर धन्य किया,वैसे ही मेरी सारी प्रजा को भी कृपा कर दर्शन दीजिये।

यह तो सम्भव नहीं है !! -- ऐसा कहते हुए भगवान ने राजा को समझाया। परन्तु प्रजा को चाहने वाला राजा भगवान् से जिद्द् करने लगा।आखिर भगवान को अपने भक्ति के सामने झुकना पडा ओर वे बोले - ठीक है !! कल अपनी सारी प्रजा को उस पहाड़ी के पास ले आना और मैं पहाडी के ऊपर से सभी को दर्शन दूँगा।ये सुन कर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुआ और भगवान को धन्यवाद दिया।

राजा ने सारे नगर मे ढिंढोरा पिटवा दिया कि - कल सभी पहाड़ के नीचे मेरे साथ पहुँचे,वहाँ भगवान आप सबको दर्शन देगें। दूसरे दिन राजा अपने समस्त प्रजा और स्वजनों को साथ लेकर पहाडी की ओर चलने लगा।

चलते-चलते रास्ते मे एक स्थान पर तांबे कि सिक्कों का पहाड देखा।प्रजा में से कुछ एक लोग उस ओर भागने लगे।तभी ज्ञानी राजा ने सबको सर्तक किया कि कोई उस ओर ध्यान न दे, क्योकि तुम सब भगवान से मिलने जा रहे हो, इन तांबे के सिक्कों के पीछे अपने भाग्य को लात मत मारो।परन्तु लोभ-लालच मे वशीभूत प्रजा के कुछ एक लोग तो तांबे की सिक्कों वाली पहाड़ी की ओर भाग ही गये और सिक्कों कि गठरी बनाकर अपने घर कि ओर चलने लगे।वे मन ही मन सोच रहे थे,पहले ये सिक्कों को समेट ले,भगवान से तो फिर कभी मिल ही लेगे।

राजा खिन्न मन से आगे बढे।कुछ दूर चलने पर चांदी कि सिक्कों का चमचमाता पहाड़ दिखाई दिया। इस वार भी बचे हुये प्रजा में से कुछ लोग,उस ओर भागने लगे ओर चांदी के सिक्कों की गठरी बनाकर अपनी घर की ओर चलने लगे। उनके मन मे विचार चल रहा था कि ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता है।

चांदी के इतने सारे सिक्के फिर मिले न मिले,भगवान तो फिर कभी मिल ही जायेगें।

इसी प्रकार कुछ दूर और चलने पर सोने के सिक्कों का पहाड़ नजर आया। अब तो प्रजाजनो में बचे हुये सारे लोग तथा राजा के स्वजन भी उस ओर भागने लगे।
वे भी दूसरों की तरह सिक्कों कि गठरीयां लाद-लाद कर अपने-अपने घरों की ओर चल दिये।अब केवल राजा ओर रानी ही शेष रह गये थे। राजा रानी से कहने लगे --
देखो कितने लोभी ये लोग। भगवान से मिलने का महत्व ही नहीं जानते हैं। भगवान के सामने सारी दुनियां की दौलत क्या चीज हैं? 

सही बात है -- रानी ने राजा कि बात का समर्थन किया और वह आगे बढने लगे कुछ दूर चलने पर राजा ओर रानी ने देखा कि सप्तरंगि आभा बिखरता हीरों का पहाड़ है।

अब तो रानी से भी रहा नहीं गया,हीरों के आर्कषण से वह भी दौड पड़ी और हीरों कि गठरी बनाने लगी। फिर भी उसका मन नहीं भरा तो साड़ी के पल्लू मेँ भी बांधने लगी। वजन के कारण रानी के वस्त्र देह से अलग हो गये,परंतु हीरों का तृष्णा अभी भी नहीं मिटी। यह देख राजा को अत्यन्त ही ग्लानि ओर विरक्ति हुई।

 बड़े दुःखद मन से राजा अकेले ही आगे बढते गये।वहाँ सचमुच भगवान खड़े उसका इन्तजार कर रहे थे। 

राजा को देखते ही भगवान मुसकुराये ओर पुछा -
कहाँ है तुम्हारी प्रजा और तुम्हारे प्रियजन। मैं तो कब से उनसे मिलने के लिये बेकरारी से उनका इन्तजार कर रहा हूॅ। राजा ने शर्म और आत्म-ग्लानि से अपना सिर झुका दिया।

तब भगवान ने राजा को समझाया --
राजन !! जो लोग अपने जीवन में भौतिक सांसारिक प्राप्ति को मुझसे अधिक मानते हैं,उन्हें कदाचित मेरी प्राप्ति नहीं होती और वह मेरे स्नेह तथा कृपा से भी वंचित रह जाते हैं !!

कथा सार- जो जीव अपनी मन,बुद्धि और आत्मा से भगवान की शरण में जाते हैं और जो सर्व लौकिक मोह को छोड के प्रभु को ही अपना मानते हैं वो ही भगवान के दर्शन प्राप्त करते है..!!
   🙏🏻जय श्री कृष्ण🙏


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