होलिका दहन

होलिका दहन का महत्व और प्रक्रिया

होलिका दहन होली के एक दिन पहले फाल्गुन पूर्णिमा की रात को किया जाता है। इसे 'छोटी होली' भी कहा जाता है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है और भगवान विष्णु के भक्त प्रह्लाद की रक्षा के रूप में होलिका के दहन की कथा से जुड़ा हुआ है।


होलिका दहन की पौराणिक कथा

होलिका दहन की मुख्य कथा हिरण्यकशिपु, प्रह्लाद और होलिका से जुड़ी है:

1. हिरण्यकशिपु – एक अहंकारी असुर राजा था, जिसने भगवान विष्णु से शत्रुता रखी और खुद को भगवान कहलाने लगा।


2. प्रह्लाद – उसका पुत्र था, जो विष्णु भक्त था।


3. होलिका – हिरण्यकशिपु की बहन थी, जिसे आग में न जलने का वरदान प्राप्त था।


4. षड्यंत्र – हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को मारने के लिए होलिका को गोद में लेकर अग्नि में बैठने को कहा।


5. भगवान विष्णु की कृपा – होलिका जल गई, जबकि प्रह्लाद सुरक्षित रहा।


6. अच्छाई की जीत – यह घटना दर्शाती है कि अहंकार और अधर्म का अंत होता है।


होलिका दहन विधि :-

1. होलिका का निर्माण – पहले से लकड़ियाँ, उपले और अन्य पूजन सामग्री इकट्ठी की जाती है।


2. विशेष पूजा – होलिका दहन से पहले पूजा होती है, जिसमें कच्चे आम, नारियल, गेंहू की बालियाँ, हल्दी और रोली चढ़ाई जाती हैं।


3. अग्नि प्रज्वलन – शुभ मुहूर्त में होलिका में अग्नि प्रज्वलित की जाती है।


4. परिक्रमा और आहुति – लोग होलिका की परिक्रमा करते हैं और अपनी बुराइयों को जलाने का संकल्प लेते हैं।


5. भस्म तिलक – अगले दिन लोग होलिका की राख का तिलक लगाते हैं, जिसे शुभ माना जाता है।


होलिका दहन 2025 कब है?

2025 में होलिका दहन 13 मार्च को होगा।


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