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Nav Samvatsar: A celebration of new energy

नव संवत्सर: एक नई ऊर्जा का उत्सव



"नववर्ष शुभमस्तु ते, सर्वेषां मंगलम भवेत्।"


नव संवत्सर हिंदू पंचांग के अनुसार नए वर्ष की शुरुआत का पावन पर्व है। यह चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है और इसी दिन से विक्रम संवत का आरंभ भी माना जाता है। यह दिन प्रकृति, धर्म और आध्यात्मिकता से जुड़ा हुआ है, जो हमें एक नई ऊर्जा और सकारात्मकता के साथ जीवन में आगे बढ़ने का संदेश देता है।


Hindu New Year: A New Beginning

हिंदू नववर्ष : एक नई शुरुआत 



"यथा शिखा मयूराणां, नागानां मणयो यथा। तद्वद् वेदाङ्गशास्त्राणां, गणितं मूर्ध्नि स्थितम्।।"


हिंदू नववर्ष भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा का एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों और तिथियों में मनाया जाता है, लेकिन सभी का उद्देश्य एक ही है—नए वर्ष का स्वागत, नई ऊर्जा का संचार और भगवान से आशीर्वाद की प्रार्थना।


10 important things about Hinduism





हिन्दू धर्म की 10 महत्वपूर्ण बातें

10 important things about Hinduism

1) 10 ध्वनियां :


1.घंटी, 2.शंख, 3.बांसुरी, 4.वीणा, 5. मंजीरा, 6.करतल, 7.बीन (पुंगी), 8.ढोल, 9.नगाड़ा और 10.मृदंग



2) 10 कर्तव्य:-


1. संध्यावंदन, 2. व्रत, 3. तीर्थ, 4. उत्सव, 5. दान, 6. सेवा 7. संस्कार, 8. यज्ञ, 9. वेदपाठ, 10. धर्म प्रचार।


3) 10 दिशाएं :


दिशाएं 10 होती हैं जिनके नाम और क्रम इस प्रकार हैं- उर्ध्व, ईशान, पूर्व, आग्नेय, दक्षिण, नैऋत्य, पश्चिम, वायव्य, उत्तर और अधो। एक मध्य दिशा भी होती है। इस तरह कुल मिलाकर 11 दिशाएं हुईं।


4) 10 दिग्पाल :

10 दिशाओं के 10 दिग्पाल अर्थात द्वारपाल होते हैं या देवता होते हैं। उर्ध्व के ब्रह्मा, ईशान के शिव व ईश, पूर्व के इंद्र, आग्नेय के अग्नि या वह्रि, दक्षिण के यम, नैऋत्य के नऋति, पश्चिम के वरुण, वायव्य के वायु और मारुत, उत्तर के कुबेर और अधो के अनंत।


5) 10 देवीय आत्मा :


1.कामधेनु गाय, 2.गरुढ़, 3.संपाति-जटायु, 4.उच्चै:श्रवा अश्व, 5.ऐरावत हाथी, 6.शेषनाग-वासुकि, 7.रीझ मानव, 8.वानर मानव, 9.येति, 10.मकर।


6) 10 देवीय वस्तुएं :


1.कल्पवृक्ष, 2.अक्षयपात्र, 3.कर्ण के कवच कुंडल, 4.दिव्य धनुष और तरकश, 5.पारस मणि, 6.अश्वत्थामा की मणि, 7.स्यंमतक मणि, 8.पांचजन्य शंख, 9.कौस्तुभ मणि और संजीवनी बूटी।


7) 10 पवित्र पेय :


1.चरणामृत, 2.पंचामृत, 3.पंचगव्य, 4.सोमरस, 5.अमृत, 6.तुलसी रस, 7.खीर, 9.आंवला रस


8) 10 महाविद्या :


1.काली, 2.तारा, 3.त्रिपुरसुंदरी, 4. भुवनेश्‍वरी, 5.छिन्नमस्ता, 6.त्रिपुरभैरवी, 7.धूमावती, 8.बगलामुखी, 9.मातंगी और 10.कमला।


9) 10 उत्सव :


नवसंवत्सर, मकर संक्रांति, वसंत पंचमी, पोंगल, होली, दीपावली, रामनवमी, कृष्ण जन्माष्‍टमी, महाशिवरात्री और नवरात्रि।


10) 10 बाल पुस्तकें :


1.पंचतंत्र, 2.हितोपदेश, 3.जातक कथाएं, 4.उपनिषद कथाएं, 5.वेताल पच्चिसी, 6.कथासरित्सागर, 7.सिंहासन बत्तीसी, 8.तेनालीराम, 9.शुकसप्तति, 10.बाल कहानी संग्रह।


11) 10 पूजा :


गंगा दशहरा, आंवला नवमी पूजा, वट सावित्री, तुलसी विवाह पूजा, शीतलाष्टमी, गोवर्धन पूजा, हरतालिका तिज, दुर्गा पूजा, भैरव पूजा और छठ पूजा।


12) 10 धार्मिक स्थल :


12 ज्योतिर्लिंग, 51 शक्तिपीठ, 4 धाम, 7 पुरी, 7 नगरी, 4 मठ, आश्रम, 10 समाधि स्थल, 5 सरोवर, 10 पर्वत और 10 गुफाएं।


13) 10 पूजा के फूल :


आंकड़ा, गेंदा, पारिजात, चंपा, कमल, गुलाब, चमेली, गुड़हल, कनेर, और रजनीगंधा।


14) 10 धार्मिक सुगंध :


गुग्गुल, चंदन, गुलाब, केसर, कर्पूर, अष्टगंथ, गुढ़-घी, समिधा, मेहंदी, चमेली।


15)10 यम-नियम :


1.अहिंसा, 2.सत्य, 3.अस्तेय 4.ब्रह्मचर्य और 5.अपरिग्रह। 6.शौच 7.संतोष, 8.तप, 9.स्वाध्याय और 10.ईश्वर-प्रणिधान।


16)10 सिद्धांत :


1.एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति (एक ही ईश्‍वर है दूसरा नहीं), 2.आत्मा अमर है,
3.पुनर्जन्म होता है,
4.मोक्ष ही जीवन का लक्ष्य है,
5.कर्म का प्रभाव होता है, जिसमें से ‍कुछ प्रारब्ध रूप में होते हैं इसीलिए कर्म ही भाग्य है,
6.संस्कारबद्ध जीवन ही जीवन है,
7.ब्रह्मांड अनित्य और परिवर्तनशील है,
8.संध्यावंदन-ध्यान ही सत्य है,
9.वेदपाठ और यज्ञकर्म ही धर्म है,
10.दान ही पुण्य है..!!


Restore the destroyed temples



नष्ट हुए मंदिरों को पुनः स्थापित करें,

 कब्ज़ा किए गए मंदिरों को पुनः प्राप्त करें, 

इतिहास को फिर से लिखें, नई पीढ़ी को पुनः जागृत करें, 

शिक्षा प्रणाली और सर्किट को नया स्वरूप दें, 

सनातन धर्म को पुनः संगठित करें। 

अखंड भारत वर्ष सूर्य के रूप में फिर से उदय होगा...

 

Maghi Purnima Editorial

WOLK :- माघी पूर्णिमा सनातन परंपरा, आध्यात्मिकता और पुण्य का संगम



हिंदू धर्म में माघी पूर्णिमा का विशेष महत्व है। यह दिन धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र माना जाता है। माघ माह की पूर्णिमा को होने वाला यह पर्व मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है और पवित्र स्नान, दान, पूजा-अर्चना और तपस्या के लिए उत्तम माना जाता है। माघ मास को स्वयं भगवान विष्णु का प्रिय माह कहा गया है और इस मास में गंगा, यमुना तथा अन्य पवित्र नदियों में स्नान करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। विशेष रूप से प्रयागराज में गंगा-यमुना के संगम पर आयोजित माघ मेले और कल्पवासियों के लिए यह तिथि विशेष रूप से महत्वपूर्ण होती है।


माघी पूर्णिमा का महत्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी है। यह पर्व लोगों को आत्मशुद्धि, परोपकार, सहिष्णुता और दान-पुण्य का संदेश देता है। इस दिन भारत में अनेक स्थानों पर भव्य मेलों और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है।

Maghi Purnima

WOLK: Maghi Purnima


माघी पूर्णिमा हिंदू पंचांग के अनुसार माघ माह की पूर्णिमा को कहा जाता है। यह एक महत्वपूर्ण तिथि होती है और विशेष रूप से स्नान, दान और तपस्या के लिए उत्तम मानी जाती है। इस दिन गंगा, यमुना, और अन्य पवित्र नदियों में स्नान करने का विशेष महत्व होता है, जिससे पुण्य की प्राप्ति होती है।

Madambakkam Dhenupureeswarar Temple

 


 

 Madambakkam Dhenupureeswarar temple

 श्री राम जी एक सबसे प्यारे विनम्र हनुमान जी के साथ 

 

Ayurvedic Dohe for Health




🌿∥ आयुर्वेदिक दोहे सेहत के लिए ∥🌿



1. दही मथें माखन मिले, केसर संग मिलाय,

होठों पर लेपित करें, रंग गुलाबी आय..

Daily Quotes

 


 

 अग्नि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्याय विस्तरः।

पुराणं धर्मशास्त्रं च विद्या ह्याताश्चर्तुदश ।।


 विभूति योग आयुर्वेदा धनुर्वेदो गान्धर्वश्चैव ते त्रयः।

अर्थशास्त्रं चतुर्थं तु विद्या ह्यष्टादशैव ताः ।। (विष्णु पुराण-3.6.27.28)

Shri Mahalaxmi Ashtak Stotra with Hindi meaning

 

श्री महालक्ष्मी अष्टक स्तोत्र हिंदी अर्थ सहित :


Shri Mahalaxmi Ashtak Stotra with Hindi meaning

एकदा दुर्वाशा ऋषि द्वारा श्रापित देवराज इंद्र ने धन- वैभव हराकर कंगाल बन गया था। माँ महालक्ष्मी उसके लिए तीनों लोक से अदृश्य हो गए थे। उस समय इंद्र ने लक्षमी माता को वापस लाने के लिए यह अष्टक रचना किया था, जिससे लक्ष्मी जी उसके पास लौट आये थे।।

108 Names of Hanuman ji

 

 हनुमान जी के 108 नाम



हनुमान जी की उपासना से जीवन के सारे कष्ट, संकट मिट जाते है। माना जाता है कि हनुमान एक ऐसे देवता है जो थोड़ी-सी प्रार्थना और पूजा से ही शीघ्र प्रसन्न हो जाते है। मंगलवार और शनिवार का दिन इनके पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं। उनके 108 पवित्र नाम...

Hindu Calendar Months

हिंदू कैलेंडर में 12 महीनों के नाम होते हैं, जो चंद्र महीनों पर आधारित होते हैं। ये नाम निम्नलिखित हैं:-





1. चैत्र (Chaitra): मार्च-अप्रैल


2. वैशाख (Vaishakha): अप्रैल-मई


3. ज्येष्ठ (Jyeshtha): मई-जून


4. आषाढ़ (Ashadha): जून-जुलाई


5. श्रावण (Shravana): जुलाई-अगस्त


6. भाद्रपद (Bhadrapada): अगस्त-सितंबर


7. आश्विन (Ashwin): सितंबर-अक्टूबर


8. कार्तिक (Kartika): अक्टूबर-नवंबर


9. मार्गशीर्ष (Margashirsha): नवंबर-दिसंबर


10. पौष (Pausha): दिसंबर-जनवरी


11. माघ (Magha): जनवरी-फरवरी


12. फाल्गुन (Phalguna): फरवरी-मार्च


विशेषताएँ:


ये नाम चंद्रमा के चरणों और ऋतुओं के आधार पर तय किए जाते हैं।


हर महीने में दो पक्ष (अमावस्या से पूर्णिमा तक का शुक्ल पक्ष और पूर्णिमा से अमावस्या तक का कृष्ण पक्ष) होते हैं।


इन महीनों का उपयोग धार्मिक त्योहारों और संस्कारों की तिथियों के निर्धारण में किया जाता है।



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Swami Vivekananda Jayanti: Celebration of a visionary


स्वामी विवेकानंद जयंती: एक युगदृष्टा का उत्सव


WOLK: Swami Vivekananda Jayanti: Celebration of a visionary


स्वामी विवेकानंद जयंती, जिसे राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में भी मनाया जाता है, हर साल 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद की जन्म तिथि के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। यह दिन न केवल उनके अद्वितीय जीवन और योगदान का सम्मान करता है, बल्कि युवा पीढ़ी को उनके विचारों और आदर्शों से प्रेरित होने का भी संदेश देता है। स्वामी विवेकानंद भारत के महानतम संतों में से एक थे, जिनकी शिक्षाओं ने न केवल भारत को, बल्कि पूरे विश्व को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मार्गदर्शन प्रदान किया।

Makar Sankranti

 

 

मकर सक्रांति विशेष

 

Makar Sankranti

मकर संक्रांति की 16 बड़ी बातें पर्व मनाने से पहले जरूर जानें

 

 सूर्य संक्रांति में मकर सक्रांति का महत्व ही अधिक माना गया है। माघ माह में कृष्ण पंचमी को मकर सक्रांति देश के लगभग सभी राज्यों में अलग-अलग सांस्कृतिक रूपों में मनाई जाती है। इस बार 14 जनवरी 2025 को मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाएगा । आइए जानते हैं कि मकर संक्रांति के बारे में रोचक 16 तथ्‍य क्या है ।

 

वर्ष में होती है 12 संक्रांतियां :- पृथ्वी साढ़े 23 डिग्री अक्ष पर झुकी हुई सूर्य की परिक्रमा करती है तब वर्ष में 4 स्थितियां ऐसी होती हैं, जब सूर्य की सीधी किरणें 21 मार्च और 23 सितंबर को विषुवत रेखा, 21 जून को कर्क रेखा और 22 दिसंबर को मकर रेखा पर पड़ती है। वास्तव में चन्द्रमा के पथ को 27 नक्षत्रों में बांटा गया है जबकि सूर्य के पथ को 12 राशियों में बांटा गया है। भारतीय ज्योतिष में इन 4 स्थितियों को 12 संक्रांतियों में बांटा गया है जिसमें से 4 संक्रांतियां महत्वपूर्ण होती हैं- मेष, तुला, कर्क और मकर संक्रांति

 

1. मकर संक्रांति का अर्थ :- मकर संक्रांति में 'मकर' शब्द मकर राशि को इंगित करता है जबकि 'संक्रांति' का अर्थ संक्रमण अर्थात प्रवेश करना है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है। एक राशि को छोड़कर दूसरे में प्रवेश करने की इस विस्थापन क्रिया को संक्रांति कहते हैं। चूंकि सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है इसलिए इस समय को 'मकर संक्रांति' कहा जाता है ।

 

2. इस दिन से सूर्य होता है उत्तरायन :- चन्द्र के आधार पर माह के 2 भाग हैं- कृष्ण और शुक्ल पक्ष। इसी तरह सूर्य के आधार पर वर्ष के 2 भाग हैं- उत्तरायन और दक्षिणायन। इस दिन से सूर्य उत्तरायन हो जाता है। उत्तरायन अर्थात इस समय से धरती का उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य की ओर मुड़ जाता है, तो उत्तर ही से सूर्य निकलने लगता है। इसे सोम्यायन भी कहते हैं। 6 माह सूर्य उत्तरायन रहता है और 6 माह दक्षिणायन। मकर संक्रांति से लेकर कर्क संक्रांति के बीच के 6 मास के समयांतराल को उत्तरायन कहते हैं।

 

3. उत्तरायण का महत्व :- भगवान श्रीकृष्ण ने भी उत्तरायन का महत्व बताते हुए गीता में कहा है कि उत्तरायन के 6 मास के शुभ काल में जब सूर्यदेव उत्तरायन होते हैं और पृथ्वी प्रकाशमय रहती है, तो इस प्रकाश में शरीर का परित्याग करने से व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता, ऐसे लोग ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यही कारण था कि भीष्म पितामह ने शरीर तब तक नहीं त्यागा था, जब तक कि सूर्य उत्तरायन नहीं हो गया।

 

4. देवताओं का दिन प्रारंभ :- मान्यता के अनुसार मकर संक्रांति से देवताओं का दिन आरंभ होता है, जो आषाढ़ मास तक रहता है। कर्क संक्रांति से देवताओं की रात प्रारंभ होती है। अर्थात देवताओं के एक दिन और रात को मिलाकर मनुष्‍य का एक वर्ष होता है। मनुष्यों का एक माह पितरों का एक दिन होता है। उनका दिन शुक्ल पक्ष और रात कृष्ण पक्ष होती है।

 

5. सौर वर्ष का दिन प्रारंभ :-  इसी दिन से उत्तरायण सौर वर्ष के दिन की शुरुआत मानी जाती है। हालांकि सौर नववर्ष सूर्य के मेष राशि में जाने से प्रारंभ होता है। सूर्य जब एक राशि ने निकल कर दूसरी राशि में प्रवेश करता है तब दूसरा माह प्रारंभ होता है। 12 राशियां सौर मास के 12 माह है। दरअसल, हिन्दू धर्म में कैलेंडर सूर्य, चंद्र और नक्षत्र पर आधारित है। सूर्य पर आधारित को सौरवर्ष, चंद्र पर आधारित को चंद्रवर्ष और नक्षत्र पर आधारिक को नक्षत्र वर्ष कहते हैं। जिस तरह चंद्रवर्ष के माह के दो भाग होते हैं- शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष, उसी तरह सौर्यवर्ष के दो भाग होते हैं- उत्तरायण और दक्षिणायन। सौरवर्ष का पहला माह मेष होता है जबकि चंद्रवर्ष का महला माह चैत्र होता है। नक्षत्र वर्ष का पहला माह चित्रा होता है।

 

6. वार युक्त संक्रांति :- वर्ष में 12 संक्रांतियां होती हैं। बारह संक्रान्तियां 7 प्रकार की, 7 नामों वाली हैं, जो किसी सप्ताह के दिन या किसी विशिष्ट नक्षत्र के सम्मिलन के आधार पर उल्लिखित हैं; वे ये हैं- मन्दा, मन्दाकिनी, ध्वांक्षी, घोरा, महोदरी, राक्षसी एवं मिश्रिता। घोरा रविवार, मेष या कर्क या मकर संक्रान्ति को, ध्वांक्षी सोमवार को, महोदरी मंगल को, मन्दाकिनी बुध को, मन्दा बृहस्पति को, मिश्रिता शुक्र को एवं राक्षसी शनि को होती है। कोई संक्रान्ति यथा मेष या कर्क आदि क्रम से मन्दा, मन्दाकिनी, ध्वांक्षी, घोरा, महोदरी, राक्षसी, मिश्रित कही जाती है, यदि वह क्रम से ध्रुव, मृदु, क्षिप्र, उग्र, चर, क्रूर या मिश्रित नक्षत्र से युक्त हों।

 

7. नक्षत्र युक्त संक्रांति :-  27 या 28 नक्षत्र को सात भागों में विभाजित हैं- ध्रुव (या स्थिर)- उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपदा, रोहिणी, मृदु- अनुराधा, चित्रा, रेवती, मृगशीर्ष, क्षिप्र (या लघु)- हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजित, उग्र- पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपदा, भरणी, मघा, चर- पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, स्वाति, शतभिषक क्रूर (या तीक्ष्ण)- मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा, मिश्रित (या मृदुतीक्ष्ण या साधारण)- कृत्तिका, विशाखा। उक्त वार या नक्षत्रों से पता चलता है कि इस बार की संक्रांति कैसी रहेगी।

 

8. गंगाजी का सागर में मिलन :-  मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं। महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया था इसलिए मकर संक्रांति पर गंगासागर में मेला लगता है ।

 

9. शनि के घर सूर्यदेव :-  इसी दिन सूर्य अपने पुत्र शनि के घर एक महीने के लिए जाते हैं, क्योंकि मकर राशि का स्वामी शनि है।

 

10. देवासुर संग्राम की समाप्ति :-  इस दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत करके युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी। उन्होंने सभी असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था। इसलिए यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता को खत्म करने का दिन भी माना जाता है।

 

11. फसलें लहलहाने लगती हैं :-  इस दिन से वसंत ऋतु की भी शुरुआत होती है और यह पर्व संपूर्ण अखंड भारत में फसलों के आगमन की खुशी के रूप में मनाया जाता है। खरीफ की फसलें कट चुकी होती हैं और खेतों में रबी की फसलें लहलहा रही होती हैं। खेत में सरसों के फूल मनमोहक लगते हैं।

 

12. दिन के बढ़ने की शुरुआत :- कहते हैं कि इसी दिन से दिन के बढ़े और वातावरण में धीरे धीरे तापमान के बढ़ने की शुरुआत होती है। कहते हैं कि एक तिल तापमान रोज बढ़ता है।

 

13. संपूर्ण भारत का पर्व :- मकर संक्रांति के इस पर्व को भारत के अलग-अलग राज्यों में वहां के स्थानीय तरीकों से मनाया जाता है। दक्षिण भारत में इस त्योहार को पोंगल के रूप में मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे लोहड़ी, खिचड़ी पर्व, पतंगोत्सव आदि कहा जाता है। मध्यभारत में इसे संक्रांति कहा जाता है। पूर्वोत्तर भारत में बिहू नाम से इस पर्व को मनाया जाता है।

 

14. तिल-गुड़ के लड्डू और पकवान :-  सर्दी के मौसम में वातावरण का तापमान बहुत कम होने के कारण शरीर में रोग और बीमारियां जल्दी लगती हैं इसलिए इस दिन गुड़ और तिल से बने मिष्ठान्न या पकवान बनाए, खाए और बांटे जाते हैं। इनमें गर्मी पैदा करने वाले तत्वों के साथ ही शरीर के लिए लाभदायक पोषक पदार्थ भी होते हैं। उत्तर भारत में इस दिन खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। गुड़-तिल, रेवड़ी, गजक का प्रसाद बांटा जाता है ।

 

15. स्नान, दान, पुण्य और पूजा :-  माना जाता है कि इस दिन सूर्य अपने पुत्र शनिदेव से नाराजगी त्यागकर उनके घर गए थे इसलिए इस दिन पवित्र नदी में स्नान, दान, पूजा आदि करने से पुण्य हजार गुना हो जाता है। इस दिन गंगासागर में मेला भी लगता है। इसी दिन मलमास भी समाप्त होने तथा शुभ माह प्रारंभ होने के कारण लोग दान-पुण्य से अच्छी शुरुआत करते हैं। इस दिन को सुख और समृद्धि का माना जाता है।

 

16. पतंग महोत्सव का पर्व :-  यह पर्व 'पतंग महोत्सव' के नाम से भी जाना जाता है। पतंग उड़ाने के पीछे मुख्य कारण है कुछ घंटे सूर्य के प्रकाश में बिताना। यह समय सर्दी का होता है और इस मौसम में सुबह का सूर्य प्रकाश शरीर के लिए स्वास्थवर्द्धक और त्वचा व हड्डियों के लिए अत्यंत लाभदायक होता है। अत: उत्सव के साथ ही सेहत का भी लाभ मिलता है |

 

 

Purnima Vrat

 


 


पूर्णिमा व्रत


पूर्णिमा व्रत का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। पूर्णिमा का व्रत जगत के पालनहार भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए शुभ माना जाता है। पूर्णिमा तिथि के दिन जो व्यक्ति स्नान दान के कार्य करता है वह शुभ फलदायी माने जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पूर्णिमा का व्रत करने से व्यक्ति को सभी दुख और कष्टों से मुक्ति मिलती है।

कब रखा जाएगा पौष पूर्णिमा का व्रत?


पंचांग के अनुसार, पौष माह शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि का आरंभ 13 जनवरी को सुबह में 5 बजकर 2 मिनट पर होगा और पूर्णिमा तिथि अगले दिन 14 जनवरी को सुबह 3 बजकर 56 मिनट पर समाप्त होगी। ऐसे में पूर्णिमा तिथि उदयकाल में 13 जनवरी को होने के कारण पूर्णिमा का व्रत 13 जनवरी सोमवार के दिन रखा जाएगा।

पौष पूर्णिमा का धार्मिक महत्व


पौष पूर्णिमा के दिन काशी, प्रयागराज और हरिद्वार में शाही स्नान किया जाता है। इसी के साथ इस दिन सूर्यदेव को जल अर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पौष पूर्णिमा पर सूर्य और चंद्रमा दोनों की पूजा की जाती है। ऐसा करने से व्यक्ति को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। साथ ही इस बार पौष पूर्णिमा से यानी 13 जनवरी से प्रयागराज में महाकुंभ मेला शुरु होने जा रहा है।

पौष पूर्णिमा के दिन करें ये काम


पौष पूर्णिमा के सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान कर लें। यदि आप किसी पवित्र नदी में जाकर स्नान कर सकते हैं तो उत्तम है। वरना आप घर पर ही गंगाजल पानी में डालकर स्नान कर लें। फिर व्रत का संकल्प लेकर सूर्यदेव को अर्घ्य दें। इसके बाद एक लकड़ी की चौकी पर पीले रंग के वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें। इसके बाद पूजा में धूप, दीप नैवेद्य आदि अर्पित करें और अंत में पूर्णिमा की कथा पढ़ें।

पूर्णिमा व्रत की पूजा विधि


पौष पूर्णिमा दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि कर लें। यदि संभव हो तो किसी पवित्र नदी में स्नान कर सकते हैं, वरना घर पर ही सामान्य जल में गंगाजल मिलाकर स्नान कर लें। इसके बाद सूर्य देव को जल अर्पित करें और ॐ घृणिः सूर्याय नमः मंभ का जप करें। इसके बाद एक चौकी पर साफ-सुथरा लाल कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें। इसके बाद पूजा में धूप, दीप नैवेद्य आदि अर्पित करें।

 


 

In which month Khichdi is celebrated?

 



  • सूर्य संक्रांति में मकर सक्रांति का महत्व ही अधिक माना गया है।

  •  माघ माह में कृष्ण पंचमी को मकर सक्रांति देश के लगभग सभी राज्यों में अलग-अलग सांस्कृतिक रूपों में मनाई जाती है। 

  • इस बार 14 जनवरी 2025 को मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाएगा । 

  • खिचड़ी जनवरी महीने में मनाया जाता है |

  • 2025 की खिचड़ी 14 जनवरी को है | 

 

 

Story of Puranas

 ऊँ हनुमते नमः 



पुराणों में इस कथा का उल्लेख है कि अश्वमेघ यज्ञ के पूर्ण होने के पश्चात श्री राम ने एक बड़ी सभा का आयोजन किया जिसमें सभी राजाओं को उसमें आमंत्रित किया गया। 


सभा में आए नारद जी के भड़काने पर राजा ययाति ने भरी सभा में ऋषि विश्वामित्र को छोड़कर सभी को प्रणाम किया तो ऋषि विश्वामित्र गुस्से से भर उठे और उन्होंने राम से कहा कि अगर सूर्यास्त से पहले श्रीराम ने उक्त राजा को मृत्यु दंड नहीं दिया तो वो राम को श्राप दे देंगे। 


श्राप से भयभीत होकर श्रीराम ने उस राजा को सूर्यास्त से पहले मारने का प्रण ले लिया।


श्रीराम के प्रण की खबर पाते ही राजा ययाति भागा-भागा नारद जी के पास गया तो उन्होने उसे माँ अन्जनि के पास जाने को कहा तब वह हनुमान जी की माता अंजनी के पास गया और पूरी बात बताए बिना उनसे प्राण रक्षा का वचन मांगा। 


माता अंजनी ने हनुमान जी को राजा ययाति की जान बचाने का आदेश दिया। हनुमान जी ने श्रीराम की कसम खाकर कहा कि कोई भी राजा का बाल भी बांका नहीं कर पाएगा। 


लेकिन जब राजा ने बताया कि श्रीराम ने ही उन्हें मारने का प्रण किया है तो हनुमान धर्म संकट में फंस गए। हनुमान के सामने धर्म संकट खड़ा हो गया कि वो राजा के प्राण कैसे बचाएं। 


अगर राजा को मौत मिलती है तो माता का दिया हुआ वचन पूरा नहीं हो पाएगा। अगर राजा को बचाया तो श्री राम का प्रण पूरा नहीं हो पाएगा और उन्हें शाप मिलेगा।


उलझन में फंसे हनुमान जी को एक युक्ति सूझी उन्होने ययाति से सरयू तट पर जाकर राम नाम जपने के लिए कहा और स्वयं सूक्ष्म रूप में राजा के पीछे छिप गए। 


जब श्री राम राजा ययाति को खोजते सरयू तट पर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि राजा ययाति राम-राम जप रहा है ! राम जी ने सोचा,अरे ! ये तो मेरा भक्त है, मैं कैसे इस पर बाण चला सकता हूँ। 


श्री राम महल को लौट गए और विश्वामित्र से अपनी दुविधा कही विश्वामित्र अपनी बात पर अड़े रहे और श्रीराम को फिर से राजा के प्राण लेने के लिए सरयू तट पर लौटना पड़ा।


सारा राज्य देख रहा था कि कैसे श्रीराम दुविधा में फंसे हैं। एक तरफ राजा राम नाम जप रहा है और श्रीराम अपने ही एक भक्त को मारने के लिए बाध्य हैं। 


सभी सोच रहे थे कि ऐसे वक्त में हनुमानजी  को श्रीराम के साथ होना चाहिए था। लेकिन हनुमान जी थे कहाँ, वो तो अपने ही आराध्य के विरुद्ध सूक्ष्म रूप से एक धर्मयुद्ध का संचालन कर रहे थे। 


हनुमान जानते थे कि राम-नाम जपते हु‌ए राजा को कोई भी नहीं मार सकता, खुद मर्यादा पुरुषोत्तम राम भी नहीं।


राम जी जब फिर से सरयू तट लौटे तो राजा को मारने के लिए शक्ति बाण निकाला लेकिन तब तक राजा हनुमान जी के कहने पर सिया-राम सिया-राम जपने लगा। 


राम जी जानते थे कि सिया-राम जपने वाले पर शक्तिबाण असर नहीं करता वो बेबस हो गए और महल को लौट पड़े। उधर विश्वामित्र उन्हें लौटा देखकर श्राप देने को उतारू हो गए और राम को फिर सरयू तट पर जाना पड़ा। 


इस बार राजा हनुमान जी के इशारे पर जय‌ सियाराम जय-जय हनुमान गा रहा था राम ने सोचा कि मेरे नाम के साथ-साथ ये राजा , शक्ति और भक्ति की जय बोल रहा है ऐसे में मेरा कोई अस्त्र इसे नही मार पाएगा।

इस संकट को देखकर श्रीराम को मूर्छा आने लगी तो अयोध्या के साध‌ु संतों में खलबली मच गई।


तब ऋषि व‌शिष्ठ ने ऋषि विश्वामित्र को सलाह दी कि राम को इस तरह संकट में नहीं डालना चाहिए। 

उन्होंने कहा कि राम चाह कर भी राम-नाम जपने वाले को नहीं मार सकते क्योंकि जो बल राम के नाम में है वो स्वंय श्रीराम में भी नहीं है संकट बढ़ता देख कर ऋषि विश्वामित्र ने राम को संभाला और अपने वचन से मुक्त कर दिया। 


मामला संभलते देखकर राजा के पीछे छिपे हनुमान वापस अपने रूप में आ गए और श्रीराम जी को प्रणाम किया।


तब श्रीराम जी ने कहा कि हनुमान तुमने इस प्रसंग से निश्चित किया है कि भक्त की शक्ति हमेशा आराध्य की ताकत बनी है और सच्चा भक्त हमेशा भगवान से बड़ा ही रहेगा।


राम नाम की ज्योतिका,भरती हृदय प्रकाश

राम भक्त की लाज को, हरपल रहते संग ।


!!  जय श्री राम !!



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Types Of Chanting

 जप के प्रकार और कौन से जप से क्या होता है जानिए...!!!


जप के अनेक प्रकार हैं। उन सबको समझ लें तो एक जपयोग में ही सब साधन आ जाते हैं। परमार्थ साधन के कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग और राजयोग ये चार बड़े विभाग हैं। जपयोग में इन चारों का अंतर्भाव हो जाता है। 


जप के कुछ मुख्य प्रकार ये हैं- 

1. नित्य जप, 

2. नैमित्तिक जप, 

3. काम्य जप, 

4. निषिद्ध जप, 

5. प्रायश्चित जप, 

6. अचल जप, 

7. चल जप, 

8. वाचिक जप, 

9. उपांशु जप, 

10. भ्रमर जप, 

11. मानस जप, 

12. अखंड जप, 

13. अजपा जप और 

14. प्रदक्षिणा जप इत्यादि।


1. नित्य जप


प्रात:-सायं गुरु मंत्र का जो नित्य-नियमित जप किया जाता है, वह नित्य जप है। यह जप जपयोगी को नित्य ही करना चाहिए। आपातकाल में, यात्रा में अथवा बीमारी की अवस्‍था में, जब स्नान भी नहीं कर सकते, तब भी हाथ, पैर और मुंह धोकर कम से कम कुछ जप तो अवश्य कर ही लेना चाहिए, जैसे झाड़ना, बुहारना, बर्तन मलना और कपड़े धोना रोज का ही काम है, वैसे ही नित्य कर्म भी नित्य ही होना चाहिए। उससे नित्य दोष दूर होते हैं, जप का अभ्यास बढ़ता है, आनंद बढ़ता जाता है और चित्त शुद्ध होता जाता है और धर्म विचार स्फुरने लगते हैं। और जप संख्या ज्यों-ज्यों बढ़ती है, त्यों-त्यों ईश्वरी कृपा अनुभूत होने लगती और अपनी निष्ठा दृढ़ होती जाती है।


2. नैमित्तिक जप


किसी निमित्त से जो जप होता है, वह नैमित्तिक जप है। देव-पितरों के संबंध में कोई हो, तब यह जप किया जाता है। सप्ताह में अपने इष्ट का एक न एक बार होता ही है। उस दिन तथा एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या आदि पर्व दिनों में और महाएकादशी, महाशिवरात्रि, श्री रामनवमी, श्री कृष्णाष्टमी, श्री दुर्गानवरात्र, श्री गणेश चतुर्थी, श्री रथ सप्तमी आदि शुभ दिनों में तथा ग्रहणादि पर्वों पर एकांत स्थान में बैठकर अधिक अतिरिक्त जप करना चाहिए। इससे पुण्य-संग्रह बढ़ता है और पाप का नाश होकर सत्यगुण की वृद्धि होती है और ज्ञान सुलभ होता है। यह जप रात में एकांत में करने से दृष्टांत भी होते हैं। 'न देवतोषणं व्यर्थम'- देव को प्रसन्न करना कभी व्यर्थ नहीं होता, यही मंत्रशास्त्र का कहना है। 


इष्टकाल में इसकी सफलता आप ही होती है। पितरों के लिए किया हुआ जप उनके सुख और सद्गति का कारण होता है और उनसे आशीर्वाद मिलते हैं। हमारा उनकी कोख से जन्म लेना भी इस प्रकार चरितार्थ हो जाता है। जिसको उद्देश्य करके संकल्पपूर्वक जो जप किया जाता है, वह उसी को प्राप्त होता है, यह मंत्रशास्त्र का सिद्धांत है। इस प्रकार पुण्य जोड़कर वह पितरों को पहुंचाया जा सकता है। इससे उनके ऋण से मुक्ति मिल सकती है। इसलिए कव्य कर्म के प्रसंग में और पितृपक्ष में भी यह जप अवश्य करना चाहिए। गुरु मंत्र से हव्यकर्म भी होता है।


3. काम्य जप


किसी कामना की सिद्धि के लिए जो जप किया जाता है, उसे काम्य जप कहते हैं। यह काम्य कर्म जैसा है, मोक्ष चाहने वाले के काम का नहीं है। आर्त, अर्थार्थी, कामकामी लोगों के लिए उपयोगी है। इसके साधन में पवित्रता, नियमों का पूर्ण पालन, सावधानता, जागरूकता, धैर्य, निरलसता, मनोनिग्रह, इन्द्रिय निग्रह, वाक् संयम, मिताहार, मितशयन, ब्रह्मचर्य इन सबका होना अत्यंत ही आवश्यक है। योग्य गुरु से योग्य समय में लिया हुआ योग्य मंत्र हो, विधिपूर्वक जप हो, मन की एकाग्रता हो, दक्षिणा दे, भोजन कराएं, हवन करें, इस सांगता के साथ अनुष्ठान हो तो साधक की कामना अवश्य पूर्ण होती है।

इसमें कोई गड़बड़ हो तो मंत्र सिद्ध नहीं हो सकता। काम्य जप करने के अनेक मंत्र हैं। जप से पुण्य संग्रह तो होता है, पर भोग से उसका क्षय भी होता है। इसलिए प्राज्ञ पुरुष इसे अच्‍छा नहीं समझते। परंतु सभी साधक समान नहीं होते। कुछ ऐसे भी कनिष्ठ साधक होते ही हैं, जो शुद्ध मोक्ष के अतिरिक्त अन्य धर्माविरुद्ध कामनाएं भी पूरी करना चाहते हैं। क्षुद्र देवताओं और क्षुद्र साधनों के पीछे पड़कर अपनी भयंकर हानि कर लेने की अपेक्षा वे अपने इष्ट मंत्र का काम्य जप करके चित्त को शांत करें और परमार्थ प्रवण हों, यह अधिक अच्छा है।


4. निषिद्ध जप


मनमाने ढंग से अविधिपूर्वक अनियम जप जपने को निषिद्ध जप कहते हैं। निषिद्ध कर्म की तरह यह बहुत बुरा है। मंत्र का शुद्ध न होना, अपवित्र मनुष्य से मंत्र लेना, देवता कोई और मंत्र कोई और ही, अनेक मंत्रों को एकसाथ अविधिपूर्वक जपना, मंत्र का अर्थ और विधि न जानना, श्रद्धा का न होना, देवताराधन के बिना ही जप करना, किसी प्रकार का भी संयम न रखना- ये सब निषिद्ध जप के लक्षण हैं। ऐसा निषिद्ध जप कोई न करे, उससे लाभ होने के बदले प्राय: हानि ही हुआ करती है।


5. प्रायश्चित जप

 

 अपने हाथ से अनजान से कोई दोष या प्रमाद हो जाए तो उस दुरित-नाश के लिए जो जप किया जाता है, वह प्रायश्चित जप है। प्रायश्चित कर्म के सदृश है और आवश्यक है। मनुष्य के मन की सहज गति अधोगति की ओर है और इससे उसके हाथों अनेक प्रमाद हो सकते हैं। यदि इन दोषों का परिमार्जन न हो तो अशुभ कर्मों का संचित निर्माण होकर मनुष्य को अनेक दु:ख भोगने पड़ते हैं और उर्वरित संचित प्रारब्ध बनकर भावी दु:खों की सृष्टि करता है। पापों के नाश के लिए शास्त्र में जो उपाय बताए गए हैं, उनको करना इस समय इतना कठिन हो गया है कि प्राय: असंभव ही कह सकते हैं। इसलिए ऐसे जो कोई हों, वे यदि संकल्पपूर्वक यह जप करें तो विमलात्मा बन सकते हैं।

 

मनुष्य से नित्य ही अनेक प्रकार के दोष हो जाते हैं। यह मानव स्वभाव है। इसलिए नित्य ही उन दोषों को नष्ट करना मनुष्य का कर्तव्य ही है। नित्य जप के साथ यह जप भी हुआ करे। अल्पदोष के लिए अल्प और अधिक दोष के लिए अधिक जप करना चाहिए। नित्य का नियम करके चलाना कठिन मालूम हो तो सप्ताह में एक ही दिन सही, यह काम करना चाहिए। प्रात:काल में पहले गो‍मूत्र प्राशन करें, तब गंगाजी में या जो तीर्थ प्राप्त हो उसमें स्नान करें। यह भी न हो तो 'गंगा गंगेति' मंत्र कहते हुए स्नान करें और भस्म-चंदनादि लगाकर देव, गुरु, द्विज आदि के दर्शन करें। अश्वत्थ, गौ आदि की परिक्रमा करें। केवल तुलसी दल-तीर्थ पान करके उपवास करें और मन को एकाग्र करके संकल्पपूर्वक अपने मंत्र का जप करें। इससे पवित्रता बढ़ेगी और मन आनंद से झूमने लगेगा। जब ऐसा हो, तब समझें कि अब सब पाप भस्म हो गए। दोष के हिसाब से जप संख्या निश्चित करें और वह संख्‍या पूरी करें।

 

6. अचल जप


यह जप करने के लिए आसन, गोमुखी आदि साहित्य और व्यावहारिक और मानसिक स्वास्थ्य होना चाहिए। इस जप से अपने अंदर जो गुप्त शक्तियां हैं, वे जागकर विकसित होती हैं और परोपकार में उनका उपयोग करते बनता है। इसमें इच्छाशक्ति के साथ-साथ पुण्य संग्रह बढ़ता जाता है। इस जप के लिए व्याघ्राम्बर अथवा मृगाजिन, माला और गोमुखी होनी चाहिए। स्नानादि करके आसन पर बैठे, देश-काल का स्मरण करके दिग्बंध करें और तब जप आरंभ करें।

 

अमुक मंत्र का अमुक संख्या जप होना चाहिए और नित्य इतना होना चाहिए, इस प्रकार का नियम इस विषय में रहता है, सो समझ लेना चाहिए और नित्य उतना जप एकाग्रतापूर्वक करना चाहिए। जप निश्चित संख्‍या से कभी कम न हो। जप करते हुए बीच में ही आसन पर से उठना या किसी से बात करना ठीक नहीं, उतने समय तक चित्त की और शरीर की स्थिरता और मौन साधे रहना चाहिए। इस प्रकार नित्य करके जप की पूर्ण संख्या पूरी करनी चाहिए। यह चर्या बीच में कहीं खंडित न हो इसके लिए स्वास्थ्य होना चाहिए इसलिए आहार-विहार संयमित हों। एक स्‍थान पर बैठ निश्चित समय में निश्चित जप संख्‍या एकाग्र होकर पूरी करके देवता को वश करना ही इस जप का मुख्य लक्षण है। इस काम में विघ्न तो होते ही हैं, पर धैर्य से उन्हें पार कर जाना चाहिए। इस जप से अपार आध्यात्मिक शक्ति संचित होती है। भस्म, जल अभिमंत्रित कर देने से वह उपकारी होता है, यह बात अनुभवसिद्ध है।

 

7. चल जप


यह जप नाम स्मरण जैसा है। प्रसिद्ध वामन प‍डित के कथनानुसार 'आते-जाते, उठते-बैठते, करते-धरते, देते-लेते, मुख से अन्न खाते, सोते-जागते, रतिसुख भोगते, सदा सर्वदा लोकलाज छोड़कर भगच्चिंतन करने' की जो विधि है, वही इस जप की है। अंतर यही कि भगवन्नाम के स्थान में अपने मंत्र का जप करना है। यह जप कोई भी कर सकता है। इसमें कोई बंधन, नियम या प्रतिबंध नहीं है। अन्य जप करने वाले भी इसे कर सकते हैं। इससे वाचा शुद्ध होती है और वाक्-शक्ति प्राप्त होती है। पर इस जप को करने वाला कभी मिथ्या भाषण न करे; निंदा, कठोर भाषण, जली-कटी सुनाना, अधिक बोलना, इन दोषों से बराबर बचता रहे। इससे बड़ी शक्ति संचित होती है। इस जप से समय सार्थक होता है, मन प्रसन्न रहता है, संकट, कष्ट, दु:ख, आघात, उत्पात, अपघात आदि का मन पर कोई असर नहीं होता।

 

जप करने वाला सदा सुरक्षित रहता है। सुखपूर्वक संसार-यात्रा पूरी करके अनायास परमार्थ को प्राप्त होता है। उसकी उत्तम गति होती है, उसके सब कर्म यज्ञमय होते हैं और इस कारण वह कर्मबंध से छूट जाता है। मन निर्विषय हो जाता है। ईश-सान्निध्य बढ़ता है और साधक निर्भय होता है। उसका योग-क्षेम भगवान वहन करते हैं। वह मन से ईश्वर के समीप और तन से संसार में रहता है। इस जप के लिए यों तो माला की कोई आवश्यकता नहीं है, पर कुछ लोग छोटी-सी 'सुमरिनी' रखते हैं इसलिए कि कहीं विस्मरण होने का-सा मौका आ जाए तो वहां यह सु‍मरिनी विस्मरण न होने देगी। सुमरिनी छोटी होनी चाहिए, वस्त्र में छिपी रहनी चाहिए, किसी को दिखाई न दे। सुमिरन करते हुए होंठ भी न हिेलें। सब काम चुपचाप होना चाहिए, किसी को कुछ मालूम न हो।


8. वा‍चिक जप

 

 जिस जप का इतने जोर से उच्चारण होता है कि दूसरे भी सुन सकें, उसे वाचिक जप कहते हैं। बहुतों के विचार में यह जप निम्न कोटि का है और इससे कुछ लाभ नहीं है। परंतु विचार और अनुभव से यह कहा जा सकता है कि यह जप भी अच्‍छा है। विधि यज्ञ की अपेक्षा वाचिक जप दस गुना श्रेष्ठ है, यह स्वयं मनु महाराज ने ही कहा है। जपयोगी के लिए पहले यह जप सुगम होता है। आगे के जप क्रमसाध्य और अभ्याससाध्य हैं। इस जप से कुछ यौगिक लाभ होते हैं।
 
सूक्ष्म शरीर में जो षट्चक्र हैं उनमें कुछ वर्णबीज होते हैं। महत्वपूर्ण मंत्रों में उनका विनियोग रहता है। इस विषय को विद्वान और अनुभवी जपयोगियों से जानकर भावनापूर्वक जप करने से वर्णबीज शक्तियां जाग उठती हैं। इस जप से वाक्-सिद्धि तो होती ही है, उसके शब्दों का बड़ा महत्व होता है। वे शब्द कभी व्यर्थ नहीं होते। अन्य लोग उसकी आज्ञा का पालन करते हैं। जितना जप हुआ रहता है, उसी हिसाब से यह अनुभव भी प्राप्त होता है। एक वाक्-शक्ति भी सिद्ध हो जाए तो उससे संसार के बड़े-बड़े काम हो सकते हैं। कारण, संसार के बहुत से काम वाणी से ही होते हैं। वाक्-शक्ति संसार की समूची शक्ति का तीसरा हिस्सा है। यह जप प्रपंच और परमार्थ दोनों के लिए उपयोगी है।

 

9. उपांशु उपाय


वाचिक जप के बाद का यह जप है। इस जप में होंठ हिलते हैं और मुंह में ही उच्चारण होता है, स्वयं ही सुन सकते हैं, बाहर और किसी को सुनाई नहीं देता। विधियज्ञ की अपेक्षा मनु महाराज कहते हैं कि यह जप सौ गुना श्रेष्ठ है। इससे मन को मूर्च्छना होने लगती है, एकाग्रता आरंभ होती है, वृत्तियां अंतर्मुख होने लगती हैं और वाचिक जप के जो-जो लाभ होते हैं, वे सब इसमें होते हैं। इससे अपने अंग-प्रत्यंग में उष्णता बढ़ती हुई प्रतीत होती है। यही तप का तेज है। इस जप में दृष्टि अर्धोन्मीलित रहती है। एक नशा-सा आता है और मनोवृत्तियां कुंठित-सी होती हैं, यही मूर्च्छना है। इसके द्वारा साधक क्रमश: स्थूल से सूक्ष्म में प्रवेश करता है। वाणी के सहज गुण प्रकट होते हैं। मंत्र का प्रत्येक उच्चार मस्तक पर कुछ असर करता-सा मालूम होता है- भालप्रदेश और ललाट में वेदनाएं अनुभूत होती हैं। अभ्यास से पीछे स्थिरता आ जाती है।

 

10. भ्रमर जप


भ्रमर के गुंजार की तरह गुनगुनाते हुए जो जप होता है, वह भ्रमर जप कहाता है। किसी को यह जप करते, देखते-सुनने से इसका अभ्यास जल्दी हो जाता है। इसमें होंठ नहीं हिलते, जीभ हिलाने का भी कोई विशेष कारण नहीं। आंखें झपी रखनी पड़ती हैं। भ्रूमध्य की ओर यह गुंजार होता हुआ अनुभूत होता है। यह जप बड़े ही महत्व का है। इसमें प्राण सूक्ष्म होता जाता है और स्वाभाविक कुम्भक होने लगता है। प्राणगति धीर-धीमी होती है, पूरक जल्दी होता है और रेचक धीरे-धीरे होने लगता है। पूरक करने पर गुंजार व आरंभ होता है और अभ्यास से एक ही पूरक में अनेक बार मंत्रावृत्ति हो जाती है।
 
इसमें मंत्रोच्चार नहीं करना पड़ता। वंशी के बजने के समान प्राणवायु की सहायता से ध्यानपूर्वक मंत्रावृत्ति करनी होती है। इस जप को करते हुए प्राणवायु से ह्रस्व-दीर्घ कंपन हुआ करते हैं और आधार चक्र से लेकर आज्ञा चक्र तक उनका कार्य अल्पाधिक रूप से क्रमश: होने लगता है। ये सब चक्र इससे जाग उठते हैं। शरीर पुलकित होता है। नाभि, हृदय, कंठ, तालु और भ्रूमध्य में उत्तरोत्तर अधिकाधिक कार्य होने लगता है। सबसे अधिक परिणाम भ्रूमध्यभाग में होता है। वहां के चक्र के भेदन में इससे बड़ी सहायता मिलती है। मस्तिष्क में भारीपन नहीं रहता। उसकी सब शक्तियां जाग उठती हैं। स्मरण शक्ति बढ़ती है। प्राक्तन स्मृति जागती है। मस्तक, भालप्रदेश और ललाट में उष्णता बहुत बढ़ती है। तेजस परमाणु अधिक तेजस्वी होते हैं और साधक को आंतरिक प्रकाश मिलता है। बुद्धि का बल बढ़ता है। मनोवृत्तियां मूर्च्छित हो जाती हैं। नागस्वर बजाने से सांप की जो हालत होती है, वही इस गुंजार से मनोवृत्तियों की होती है। उस नाद में मन स्वभाव से ही लीन हो जाता है और तब नादानुसंधान का जो बड़ा काम है, वह सुलभ हो जाता है।

 

11. मानस जप


यह तो जप का प्राण ही है। इससे साधक का मन आनंदमय हो जाता है। इसमें मंत्र का उच्चार नहीं करना होता है। मन से ही मंत्रावृत्ति करनी होती है। नेत्र बंद रहते हैं। मंत्रार्थ का चिंतन ही इसमें मुख्‍य है। श्री मनु महाराज ने कहा है कि विधियज्ञ की अपेक्षा यह जप हजार गुना श्रेष्ठ है। भिन्न मंत्रों के भिन्न-भिन्न अक्षरार्थ और कूटार्थ होते हैं। उन्हें जानने से इष्टदेव के स्वरूप का बोध होता है। पहले इष्टदेव का सगुण ध्यान करके यह जप किया जाता है, पीछे निर्गुण स्वरूप का ज्ञान होता है। और तब उसका ध्यान करके जप किया जाता है। नादानुसंधान के साथ-साथ यह जप करने से बहुत अधिक उपायकारी होता है। केवल नादानुसंधान या केवल जप की अपेक्षा दोनों का योग अधिक अच्‍छा है। श्रीमदाद्य शंकराचार्य नादानुसंधान की महिमा कथन करते हुए कहते हैं- 'एकाग्र मन से स्वरूप चिंतन करते हुए दाहिने कान से अनाहत ध्वनि सुनाई देती है। भेरी, मृदंग, शंख आदि आहत नाद में ही जब मन रमता है तब अनाहत मधुर नाद की महिमा क्या बखानी जाए? चित्त जैसे-जैसे विषयों से उपराम होगा, वैसे-वैसे यह अनाहत नाद अधिकाधिक सुनाई देगा। नादाभ्यंतर ज्योति में जहां मन लीन हुआ, तहां फिर इस संसार में नहीं आना होता है अर्थात मोक्ष होता है।'

 

सतत नादानुसंधान करने से मनोलय बन पड़ता है। आसन पर बैठकर, श्वासोच्छवास की क्रिया सावकाश करते हुए, अपने कान बंद करके अंतरदृष्टि करने से नाद सुनाई देता है। अभ्यास से बड़े नाद सुनाई देते हैं और उनमें मन रमता है। मंत्रार्थ का चिंतन, नाद का श्रवण और प्रकाश का अनुसंधान- ये तीन बातें साधनी पड़ती हैं। इस साधन के सिद्ध होने पर मन स्वरूप में लीन होता है, तब प्राण, नाद और प्रकाश भी लीन हो जाते हैं और अपार आनंद प्राप्त होता है।

 
12. अखंड जप

यह जप खासकर त्यागी पुरुषों के लिए है। शरीर यात्रा के लिए आवश्यक आहारादि का समय छोड़कर बाकी समय जपमय करना पड़ता है। कितना भी हो तो क्या, सतत जप से मन उचट ही जाता है, इसलिए इसमें यह विधि है कि जप से जब चित्त उचटे, तब थोड़ा समय ध्यान में लगाएं, फिर तत्वचिंतन करें और फिर जप करें। कहा है-
 
जपाच्छ्रान्त: पुनर्ध्यायेद् ध्यानाच्छ्रान्त: पुनर्जपेत्।
जपध्यानपरिश्रान्त: आत्मानं च विचारयेत्।।

 
'जप करते-करते जब थक जाएं, तब ध्यान करें। ध्यान करते-करते थकें, तब फिर जप करें और जप तथा ध्यान से थकें, तब आत्मतत्व का विचार करें।'

 

13. अजपा जप


यह सहज जप है और सावधान रहने वाले से ही बनता है। किसी भी तरह से यह जप किया जा सकता है। अनुभवी महात्माओं में यह जप देखने में आता है। इसके लिए माला का कुछ काम नहीं। श्वाछोच्छवास की क्रिया बराबर हो ही रही है, उसी के साथ मंत्रावृत्ति की जा सकती है। अभ्यास से मंत्रार्थ भावना दृढ़ हुई रहती है, सो उसका स्मरण होता है। इसी रीति से सहस्रों संख्‍या में जप होता रहता है। इस विषय में एक महात्मा कहते हैं-
 
राम हमारा जप करे, हम बैठे आराम।

 
14. प्रदक्षिणा जप

इस जप में हाथ में रुद्राक्ष या तुलसी की माला लेकर वट, औदुम्बर या पीपल-वृक्ष की अथवा ज्योतिर्लिंगादि के मंदिर की या किसी सिद्धपुरुष की, मन में ब्रह्म भावना करके, मंत्र कहते हुए परिक्रमा करनी होती है। इससे भी सिद्धि प्राप्त होती है- मनोरथ पूर्ण होता है।

 


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Annapurna Jayanti

way Of Life Karma: अन्नपूर्णा जयंती

अन्नपूर्णा जयंती देवी अन्नपूर्णा को समर्पित एक पावन पर्व है, जो हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है। देवी अन्नपूर्णा को भोजन, समृद्धि और पोषण की देवी माना जाता है। यह पर्व विशेष रूप से मार्गशीर्ष माह के पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है।

अन्नपूर्णा जयंती का महत्व:

1. देवी अन्नपूर्णा की आराधना:
देवी अन्नपूर्णा की पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में कभी अन्न का अभाव नहीं होता। यह पर्व सभी के लिए समृद्धि और संतोष का प्रतीक है।


2. भोजन का महत्व:
अन्नपूर्णा जयंती हमें अन्न और भोजन के महत्व को समझने और इसका सम्मान करने की प्रेरणा देती है।


3. धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व:
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव ने स्वयं देवी अन्नपूर्णा से भिक्षा मांगकर भोजन प्राप्त किया था। इससे यह संदेश मिलता है कि संसार में अन्न का महत्व सभी के लिए समान है।

4. अन्नपूर्णा जयंती के दिन अन्न का विशेष महत्व होता है। इस दिन लोग उपवास करते हैं और शाम को अन्नपूर्णा देवी को भोग लगाते हैं।

 5. समृद्धि का आशीर्वाद:- माना जाता है कि अन्नपूर्णा देवी की कृपा से घर में हमेशा सुख-समृद्धि बनी रहती है।

 6. कष्टों का निवारण:- अन्नपूर्णा देवी की पूजा करने से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं।

 7- धार्मिक महत्व: अन्नपूर्णा जयंती का धार्मिक महत्व भी बहुत अधिक है। इस दिन लोग मंदिरों में जाकर पूजा-अर्चना करते हैं और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।

पूजा विधि:- 
• प्रातःकाल स्नान के बाद देवी अन्नपूर्णा की मूर्ति या चित्र के सामने दीप जलाएं।

• उन्हें अक्षत, फूल, फल, और पकवान अर्पित करें।

• अन्न का दान करना इस दिन विशेष फलदायी माना जाता है।

देवी के मंत्रों का जाप करें:- 

"ॐ अन्नपूर्णायै नमः"

भक्तगण इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों को भोजन कराते हैं।


2024 में अन्नपूर्णा जयंती की तिथि:

अन्नपूर्णा जयंती 15 दिसंबर 2024 को मनाई जाएगी।

यह दिन हमें अन्न का आदर करने और समाज के हर व्यक्ति तक भोजन पहुंचाने का संदेश देता है।

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धर्म बड़ा या ज्ञान

धर्म बड़ा या ज्ञान धर्म और ज्ञान दोनों ही जीवन के लिए अनिवार्य हैं, लेकिन धर्म (नैतिकता/कर्तव्य) को ज्ञान से बड़ा माना जाता है। क...