आख्याहि वृष भद्रं व: साधूनामकृतागसाम् ।
आत्मवैरूप्यकर्तारं पार्थानां कीर्तिदूषणम् ॥ १३ ॥
हे बृषभ, तुम निरपराध हो और पूर्णतया ईमानदार हो, अतएव मैं तुम्हारे कल्याण की कामना करता हूँ। कृपया मुझे अंग-भंग करनेवाले दुष्ट के बारे में बताओ, जो पृथा के पुत्रों के यश को कलंकित कर रहा है।
तात्पर्य :-
महाराज रामचन्द्र तथा उनके पद-चिह्नों पर चलनेवाले राजा जैसे पाण्डवों तथा उनके वंशजों के यश को भुलाया नहीं जा सकता, क्योंकि उनके राज्य में निरपराध तथा ईमानदार जीव कभी कष्ट नहीं पाते थे। बैल तथा गाय अत्यन्त निरपराधी-जीवों के प्रतीक हैं, क्योंकि इनके मल तथा मूत्र को भी मानव-समाज उपयोग में लाता है। पृथा-पुत्रों के वंशज, यथा महाराज परीक्षित को भय था कि उनकी ख्याति विनष्ट होगी, किन्तु आजकल के नेता ऐसे निरपराध पशुओं का वध करने से भी डरते नहीं। यहीं वह अन्तर दिखता है, जो उन धर्मात्मा राजाओं के शासन में तथा ईश्वर के आदेशों के ज्ञान से शून्य गैर-जिम्मेदार शासकों द्वारा शासित आधुनिक राज्यों में होता है।