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Navratri fast and its scientificity: Scientific and spiritual reason behind fasting

नवरात्रि व्रत और उसकी वैज्ञानिकता: उपवास के पीछे का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक कारण



Navratri fast and its scientificity: Scientific and spiritual reason behind fasting


नवरात्रि केवल धार्मिक अनुष्ठान का समय नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि और स्वास्थ्य के लिए भी एक महत्वपूर्ण अवसर है। नवरात्रि व्रत रखने की परंपरा के पीछे गहरी आध्यात्मिक और वैज्ञानिक सोच छिपी हुई है। यह न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि स्वास्थ्य और मानसिक शांति प्राप्त करने का भी एक माध्यम है।


Spiritual significance of Navratri

नवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व: माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा का महत्व और ऊर्जा






Spiritual significance of Navratri: Importance and energy of worshipping nine forms of Maa Durga


नवरात्रि हिन्दू धर्म में एक अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक पर्व है, जो वर्ष में दो बार मनाया जाता है – चैत्र और शारदीय नवरात्रि के रूप में। यह नौ दिनों का उत्सव माँ दुर्गा के विभिन्न रूपों की आराधना का प्रतीक है और साधना, शक्ति, और आत्मशुद्धि का समय माना जाता है।


10 important things about Hinduism





हिन्दू धर्म की 10 महत्वपूर्ण बातें

10 important things about Hinduism

1) 10 ध्वनियां :


1.घंटी, 2.शंख, 3.बांसुरी, 4.वीणा, 5. मंजीरा, 6.करतल, 7.बीन (पुंगी), 8.ढोल, 9.नगाड़ा और 10.मृदंग



2) 10 कर्तव्य:-


1. संध्यावंदन, 2. व्रत, 3. तीर्थ, 4. उत्सव, 5. दान, 6. सेवा 7. संस्कार, 8. यज्ञ, 9. वेदपाठ, 10. धर्म प्रचार।


3) 10 दिशाएं :


दिशाएं 10 होती हैं जिनके नाम और क्रम इस प्रकार हैं- उर्ध्व, ईशान, पूर्व, आग्नेय, दक्षिण, नैऋत्य, पश्चिम, वायव्य, उत्तर और अधो। एक मध्य दिशा भी होती है। इस तरह कुल मिलाकर 11 दिशाएं हुईं।


4) 10 दिग्पाल :

10 दिशाओं के 10 दिग्पाल अर्थात द्वारपाल होते हैं या देवता होते हैं। उर्ध्व के ब्रह्मा, ईशान के शिव व ईश, पूर्व के इंद्र, आग्नेय के अग्नि या वह्रि, दक्षिण के यम, नैऋत्य के नऋति, पश्चिम के वरुण, वायव्य के वायु और मारुत, उत्तर के कुबेर और अधो के अनंत।


5) 10 देवीय आत्मा :


1.कामधेनु गाय, 2.गरुढ़, 3.संपाति-जटायु, 4.उच्चै:श्रवा अश्व, 5.ऐरावत हाथी, 6.शेषनाग-वासुकि, 7.रीझ मानव, 8.वानर मानव, 9.येति, 10.मकर।


6) 10 देवीय वस्तुएं :


1.कल्पवृक्ष, 2.अक्षयपात्र, 3.कर्ण के कवच कुंडल, 4.दिव्य धनुष और तरकश, 5.पारस मणि, 6.अश्वत्थामा की मणि, 7.स्यंमतक मणि, 8.पांचजन्य शंख, 9.कौस्तुभ मणि और संजीवनी बूटी।


7) 10 पवित्र पेय :


1.चरणामृत, 2.पंचामृत, 3.पंचगव्य, 4.सोमरस, 5.अमृत, 6.तुलसी रस, 7.खीर, 9.आंवला रस


8) 10 महाविद्या :


1.काली, 2.तारा, 3.त्रिपुरसुंदरी, 4. भुवनेश्‍वरी, 5.छिन्नमस्ता, 6.त्रिपुरभैरवी, 7.धूमावती, 8.बगलामुखी, 9.मातंगी और 10.कमला।


9) 10 उत्सव :


नवसंवत्सर, मकर संक्रांति, वसंत पंचमी, पोंगल, होली, दीपावली, रामनवमी, कृष्ण जन्माष्‍टमी, महाशिवरात्री और नवरात्रि।


10) 10 बाल पुस्तकें :


1.पंचतंत्र, 2.हितोपदेश, 3.जातक कथाएं, 4.उपनिषद कथाएं, 5.वेताल पच्चिसी, 6.कथासरित्सागर, 7.सिंहासन बत्तीसी, 8.तेनालीराम, 9.शुकसप्तति, 10.बाल कहानी संग्रह।


11) 10 पूजा :


गंगा दशहरा, आंवला नवमी पूजा, वट सावित्री, तुलसी विवाह पूजा, शीतलाष्टमी, गोवर्धन पूजा, हरतालिका तिज, दुर्गा पूजा, भैरव पूजा और छठ पूजा।


12) 10 धार्मिक स्थल :


12 ज्योतिर्लिंग, 51 शक्तिपीठ, 4 धाम, 7 पुरी, 7 नगरी, 4 मठ, आश्रम, 10 समाधि स्थल, 5 सरोवर, 10 पर्वत और 10 गुफाएं।


13) 10 पूजा के फूल :


आंकड़ा, गेंदा, पारिजात, चंपा, कमल, गुलाब, चमेली, गुड़हल, कनेर, और रजनीगंधा।


14) 10 धार्मिक सुगंध :


गुग्गुल, चंदन, गुलाब, केसर, कर्पूर, अष्टगंथ, गुढ़-घी, समिधा, मेहंदी, चमेली।


15)10 यम-नियम :


1.अहिंसा, 2.सत्य, 3.अस्तेय 4.ब्रह्मचर्य और 5.अपरिग्रह। 6.शौच 7.संतोष, 8.तप, 9.स्वाध्याय और 10.ईश्वर-प्रणिधान।


16)10 सिद्धांत :


1.एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति (एक ही ईश्‍वर है दूसरा नहीं), 2.आत्मा अमर है,
3.पुनर्जन्म होता है,
4.मोक्ष ही जीवन का लक्ष्य है,
5.कर्म का प्रभाव होता है, जिसमें से ‍कुछ प्रारब्ध रूप में होते हैं इसीलिए कर्म ही भाग्य है,
6.संस्कारबद्ध जीवन ही जीवन है,
7.ब्रह्मांड अनित्य और परिवर्तनशील है,
8.संध्यावंदन-ध्यान ही सत्य है,
9.वेदपाठ और यज्ञकर्म ही धर्म है,
10.दान ही पुण्य है..!!


Maghi Purnima Editorial

WOLK :- माघी पूर्णिमा सनातन परंपरा, आध्यात्मिकता और पुण्य का संगम



हिंदू धर्म में माघी पूर्णिमा का विशेष महत्व है। यह दिन धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र माना जाता है। माघ माह की पूर्णिमा को होने वाला यह पर्व मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है और पवित्र स्नान, दान, पूजा-अर्चना और तपस्या के लिए उत्तम माना जाता है। माघ मास को स्वयं भगवान विष्णु का प्रिय माह कहा गया है और इस मास में गंगा, यमुना तथा अन्य पवित्र नदियों में स्नान करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। विशेष रूप से प्रयागराज में गंगा-यमुना के संगम पर आयोजित माघ मेले और कल्पवासियों के लिए यह तिथि विशेष रूप से महत्वपूर्ण होती है।


माघी पूर्णिमा का महत्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी है। यह पर्व लोगों को आत्मशुद्धि, परोपकार, सहिष्णुता और दान-पुण्य का संदेश देता है। इस दिन भारत में अनेक स्थानों पर भव्य मेलों और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है।

निघंटु


यह रहा निघंटु से जुड़ा एक प्राचीन संस्कृत पांडुलिपि का चित्र, जो निघंटु के ऐतिहासिक और आयुर्वेदिक संदर्भों को दर्शाता है।

Way of Life Karma : Nighaṇṭu

"निघंटु" एक प्राचीन संस्कृत शब्दकोश या ग्रंथ है, जिसमें शब्दों के अर्थ, उनकी उत्पत्ति, विशेषताएँ और विभिन्न संदर्भों में उनके प्रयोग का वर्णन होता है। निघंटु में विशेष रूप से वैदिक शब्दों, वनस्पतियों, औषधियों और अन्य प्राकृतिक तत्वों के नामों का विवरण दिया गया है। इसे आयुर्वेद, भाषा विज्ञान और वैदिक अध्ययन में एक महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।

 

निघंटु का परिचय

"निघंटु" का सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध ग्रंथ है "ऋग्वेद निघंटु"। इसे आयुर्वेदाचार्य पाणिनि से पहले संकलित किया गया माना जाता है। निघंटु का मुख्य उद्देश्य वैदिक शब्दों और उनके उपयोग का संकलन करना था ताकि विद्वान और छात्र वैदिक साहित्य का सही अर्थ और संदर्भ में अध्ययन कर सकें।

 

यास्क और निरुक्त

निघंटु की व्याख्या और इसका विश्लेषण करने का कार्य महर्षि यास्क ने अपने ग्रंथ "निरुक्त" में किया था। यास्क ने निघंटु को समझाने के लिए निरुक्त लिखा, जिसमें उन्होंने शब्दों के अर्थ, उनके भाषाई संदर्भ, और व्युत्पत्ति पर विस्तार से चर्चा की। यास्क के अनुसार, निघंटु में संकलित शब्दों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया है:

  1. नैमित्तिक: जो शब्द प्राकृतिक घटनाओं या कारणों से जुड़े हैं।
  2. अर्थवाचक: जिन शब्दों का स्पष्ट और सीधे अर्थ होता है।
  3. व्युत्पन्न: जिन शब्दों का अर्थ उनके आधार या व्युत्पत्ति से समझा जा सकता है।

 

निघंटु का महत्व

  • आयुर्वेद और वनस्पति विज्ञान में योगदान: निघंटु में कई औषधियों, वनस्पतियों और खनिजों के नाम और उनके गुणों का उल्लेख मिलता है। यह आयुर्वेद में जड़ी-बूटियों की पहचान के लिए सहायक होता है।
  • भाषा विज्ञान में आधार: निघंटु में प्राचीन वैदिक शब्दों का अर्थ और व्युत्पत्ति बताई गई है, जो संस्कृत भाषा और वैदिक अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण है।
  • धर्म और दर्शन में उपयोग: निघंटु में शब्दों के अर्थ का विवेचन धार्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से किया गया है, जो वेदों के गूढ़ अर्थ को समझने में सहायक होता है।

 

निष्कर्ष

निघंटु केवल एक शब्दकोश नहीं है, बल्कि यह प्राचीन भारतीय ज्ञान और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह वेदों के अध्ययन के लिए एक आधारभूत ग्रंथ है, जो विद्वानों को वैदिक शब्दों के सही अर्थ और उनके उपयोग को समझने में मदद करता है।

 

 

हिंदू धर्म और विज्ञान: एक गहरा संबंध

 

 


 Hinduism and Science: A Deep Connection


हिंदू धर्म और विज्ञान, दोनों ही सत्य की खोज में लगे हैं, बस अलग-अलग तरीकों से। हिंदू धर्म आध्यात्मिक, भौतिक, तार्किक और दर्शनीय दृष्टिकोण से सत्य को खोजता है, जब कि विज्ञान भौतिक और तार्किक दृष्टिकोण से। दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही क्षेत्रों में कई समानताएं और संभावित संबंध देखने को मिलते हैं।

 

कुछ प्रमुख बिंदु जिन पर हम विस्तार से चर्चा कर सकते हैं:-


 ब्रह्मांड की उत्पत्ति और संरचना

हिंदू धर्म:- हिंदू धर्म में ब्रह्मांड की उत्पत्ति के कई सिद्धांत हैं। ब्रह्मांड को चक्रीय रूप से विस्तार और संकुचन करने वाला माना जाता है। पुराणों में ब्रह्मांड की उत्पत्ति का वर्णन ब्रह्मा से होता है, जो सृष्टिकर्ता हैं।

विज्ञान:- बिग बैंग थ्योरी ब्रह्मांड की उत्पत्ति के बारे में  सिद्धांत है। यह सिद्धांत कहता है कि ब्रह्मांड एक अत्यंत घने और गर्म बिंदु से विस्तारित हुआ।


समानता:- दोनों ही दृष्टिकोण ब्रह्मांड की उत्पत्ति को एक बिंदु से मानते हैं, हालांकि उनकी व्याख्याएं अलग हैं।

 

 चेतना और मन

हिंदू धर्म:- हिंदू दर्शन में चेतना को ब्रह्मांड का आधार माना जाता है। योग और ध्यान जैसी प्राचीन भारतीय प्रथाएं चेतना को समझने और नियंत्रित करने के तरीके बताती हैं।

 

विज्ञान:- क्वांटम भौतिकी में चेतना की भूमिका पर काफी चर्चा होती है। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि चेतना और अवलोकन ब्रह्मांड की प्रकृति को प्रभावित करते हैं। हिंदू धर्म में भी क्वांटम भौतिकी को आप पाएंगे |


समानता:- दोनों ही क्षेत्र चेतना को ब्रह्मांड के एक महत्वपूर्ण पहलू के रूप में मानते हैं।

 

 पंचतत्व और पदार्थ

हिंदू धर्म:- हिंदू धर्म में पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) का उल्लेख है। इन तत्वों को पदार्थ के मूल घटक माना जाता है।

 

विज्ञान:- आधुनिक विज्ञान भी पदार्थ को इन पांच तत्वों के संयोजन के रूप में देखता है, हालांकि विस्तृत वर्गीकरण अलग हो सकता है।

 

समानता:-  दोनों ही दृष्टिकोण पदार्थ के मूल घटकों के बारे में समान अवधारणा रखते हैं।


कर्म और कारण-कार्य संबंध

हिंदू धर्म:- कर्म का सिद्धांत कहता है कि हमारे कर्मों का फल हमें मिलता है। यह एक कारण-कार्य संबंध स्थापित करता है।

 

विज्ञान:- कारण-कार्य का सिद्धांत विज्ञान का एक मूल सिद्धांत है। यह कहता है कि प्रत्येक घटना का एक कारण होता है।

 

समानता:- दोनों ही दृष्टिकोण कारण-कार्य के संबंध को मानते हैं, हालांकि उनके कारणों की व्याख्याएं अलग हो सकती हैं।

 

 योग और ध्यान का विज्ञान

हिंदू धर्म:- योग और ध्यान को शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है।

 

विज्ञान:- अब कई वैज्ञानिक अध्ययन योग और ध्यान के लाभों को सिद्ध कर रहे हैं। ये मस्तिष्क की संरचना और कार्यप्रणाली को प्रभावित करते हैं, तनाव कम करते हैं और प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाते हैं।

 

समानता:- विज्ञान योग और ध्यान के लाभों को वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है।

 

 कुछ अन्य समानताएं

 

अंतरिक्ष यात्रा:- पुराणों में वायुयान और अन्य उड़ने वाले यंत्रों का वर्णन मिलता है, जो आधुनिक अंतरिक्ष यात्रा के विचारों से मिलता-जुलता है।

 

परमाणु सिद्धांत:- कुछ हिंदू ग्रंथों में परमाणु के बारे में वर्णन मिलता है, जो आधुनिक परमाणु सिद्धांत से मिलता-जुलता है।

निष्कर्ष:-


हिंदू धर्म और विज्ञान, दोनों ही सत्य की खोज में लगे हैं, बस अलग-अलग तरीकों से। दोनों के बीच कई समानताएं और संभावित संबंध हैं। यह कहना गलत होगा कि विज्ञान हिंदू धर्म को सिद्ध करता है, लेकिन यह निश्चित रूप से कुछ हिंदू धार्मिक सिद्धांतों के वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है।


जनेऊ

 

 



जनेऊ का एक नाम यज्ञोपवित भी है , यज्ञोपवीत को समझने के लिए पहले यज्ञ को समझना होगा , हम इसको गीता से समझने की कोशिश करते है :- 


गीता के तीसरे अध्याय के ९ वे श्लोक में आया की यज्ञार्थ कर्म  श्री कृष्ण ने कहा की यज्ञ के निम्मित किए जाने वाले कर्मो के अतिरिक्त अन्य सभी कर्म बंधन युक्त है .. इसका अर्थ है की यज्ञ सिर्फ हवन करने को नही कहते क्योंकि वो तो सिर्फ संध्या में किया जाता है यज्ञ कोई ऐसी वस्तु है जिसे २४ घंटे किया जाए तभी बंधन मुक्त होगा अन्यथा बंधन मैं रहेगा ।


चतुर्थ अध्याय मैं यज्ञ के स्वरूप का विस्तार से वर्णन किया जिसमे कहा जिसके संपूर्ण शास्त्र सम्मत् कर्म बिना कमाना और संकल्प के होते है तथा जिसके कर्म ज्ञान रूप अग्नि के द्वारा भस्म हो गए हो वो पंडित होता है ,४/१९


 जो पुरुष समस्त कर्मो और उनके फलों मैं आसक्ति का त्याग करके संसार के आश्रय से रहित हो गया है सिर्फ परमात्मा मैं नित्य तृप्त है वह कर्मो मैं भली भांति बरतता हुआ भी वास्तव मैं कुछ नहीं करता । ४/२०

 

 जिसका अंत:करण और इन्द्रियों के सहित शरीर जीता हुआ है ओर जिसने समस्त भोग सामग्री त्याग कर दिया है ऐसा पुरुष शरीर संबंधी कर्म करता हुआ भी पाप को नहीं प्राप्त होता ४/२१

 

 जो बिना इच्छा के अपने आप प्राप्त हुए पदार्थों में सदा संतुष्ट रहता है जिसमे ईर्ष्या का सर्वथा अभाव है जो हर्ष शोक आदि द्वंदो से सर्वथा रहित है सिद्धि ओर असिद्धि मैं सम है उसको कर्म नही बांधते ४/२२

 

जिस को आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गई हो जो देहाभिमान ओर ममता से रहित हो जिसका चित्त निरंतर परमात्मा के ज्ञान मैं स्थिर हो इस केवल  यज्ञ संपादन  के लिए कर्म करने वाले मनुष्य के कर्म सर्वदा विलीन हो जाते है । ४/२३

 

 जिस यज्ञ मैं अर्पण ब्रह्म है और हवन किए जाने वाले द्रव्य भी ब्रह्म है तथा ब्रह्म रूप कर्ता के द्वारा ब्रह्म रूप अग्नि मैं आहुति देने रूप क्रिया भी ब्रह्म है उस ब्रह्म कर्म मैं स्थिर रहने वाले मनुष्य द्वारा प्राप्त किया जाने वाला फल भी ब्रह्म है ४/२४

 

दूसरे योगी जन देवता के पूजन रूप यज्ञ मैं अनुष्ठान करते है ओर अन्य योगी परब्रह्म परमात्मा रूप अग्नि अग्नि मैं अभेद दर्शन रूप यज्ञ के द्वारा आत्मा रूप यज्ञ का हवन करते है ४/२५

 

अन्य योगी जन श्रोत्र आदि समस्त इन्द्रियों को संयम रूप अग्नि में हवन करते है अन्य शब्द आदि समस्त विषयों को इंद्रिय रूप अग्नियों मैं हवन किया करते है । ४/२६

 

दूसरे योगी जन इन्द्रियों की संपूर्ण क्रियाओं को ओर प्राणों की समस्त क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित आत्म संयम रूप अग्नि मैं हवन किया करते है । ४/२७

 

कई मनुष्य द्रव्य संबंधी यज्ञ करने वाले है कितने तपस्या रूपी यज्ञ करने वाले तथा कितने योग रूपी यज्ञ और अनेकों अहिंसा आदि व्रतों से युक्त स्वाध्याय रूपी ज्ञान यज्ञ करने वाले ४/२८

 

दूसरे कितने ही योगी अपान वायु का प्राण वायु में हवन करने वाले और प्राण मैं अपान का हवन करने वाले कई नियमित आहार करने वाले प्राणायाम पारायण प्राण अपान की गति रोक कर प्राणों का प्राणों में ही हवन करने वाले ये सभी साधक यज्ञ द्वारा पापो का नाश करने वाले है ओर  यज्ञ को जानने वाले  है । ४/२९.३०

 

अंत मैं कहते है यज्ञ न करनेवाले के लिए मनुष्य लोक भी सुख दायक नही है फ़िर परलोक कैसे सुखदायक होगा ।

ओर फिर कहते है द्रव्यमय यज्ञबसे ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ है 

आखिर में १० वे अध्याय मैं कहते है सभी प्राकृत यज्ञों मैं जप यज्ञ हूं ।।

तो यज्ञ का स्पष्ट अर्थ है वो क्रिया जो परमात्मा से जोड़ती प्राप्त कराती है अन्य सभी कर्म दोष युक्त है और बंधन कारक है ।

 

यज्ञ उपवीत यज्ञोपवित का अर्थ हुआ यज्ञ के निकट रहने के लिए पहना गया संकल्प सूत्र इसे रक्षा सूत्र भी कहते है क्योंकि धर्म पे कोई भी रहे विजय उसी की होगी क्योंकि धर्म स्वयं उसकी राक्ष कर रहा है , कोई व्यक्ति जो ईमानदार होगा और सावधान होगा उसे भ्रष्टाचार के इल्जाम मैं फंसाना अत्यंत मुश्किल होता है इसलिए राखी का त्योहार प्राचीन काल मैं यज्ञोपवित बदलने का त्योहार था और जनेऊ को रक्षा सूत्र भी कहते है , काश्मीर मैं वहा की कबीर कही जाने वाली लालदेन का यज्ञोपवित संस्कार हुआ था जो की एक नागा महिला संत थी , राखी अर्थात वर्षा के बाद फिर से साधना का नव संकल्प । 

सांस भी यज्ञोंपवित है यही पवित्र है ।

इसके धारण का मंत्र स्पष्ट करता है की ये स्वांस है हर स्वांस के साथ जप यही यज्ञ है साथ मैं उत्तम गीता अनुसार उपरोक्त आचरण यही पूर्ण यज्ञ है ओर जनेऊ प्रकृति( शरीर) जीव आत्म और परमात्मा इन तीनो का योग यानी हम जिसे श्रद्धा से धारण करके हम संकल्प करे की हम अपने लक्ष्य को प्राप्त करके रहेंगे जब इसे देखेंगे तो परमेश्वर की याद आए और हम हर स्वांस पे पहरा बिठा दे की बिना ॐ के उच्चारण के भीतर न जा पाए हम सभी यज्ञ कर्म मैं लग जाए । 



यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।

आयुष्यमग्रं प्रतिमुंच शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ।।


(पारस्कर गृह्यसूत्र, कांड २/२/११)


छन्दोगानाम्:

ॐ यज्ञो पवीतमसि यज्ञस्य त्वोपवीतेनोपनह्यामि।।

यज्ञोपवित परम पवित्र है प्रजापति ने सहज ही हमे प्रदान किया है ये आयु बल ओर शुभता और तेज को बढ़ाने वाला है यज्ञ के पास ले जाने वाला है हम इसे श्रद्धा से धारण करते है ।

मेरी अल्प बुद्धि से इसका यही अर्थ मैं समझ पाया हु बाकी इसके लौकिक लाभ भी होंगे मुझे ज्ञात नही अन्य विद्वान सहायता करे तो अच्छा रहेगा । 🙏🏽

Importance of Havan with research

 

हवन का महत्व शोध के साथ



फ़्रांस के ट्रेले नामक वैज्ञानिक ने हवन पर रिसर्च की। जिसमें उन्हें पता चला की हवन मुख्यतः आम की लकड़ी पर किया जाता है। जब आम की लकड़ी जलती है तो फ़ॉर्मिक एल्डिहाइड नामक गैस उत्पन्न होती है, जो कि खतरनाक बैक्टीरिया और जीवाणुओं को मारती है तथा वातावरण को शुद्द करती है। इस रिसर्च के बाद ही वैज्ञानिकों को इस गैस और इसे बनाने का तरीका पता चला। हवन सामग्री को जलाने पर भी ये गैस उत्पन्न होती है।

टौटीक नामक वैज्ञानिक ने हवन पर की गयी अपनी रिसर्च में ये पाया की यदि आधे घंटे हवन में बैठा जाये अथवा हवन के धुएं से शरीर का सम्पर्क हो तो टाइफाइड जैसे खतरनाक रोग फ़ैलाने वाले जीवाणु भी मर जाते हैं और शरीर शुद्ध हो जाता है। हवन सामग्री को जलाने पर भी ये गैस उत्पन्न होती है।

हवन की महत्ता देखते हुए राष्ट्रीय वनस्पति अनुसन्धान संस्थान लखनऊ के वैज्ञानिकों ने भी इस पर एक रिसर्च की । क्या वाकई हवन से वातावरण शुद्द होता है और जीवाणु नाश होता है ?अथवा नही ? उन्होंने ग्रंथों  में वर्णिंत हवन सामग्री जुटाई और जलाने पर पाया कि ये विषाणु नाश करती है।

फिर उन्होंने विभिन्न प्रकार के धुएं पर भी काम किया और देखा कि सिर्फ आम की लकड़ी १ किलो जलाने से हवा में मौजूद विषाणु बहुत कम नहीं हुए । पर जैसे ही उसके ऊपर आधा किलो हवन सामग्री डाल कर जलायी गयी तो एक घंटे के भीतर ही कक्ष में मौजूद बैक्टीरिया का स्तर 94 % कम हो गया।

यही नहीं  उन्होंने आगे भी कक्ष की हवा में मौजुद जीवाणुओ का परीक्षण किया और पाया कि कक्ष के दरवाज़े खोले जाने और सारा धुआं निकल जाने के 24 घंटे बाद भी जीवाणुओं का स्तर सामान्य से 96 प्रतिशत कम था।

बार-बार परीक्षण करने पर ज्ञात हुआ कि इस एक बार के धुएं का असर एक माह तक रहा और उस कक्ष की वायु में विषाणु स्तर 30 दिन बाद भी सामान्य से बहुत कम था।

यह रिपोर्ट एथ्नोफार्माकोलोजी के शोध पत्र (resarch journal of Ethnopharmacology 2007) में भी दिसंबर २००७ में छप चुकी है।

रिपोर्ट में लिखा गया कि हवन के द्वारा न सिर्फ मनुष्य बल्कि वनस्पतियों एवं फसलों को नुकसान पहुचाने वाले बैक्टीरिया का भी नाश होता है। जिससे फसलों में रासायनिक खाद का प्रयोग कम हो सकता है ।
🛕🛕जय सत्य सनातन वैदिक धर्म की जय 🛕🛕