12 अग॰ 2024

शिव चालीसा


॥ दोहा ॥

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान ।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान ॥

चौपाई
जय गिरिजा पति दीन दयाला ।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥1।।

भाल चन्द्रमा सोहत नीके ।
कानन कुण्डल नागफनी के ॥2।।

अंग गौर शिर गंग बहाये ।
मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥3।।

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे ।
छवि को देखि नाग मन मोहे ॥ 4

मैना मातु की हवे दुलारी ।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥5।।

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी ।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥6।।

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे ।
सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥7।।

कार्तिक श्याम और गणराऊ ।
या छवि को कहि जात न काऊ ॥ 8।।

देवन जबहीं जाय पुकारा ।
तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥9।।

किया उपद्रव तारक भारी ।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥10।।

तुरत षडानन आप पठायउ ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥11।।

आप जलंधर असुर संहारा ।
सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥ 12 ।।

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई ।
सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥ 13 ।।

किया तपहिं भागीरथ भारी ।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥ 14 ।।

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं ।
सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥ 15 ।।

वेद नाम महिमा तव गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥ 16 ।।

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला ।
जरत सुरासुर भए विहाला ॥ 17 ।।

कीन्ही दया तहं करी सहाई ।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥ 18।।

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा ।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥ 19 ।।

सहस कमल में हो रहे धारी ।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥ 20 ।।

एक कमल प्रभु राखेउ जोई ।
कमल नयन पूजन चहं सोई ॥21।।

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर ।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥22।।

जय जय जय अनन्त अविनाशी ।
करत कृपा सब के घटवासी ॥23।।

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै ।
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥ 24

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो ।
येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥25।।

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो ।
संकट से मोहि आन उबारो ॥26।।

मात-पिता भ्राता सब होई ।
संकट में पूछत नहिं कोई ॥27।।

स्वामी एक है आस तुम्हारी ।
आय हरहु मम संकट भारी ॥ 28।।

धन निर्धन को देत सदा हीं ।
जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥29।।

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी ।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥30।।

शंकर हो संकट के नाशन ।
मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥ 31।।

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं ।
शारद नारद शीश नवावैं ॥ 32।।

नमो नमो जय नमः शिवाय ।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥33।।

जो यह पाठ करे मन लाई ।
ता पर होत है शम्भु सहाई ॥34।।

ॠनियां जो कोई हो अधिकारी ।
पाठ करे सो पावन हारी ॥ 35।।

पुत्र हीन कर इच्छा जोई ।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥ 36।।

पण्डित त्रयोदशी को लावे ।
ध्यान पूर्वक होम करावे ॥ 37।।

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा ।
ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥38।।

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे ।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥ 39।।

जन्म जन्म के पाप नसावे ।
अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥ 40।।

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी ।
जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥ 41।।

॥ दोहा ॥
नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा ।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश ॥

मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान ।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण ॥





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