जनेऊ का एक नाम यज्ञोपवित भी है , यज्ञोपवीत को समझने के लिए पहले यज्ञ को समझना होगा , हम इसको गीता से समझने की कोशिश करते है :-
गीता के तीसरे अध्याय के ९ वे श्लोक में आया की यज्ञार्थ कर्म श्री कृष्ण ने कहा की यज्ञ के निम्मित किए जाने वाले कर्मो के अतिरिक्त अन्य सभी कर्म बंधन युक्त है .. इसका अर्थ है की यज्ञ सिर्फ हवन करने को नही कहते क्योंकि वो तो सिर्फ संध्या में किया जाता है यज्ञ कोई ऐसी वस्तु है जिसे २४ घंटे किया जाए तभी बंधन मुक्त होगा अन्यथा बंधन मैं रहेगा ।
चतुर्थ अध्याय मैं यज्ञ के स्वरूप का विस्तार से वर्णन किया जिसमे कहा जिसके संपूर्ण शास्त्र सम्मत् कर्म बिना कमाना और संकल्प के होते है तथा जिसके कर्म ज्ञान रूप अग्नि के द्वारा भस्म हो गए हो वो पंडित होता है ,४/१९
जो पुरुष समस्त कर्मो और उनके फलों मैं आसक्ति का त्याग करके संसार के आश्रय से रहित हो गया है सिर्फ परमात्मा मैं नित्य तृप्त है वह कर्मो मैं भली भांति बरतता हुआ भी वास्तव मैं कुछ नहीं करता । ४/२०
जिसका अंत:करण और इन्द्रियों के सहित शरीर जीता हुआ है ओर जिसने समस्त भोग सामग्री त्याग कर दिया है ऐसा पुरुष शरीर संबंधी कर्म करता हुआ भी पाप को नहीं प्राप्त होता ४/२१
जो बिना इच्छा के अपने आप प्राप्त हुए पदार्थों में सदा संतुष्ट रहता है जिसमे ईर्ष्या का सर्वथा अभाव है जो हर्ष शोक आदि द्वंदो से सर्वथा रहित है सिद्धि ओर असिद्धि मैं सम है उसको कर्म नही बांधते ४/२२
जिस को आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गई हो जो देहाभिमान ओर ममता से रहित हो जिसका चित्त निरंतर परमात्मा के ज्ञान मैं स्थिर हो इस केवल यज्ञ संपादन के लिए कर्म करने वाले मनुष्य के कर्म सर्वदा विलीन हो जाते है । ४/२३
जिस यज्ञ मैं अर्पण ब्रह्म है और हवन किए जाने वाले द्रव्य भी ब्रह्म है तथा ब्रह्म रूप कर्ता के द्वारा ब्रह्म रूप अग्नि मैं आहुति देने रूप क्रिया भी ब्रह्म है उस ब्रह्म कर्म मैं स्थिर रहने वाले मनुष्य द्वारा प्राप्त किया जाने वाला फल भी ब्रह्म है ४/२४
दूसरे योगी जन देवता के पूजन रूप यज्ञ मैं अनुष्ठान करते है ओर अन्य योगी परब्रह्म परमात्मा रूप अग्नि अग्नि मैं अभेद दर्शन रूप यज्ञ के द्वारा आत्मा रूप यज्ञ का हवन करते है ४/२५
अन्य योगी जन श्रोत्र आदि समस्त इन्द्रियों को संयम रूप अग्नि में हवन करते है अन्य शब्द आदि समस्त विषयों को इंद्रिय रूप अग्नियों मैं हवन किया करते है । ४/२६
दूसरे योगी जन इन्द्रियों की संपूर्ण क्रियाओं को ओर प्राणों की समस्त क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित आत्म संयम रूप अग्नि मैं हवन किया करते है । ४/२७
कई मनुष्य द्रव्य संबंधी यज्ञ करने वाले है कितने तपस्या रूपी यज्ञ करने वाले तथा कितने योग रूपी यज्ञ और अनेकों अहिंसा आदि व्रतों से युक्त स्वाध्याय रूपी ज्ञान यज्ञ करने वाले ४/२८
दूसरे कितने ही योगी अपान वायु का प्राण वायु में हवन करने वाले और प्राण मैं अपान का हवन करने वाले कई नियमित आहार करने वाले प्राणायाम पारायण प्राण अपान की गति रोक कर प्राणों का प्राणों में ही हवन करने वाले ये सभी साधक यज्ञ द्वारा पापो का नाश करने वाले है ओर यज्ञ को जानने वाले है । ४/२९.३०
अंत मैं कहते है यज्ञ न करनेवाले के लिए मनुष्य लोक भी सुख दायक नही है फ़िर परलोक कैसे सुखदायक होगा ।
ओर फिर कहते है द्रव्यमय यज्ञबसे ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ है
आखिर में १० वे अध्याय मैं कहते है सभी प्राकृत यज्ञों मैं जप यज्ञ हूं ।।
तो यज्ञ का स्पष्ट अर्थ है वो क्रिया जो परमात्मा से जोड़ती प्राप्त कराती है अन्य सभी कर्म दोष युक्त है और बंधन कारक है ।
यज्ञ उपवीत यज्ञोपवित का अर्थ हुआ यज्ञ के निकट रहने के लिए पहना गया संकल्प सूत्र इसे रक्षा सूत्र भी कहते है क्योंकि धर्म पे कोई भी रहे विजय उसी की होगी क्योंकि धर्म स्वयं उसकी राक्ष कर रहा है , कोई व्यक्ति जो ईमानदार होगा और सावधान होगा उसे भ्रष्टाचार के इल्जाम मैं फंसाना अत्यंत मुश्किल होता है इसलिए राखी का त्योहार प्राचीन काल मैं यज्ञोपवित बदलने का त्योहार था और जनेऊ को रक्षा सूत्र भी कहते है , काश्मीर मैं वहा की कबीर कही जाने वाली लालदेन का यज्ञोपवित संस्कार हुआ था जो की एक नागा महिला संत थी , राखी अर्थात वर्षा के बाद फिर से साधना का नव संकल्प ।
सांस भी यज्ञोंपवित है यही पवित्र है ।
इसके धारण का मंत्र स्पष्ट करता है की ये स्वांस है हर स्वांस के साथ जप यही यज्ञ है साथ मैं उत्तम गीता अनुसार उपरोक्त आचरण यही पूर्ण यज्ञ है ओर जनेऊ प्रकृति( शरीर) जीव आत्म और परमात्मा इन तीनो का योग यानी हम जिसे श्रद्धा से धारण करके हम संकल्प करे की हम अपने लक्ष्य को प्राप्त करके रहेंगे जब इसे देखेंगे तो परमेश्वर की याद आए और हम हर स्वांस पे पहरा बिठा दे की बिना ॐ के उच्चारण के भीतर न जा पाए हम सभी यज्ञ कर्म मैं लग जाए ।
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्रं प्रतिमुंच शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ।।
(पारस्कर गृह्यसूत्र, कांड २/२/११)
छन्दोगानाम्:
ॐ यज्ञो पवीतमसि यज्ञस्य त्वोपवीतेनोपनह्यामि।।
यज्ञोपवित परम पवित्र है प्रजापति ने सहज ही हमे प्रदान किया है ये आयु बल ओर शुभता और तेज को बढ़ाने वाला है यज्ञ के पास ले जाने वाला है हम इसे श्रद्धा से धारण करते है ।

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