WOLK: ब्रह्मसूत्र (Brahmasutras)
ब्रह्मसूत्र (Brahmasutras), जिसे ब्रह्मसूत्रस या ब्रह्मसूत्र सूत्र भी कहा जाता है, भारतीय दर्शन का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसे वेदांत सूत् के नाम से भी जाना जाता है। इस ग्रंथ का लेखक बादरायण (Badarayana) माने जाते हैं, जो एक प्रमुख वेदांत दार्शनिक थे। ब्रह्मसूत्र वेदांत के सिद्धांतों को संक्षेप में प्रस्तुत करता है और इसका मुख्य उद्देश्य वेदांत दर्शन के विभिन्न पहलुओं को एकत्रित और स्पष्ट करना है।
ब्रह्मसूत्र की प्रमुख विशेषताएँ:
1. संरचना:-
- ब्रह्मसूत्र 555 सूत्रों (श्लोकों) में विभाजित है और इसे 4 भागों में बांटा गया है:
- सामान्यीकरण (साधना पद) – जो वेदांत के उद्देश्य और साधनों पर प्रकाश डालता है।
- प्रमाण (साध्य पद) – जो ज्ञान के स्रोतों की व्याख्या करता है।
- विप्रतिपत्ति (विवेक पद) – जो उन गलत धारणाओं को दूर करता है जो वेदांत के सिद्धांतों के खिलाफ होती हैं।
- अप्रमाण (अध्यात्म पद) – जो अद्वैत वेदांत के अंतिम लक्ष्य की व्याख्या करता है।
2. उद्देश्य:
- ब्रह्मसूत्र वेदांत की प्रमुख अवधारणाओं को संक्षेप में प्रस्तुत करता है और वेदांत के विभिन्न अंशों को एकत्रित करता है।
- इसका उद्देश्य वेदांत के सिद्धांतों की सुसंगत और संगठित समझ प्रदान करना है।
3. प्रमुख विषय:
- ब्रह्म – सर्वोच्च वास्तविकता या परम सत्य की अवधारणा।
- अत्मा – व्यक्तिगत आत्मा और उसकी ब्रह्मा के साथ एकता।
- माया – ब्रह्मा की अदृश्य शक्ति जो सृष्टि और भ्रामकता को जन्म देती है।
4. महत्व:
- ब्रह्मसूत्र ने भारतीय दर्शन में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया है और इसे वेदांत के व्याख्याकारों द्वारा विभिन्न रूपों में व्याख्यायित किया गया है।
- शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, और मध्वाचार्य जैसे प्रमुख वेदांत दार्शनिकों ने ब्रह्मसूत्र की व्याख्या की और इसके सिद्धांतों को विभिन्न परिप्रेक्ष्यों से प्रस्तुत किया।
ब्रह्मसूत्र भारतीय दर्शन का एक केंद्रीय ग्रंथ है, जो वेदांत की गहरी और सूक्ष्म दार्शनिकता को समझने में सहायक है।
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